29/06/2014

कब आएंगे बाल साहित्य के अच्छे दिन ?

आप यह जो किताब देख रहे हैं यह  अन्तरिक्ष यात्री अलेक्सेई लेओनोव द्वारा स्वयं लिखी गयी है जिसे प्रगति प्रकाशन मॉस्को ने सोवियत दिनों में 1978  छापा था और हिन्दी में इसका अनुवाद बुद्धिप्रसाद भट्ट ने किया था।  लेओनोव वे पहले अन्तरिक्षयात्री थे जो अन्तरिक्ष यान से वाह्य अन्तरिक्ष में निकले थे। मुझे यह किताब मेरे चाचा जी श्री प्रदीप दीक्षित ने जन्मदिन के उपहार स्वरूप सन 1982 में दी थी जब में 7 वर्ष का था। एक और किताब थी जवाहरलाल नेहरू कि पिता के पत्र पुत्री के नाम ।  इन दोनों पुस्तकों में एक समानता यह है कि दोनों दो महान लोगों के द्वारा बच्चों के लिए लिखीं गईं। बच्चों से सीधा संवाद। पश्चिम में बहुत से नायकों ने बच्चों के लिए पुस्तकें लिखीं हैं लेकिन  भारत में  ये ना के बराबर हैं। अच्छा बाल साहित्य तो छोड़िए आज हिन्दी में एक भी स्तरीय बाल साहित्य की पत्रिका नहीं है (पराग एक सरहनीय प्रयास था लेकिन वह 90 के दशक के पूर्वार्ध में ही बंद ही गया) हिन्दी लेखक भी बच्चों के लिए लिखने में हिचकते हैं जबकि पश्चिम में अनेक महान लेखकों ने बच्चों के लिए भी लेखन किया है जैसे टोल्स्तोय, चेखोव, हैमिंगवे, अप्टन सिंक्लेयर, जेम्स जॉयस तो मुझे याद आ रहे हैं लेकिन हिन्दी में पंडित नेहरू,  प्रेमचंद को छोड़ कर बहुत नाम नहीं हैं जिन्होंने बच्चों के लिए भी लिखा है।  शायद उन्हें टाइप्ड हो जाते का खतरा रहा होगा लेकिन यह एक आवश्यक परंपरा होनी चाहिए। आगामी पीढ़ी को अच्छे साहित्य, शब्द सम्पदा और अनोखी कलपनशीलता का लाभ भी मिलना चाहिए। शाश्वत भावनाओं की रचनाएँ महान लेखक ही कर सकते हैं। अब प्रेमचंद की कहानी ईदगाह के आधारमूल्यों की तुलना भला कहाँ है।  भारत में न जाने कितने खिलाड़ियों, वैज्ञानिकों, इंजीनियरों ने सफलता और साहस की ऐसी मिसालें पेश की हैं जिन्हें हर कोई सुनना, पढ़ना चाहेगा और बच्चे तो विशेष तौर पर। लेकिन ऐसे उदाहरण बहुत कम हैं जब किसी महापुरुष ने बच्चों के लिए खुद कोई पुस्तक लिखी हो। ज़रा सोचिए एक बच्चा खुद सचिन द्वारा लिखी गयी खुद के लिए रोचक शैली में लिखी पुस्तक से जितना अभिभूत और प्रेरित होगा उतना किसी दोयम दर्जे के लेखक द्वारा गूगल से उठा कर नीरस भाषा में लिखी गयी सचिन  कि जीवनी से नहीं। इसी तरह एक महान लेखक द्वारा लिखी एक कहानी ही बच्चों को शाश्वत मानवीय मूल्यों का एहसास करा सकती है। चेखोव की "लाखी" या  "वांका"  और प्रेमचंद की ईदगाह जैसी कहानियाँ गहन प्रभाव डालती हैं।

कभी कोफ्त होती है कि हिन्दी में अच्छा बाल साहित्य नहीं है। और देशों की ओर देखता हूँ तो लगता है ऐसा हमारे यहाँ क्यूँ नहीं हो सकता। जो कुछ थोड़े प्रयास थे भी वे अब बंद हैं। ना तो हिन्दी के बड़े लेखक बच्चों के साहित्य में रुचि लेते हैं और न ही बच्चों के साहित्य में बड़े लेखक हैं। ना संपादक और ना ही प्रकाशन इस क्षेत्र में रुचि लेते हैं। राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, नेहरू बाल पुस्तकालय जैसे प्रतिष्ठानों ने काम तो बहुत किया है लेकिन यह भी सरकारी विभागों के दोषों से पूर्णतया मुक्त नहीं है। नए लेखक भी आए हैं पर सभी पाठकों का रोना रोते हैं । जबकि पाठक है .....वे पढ़ना भी चाहते हैं लेकिन समस्या है कि लेखन उनके मनोनुकूल नहीं है। बाल साहित्य का मतलब भारत में नैतिक शिक्षा हो चुका है। किताब उठाते ही अगर उपदेश शुरू हो जाएंगे तो भला कौन पढ़ना चाहेगा। यह सही है कि बाल साहित्य सोद्देश्य हो लेकिन यह एक कला है कि यह उद्देश्य आप साहित्य के मूल "मनोरंजन" को ध्यान में रख कर दी जाए। भारत में जब भी कुछ लिखा जाता है वह रामायण, महाभारत, पुराण से आगे नहीं निकाल पाता। आज तो बाल साहित्य कम, बाल साहित्य पर शोध पुस्तकें बहुत सी हैं ...हद है ।

अभी हाल ही में एक अनुभव हुआ ।  बेटी के स्कूल में पीटीएम में तथा कथित पुस्तक मेला भी लगता है और पुस्तक प्रेमी होने  के नाते शिक्षिका के साथ कम पुस्तक मेले में ज्यादा समय व्यतीत करता हूँ। वहीं एक बार जब मैं कुछ पुस्तकें देख रहा था तो एक मम्मी और बेटी की नौंक झौंक कानों में पड़ी। बिटिया को चाहिए थी कोई पुस्तक , शायद वह डिस्कवरी चैनल पर देख कर उत्साहित थी और ग्रहों के बारे में एक मोटी सी किताब  पकड़े थी उधर मम्मी (वे दाम को लेकर ज्यादा परेशान नहीं हो सकतीं थीं क्यूंकी जिस गाड़ी से वे आयीं थीं हमारे लिए वह सपना ही है। लेकिन फिर भी वे असहज थीं। झुंझलाहट बढ़ी और उन्होने  किताब लेने से साफ  मना कर दिया। आखिर बेटी भी उन्हें की थी सो वह इंगलिश ग्रामर कि एक किताब ले आई और ज़ोर से बोली " ये वाली तो तुम ले ही लोगी न ? लेकिन आज में कोई किताब लिए बिना नहीं जाऊँगी" मम्मी ने अपनी लाज रखते हुये वही किताब ले ली सो भी यह कहते हुये " पहले अपनी पढ़ाई तो कर लो फिर फालतू कि किताबें पढ़ना"। मेरे अंदर से आवाज़ आई कि उन्हें कहूँ, समझाऊँ कि अभी अभी आपने जिज्ञासा। कलपनशीलता और मौलिकता कि हत्या कर दी, अभी अभी आपने मैकाले के सपने को और सच्चा कर दिया, अभी अभी आपने एक भारतीय प्रतिभा की लौ को बुझा दिया। एक और वाकया है एक दुकान पर मुझे  गुलज़ार की "गोपी गायन बाघा बायन"  किताब दिखी मैं उसे उठाने बढ़ा कि एक और महिला ने उसे देख लिया । समवयस्क थीं सो उनकी आँखों में भी बचपन की वही यादें तिरती देखीं जो मेरी आँखों में थीं। वे भी दूरदर्शन के उस सीरियल को याद करके भावुक थीं। सहसा अपनी बिटिया से कह उठीं ...देखो "गोपी गायन...." और फिर कुछ हुआ ..... बचपन को ठेल कर अनुशासन का पर्दा खिंच गया । कठोर भाव बना कर वे स्टेशनरी के रैक पर मुड़ गईं। काश वे समझ पातीं कि बच्चों को कोर्स के अलावा इन किताबों की कितनी जरूरत है। स्कूल में लाइब्रेरी देखी तो विशाल मात्रा में फेमस 5, नैन्सी ड्रू जैसी सामान्य सीरीज़ तो थीं लेकिन अच्छा साहित्य एक अलमारी में सिमटा था और हिन्दी में तो कुछ था ही नहीं। पता नहीं बाल साहित्य के अच्छे दिन कब आएंगे (बाल नरेंद्र जैसी चापलूसी की बजाय अगर नरेंद्र मोदी खुद बच्चों के लिए अपने अनुभव लिखते तो शायद कुछ बात बनती)

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अनतोन चेखोव की मार्मिक कहानी लाखी

26/06/2014

अग्निवर्षा के बीच पानी मौजूद है : बुद्ध ग्रह

अग्निवर्षा के बीच पानी मौजूद है : बुद्ध ग्रह


हाल ही में अमेरिकी अन्तरिक्ष एजेंसी नासा द्वारा भेजे गए ग्रहीय यान मसेंजर (संदेशवाहक) ने बहुत से आंकड़े और तस्वीरें भेजीं हैं। वैज्ञानिक इन तसवीरों का विश्लेषण करके बुद्ध से संबन्धित अपनी संकल्पनाओं को और सटीक बनाने में जुटे हुये हैं। इसी क्रम में एक चौंकाने वाले अनुमान को बल मिला है कि बुद्ध ग्रह पर भी पानी की मौजूदगी संभव है।
बुध है कुछ खास: 
सूर्य से सबसे नजदीक होने के कारण बुध सभी ग्रहों से खास है। यह सबसे छोटा ग्रह भी है हमारे सौर परिवार का। प्राचीन सभ्यताओं में भी इसे पहचान लिया गया था। ग्रीक साहित्य में इसे अपोलो (भोर) और हरमिस (शाम) के नाम से जाना जाता है। यह ग्रह अपनी धुरी पर 175.97 पृथ्वी दिनों में अपनी धुरी पर घूम जाता है जबकि अपनी कक्षा में सूर्य का मात्र 58 पृथ्वी दिनों में यह चक्कर पूरा कर लेता है। यानि बुध पर दिन, साल से छोटा होता है। मतलब यह कि आप बुध पर अपना जन्मदिन लगभग रोज़ मना सकते हैं। बुध का वातावरण बेहद जटिल और विषम है। यहाँ अधिकतम तापमान 450°C और न्यूनतम तापमान – 170°C से भी नीचे चला जाता है। वातावरण ना नन के कारण बुध पर लगातार उल्कापात होता रहता है जिसके कारण पूरा ग्रह उल्का क्रेटरों से भरा है। 1500 किलोमीटर व्यास का  कैलोरिस बेसिन नामक क्रेटर ना केवल बुद्ध का सबसे बड़ा बल्कि सौर मण्डल का सबसे बड़ा क्रेटर है। 
अरेशीबो वेधशाला का है कमाल  कई वर्षों से प्योर्तो रिको स्थित अरेशीबो वेधशाला बुध ग्रह का प्रेक्षण कर रही है। 1000 फीट व्रस की यह वेधशाला विश्व की सबसे बड़ी एकल रेडियोवेधशाला है जिसे 1960 में स्थापित किया गया था। इसी वेधशाला की मदद से गॉर्डन पेटेंगिल्स और उनके साथियों ने यह पता लगाया था कि बुध ग्रह मात्र 59 दिनों में अपनी धुरी का एक चक्कर पूरा कर लेता है जबकि पहले यह माना गया था कि बुद्ध का परिभ्रमण काल 88 दिन है। अरेशीबो वेधशाला से ही वैज्ञानिकों ने न्यूट्रोन तारे के अस्तित्व की पुष्टि की, पहले द्वितारे (बाइनरी) खोजे और पहली बार सौर परिवार से बाहर के ग्रह खोजे। जेम्स बॉन्ड की फिल्म गोल्डन आई के अलावा यह वेधशाला द स्पीशीज़ और X- फाइल्स जैसी प्रसिद्ध फिल्मों में भी दिखी है। कुछ समय से इसे सेटी (SETI: search for Extraterrestrial Intelligence) के प्रोजेक्ट हेतु भी उपयोग किया जा रहा है।
अरेशीबो संकल्पना : अरेशीबो द्वारा एकत्रित आंकड़ों के आधार पर निर्मित रेडियो चित्रण से पता चला कि बुध के सभी हिस्से समान रूप से रेडियो किरणों को परावर्तित नहीं करते। कुछ हिस्से जो अधिक मात्र में परावर्तन करते हैं वे मुख्य रूप से ध्रुवों के आस पास स्थित हैं। इस विषय में एक
संकल्पना यह थी कि संभवतः इन हिस्सों में जमी हुयी बर्फ है जो अधिक परावर्तन का कारण है। मेसेंजर यान द्वारा भेजी गयी तसवीरों को जब अरेशीबो वेधशाला के रेडियो चित्रों के साथ मिलाया गया तो पता चला कि अधिक परावर्तन वाले ये हिस्से (पीले स्थान) दरअसल क्रेटर हैं और अधिक परावर्तन वाले हिस्सों की संख्या ऊतरी ध्रुव की ओर बढ़ती जाती है। इसके अलावा यह भी देखा गया कि ये सभी हिस्से बुध के ध्रुवों के उन हिस्सों में स्थित हैं जहां सूर्य की रोशनी नहीं पहुँच पाती (लाल रंग ) अर्थात बड़े और गहरे क्रेटरों कि तलहटी या दीवारें। दरअसल बुध सूर्य से सबसे करीब स्थित ग्रह है। इसी वजह से प्रकाशमान हिस्सों में यहाँ तापमान लगभग 400° C से अधिक हो जाता है लेकिन क्रेटरों की तलहटी में जहां सूर्य कि किरणें नहीं पहुँच पातीं तापमान – 170°C से भी नीचे चला जाता है। इतने कम तापमान पर उल्काओं के साथ आया पानी यहाँ जमा रह सकता है।
तस्वीरें व संदर्भ : नासा (शैक्षणिक एवं सामान्य ज्ञान हेतु उपयोग) 

25/06/2014

दो मुहाँ


ऑरलैंडो, फ्लोरिडा  के साठ वर्षीय पॉल हेनेसी को वन्य जीवन और आश्चर्यजनक चीजों की छवि उतारने में मज़ा आता है। विश्व प्रसिद्ध नेशनल  ज्योग्राफिक पत्रिका में उनका लिया गया  यह छविचित्र अनोखा है। यह एक दोमुहें होण्डुरन मिल्क स्नेक का छविचित्र है जिसे स्थानीय विश्वविध्यालय के जीव विज्ञानी की सहायता से लिया गया है । यह एक अल्बिनो है जिसका मतलब है इसमें कुछ रंग प्रदर्शित  वाले जीन नहीं हैं। ऐसे साँप जहरीले नहीं होते। यह बहुतायत में कनाडा, अमेरिका, इक्वेडोर, वेनेज़्वेला आदि देशों में मिलता है। अपने बचाव के लिए इसके शरीर के रंग और डिजायन एक अन्य जहरीले कोरल साँप से मिलते जुलते हैं। इन्हें मिल्क स्नेक नाम इनके बारे में प्रचलित एक मिथक से पड़ा की ये गायों के थनों से दूध चूस लेते हैं हालांकि यह केवल एक मिथक ही है। ये साँप रात में निकलते हैं और चूहे, कीड़े और छिपकलियाँ खाते हैं। प्रकृति के इस खूबसूरत प्राणि को आप भी देखिये।