31/07/2016

हासिल ? .......कुछ भी नहीं

शहर का व्यस्त चौराहा है यह । तीन मुख्यमार्गों को जोड़ता चौराहा दुर्घटनाओं, प्रचार और भिखमंगों से कभी खाली नहीं रहता। ट्रैफिक पुलिस की वसूली और प्रबंधन की व्यस्तताओं के बीच इस चौराहे पर भीख मांगने के नए से नए तरीके फौरन अमल में आते हुये दिखते हैं । पिछले वर्ष शनि के डिब्बे में तेल भरकर लोगों के आस्था और अंधविश्वास मिश्रित भय का दोहन चला था । उससे भी पिछले वर्ष एक टोकरी में काली लोहे की प्लेट पर सफ़ेद आँखें और लाल जीभ के साथ यही काम काली माई का था । लँगड़े लूले तो खैर हैं ही लोगों की संवेदनाओं को उभार कर वसूली करने का समयसिद्ध हथियार । अभी हाल ही में छोटे बच्चों को गोद में लिए औरतें वात्सल्य को भी दुहने में व्यस्त दिखीं । कहीं किसी ने बताया की बच्चे भी इस दुनियाँ में किराये पर मिलते हैं और इन्हें अफीम चटा कर सुला लिया जाता है ताकि रोने संभालने के झंझट से बचा जा सके । ये दृश्य हमेशा परेशानी में डाल  देते हैं मुझे । पसोपेश में होता हूँ कि भीख देना ठीक है या नहीं। व्यक्तिगत रूप से लगता है कि भीख ना देना ठीक है क्यूंकी इस तरह आप भीख कि प्रवृत्ति को ही समर्थन देते है । इस विचार कि पुष्टि एक मित्र ने भी की जो पुलिस में हैं और बताते हैं कि भीख उन भिखारियों की नहीं होती बल्कि उस क्षेत्र के मालिक की होती है । यह मालिक अमूमन दबंग या गुंडा होता है और उसके अनेक कामों में भीख का प्रबंधन भी शामिल होता है । कहना आवश्यक नहीं कि इसमें "ठुल्लों" का कमीशन भी शामिल होता है, अन्यथा नाक के नीचे यह सब ना चलता। जो भी हो गरीबी का यह अतिशय रूप संवेदनाओं को कुरेद देता है । मेरा मन कभी भी 5 रुपये देने के बाद पुण्य के एहसास से सराबोर नहीं हो पाता । हम पुण्य कर सकें क्या इसके लिए ऐसे गरीबों का होना जरूरी है ? दान का गर्व हो इसके लिए क्या अकिंचन पात्र चाहिए ? मनुष्य की प्रगति का क्या यही जमा हासिल है कि कुछ लोग जीवन को पेट भरने कि दौड़ में बिताएँ और कुछ लोग एंटीला में रहें ? विश्व की दौलत का 99% महज 1% लोगों के पास जमा होना भी तो ठेक नहीं और 5 रुपये टिका देने से क्या पूंजी का प्रवाह पलट जाएगा ?  भारत की महाशक्ति का इनके लिए क्या मतलब । चौराहे पर रीति हथेली फैलाये बच्ची की शून्य आँखें उस व्यवस्था का खोखलापन बताती हैं जो उसने अंजाने में बना ली है ।