22/12/2014

मुखौटा

पीके - बीजेपी 
मुखौटा बहुपयोगी होता है। आपकी इज्जत बढ़ाता है। अपने दैनिक जीवन में हम सब मुखौटे ओढ़ते हैं । मुखौटे आज की दुनियाँ में सफलता की नींव हैं।लेकिन मुखौटों के साथ समस्या यही है कि उनका होना आपमें ऊहापोह पैदा करता है। साध्य को पाने के बाद आप मुखौटा हटाना चाहते हैं लेकिन यह आसान नहीं।

बीजेपी ने भी ये मुखौटे ओढ़े हैं और हर बार मुखौटों को उतारना उसके लिए द्विविधा का सबब रहा है। यह दुविधा गुजरात दंगों के दौरान भी देखी गयी थी जब पार्टी अंदर ही अंदर मुदित थी पर मुखौटा "राजधर्म" कह कर लानतें भेज रहा था और आज भी जब मुखौटा "विकास" कर रहा है तो असल "घर वापसी, पाठ्यक्रम सुधार, संस्कृत पाठन, लव जिहाद करा रहा है । हुआ तब भी कुछ नहीं था होना अब भी कुछ नहीं है। 

15/12/2014

वे काम पर हैं

प्रधानमंत्री जी हवाई माध्यमों के मुरीद हैं । वे नेता हैं जो खुद में एक हवाई कैरियर है .... कुछ भी नहीं होता उसके पास फिर भी सब कुछ होता है । वह सेवक हो कर भी मालिक होता है । प्रधानमंत्री भी एक हवाई पद है । संविधान उसके बारे में सबसे कम पन्ने खर्च करता है लेकिन सबसे ज्यादा सत्ता उसी के पास है। वे भाषणबाजी की हवाई कला में भी माहिर हैं । वे हवाई दावे कर सकते हैं , हवाई किले बांध सकते हैं । वे फेसबुक, ट्विटर जैसी हवाई माध्यमों में खेलते हैं । उन्हें पता है 140 अक्षरों में "संक्षिप्तीकरण" से अच्छा कोई तरीका नहीं हो सकता । इसीलिए 3डी, 5टी, एफ़डीआई(फ़र्स्ट डवलप इंडिया) जैसे जुमले वे गढ़ते हैं । वे मन की बात करते हैं ...वही हवाई मन जिसे काबू में रखने की सलाह हमारे मनीषियों ने दी है। वे विदेशों की धरती से देश को संबोधित करते हैं ... वे वहाँ रॉक शो करके देश में विपक्ष की हवा निकाल देते हैं। तो बंधुओ वे काम पर हैं । विकास इतना होगा की अब ज़मीन नहीं आसमान पर दिखेगा ......... 

04/09/2014

जब गांधी जी ने बचाया बोस के सैनिकों को फांसी के तख्ते से

Photograph: Credit Wikipedia 
गांधी जी ने जब से भारत के स्वतन्त्रता आंदोलन का नेतृत्व संभाला, उनसे लोगों की अपेक्षाएँ भी बढ़ गईं थीं। यह स्वाभाविक ही था क्यूंकी ब्रिटिश राज के अंतहीन निराशा में डूबे दिनों में एक गांधी जी ही थे जिनमें लोगों को आशा की किरण दिखाई देती थी। उनके अबूझ तरीकों से विरोध होते हुये भी राजनीतिक वर्ग उनके पीछे चलता रहा। यही गांधी जी के तौर तरीकों की खासियत थी की वे विरोधी और समर्थकों दोनों से अपनी बात मनवा ही लेते थे यद्यपि कभी कभी पूरी तरह से नहीं। गांधी जी की इसी ताकत के भरोसे लोगों ने यह कहना शुरू कर दिया था कि गांधी जी क्रांतिकारियों की फांसी को बचा लेंगे। उनके लिए यह दुश्वारी नहीं होगी। आखिर जब साम्राज्य का वाइसराय बराबरी पर बात करने को उतर आया तो क्या वह उनकी बात नहीं मानेगा? लोगों को निराशा हुयी जब इरविन और क्रांतिकारियों दोनों ने फांसी माफी से मना कर दिया। भगत सिंह ने असेंबली में बम पूरी समझ के साथ फैका था और पकड़े गए थे। रही बची कसर अदालत में बम दर्शन पढ़ कर पूरी कर दी थी। यह बलिदान था। गांधी जी के भरोसे किया गया अपराध नहीं। लोग भावुक होते हैं इसलिए चाहते थे कि भारत माँ के वीर सपूत ज़िंदा रहें। वे गांधी जी से निराश हो गए। गांधी जी जहां आशा की किरण थे वहीं क्रांतिकारी खीज और निराशा के प्रति गुस्से की अभिव्यक्ति लेकिन दोनों ने ही जनता को अन्याय के सामने ना झुकना सिखाया। दोनों ने दिलों से अंग्रेजों का डर दूर कर दिया। आज़ादी के बाद जनता के एक बड़े वर्ग में बहुत सी बातें गलतफहमियों के रूप में प्रचलित रहीं हैं जिनमें पाकिस्तान को 50 लाख रुपये देना और भगत सिंह को ना बचाना मुख्य हैं। इसी वर्ष एक सुभाष चन्द्र बोस की गुप्तचर सेवा के अधिकारी कि डायरी पर आधारित पुस्तक में 7 ऐसे पत्र हैं जिन्हें गांधी जी ने ब्रिटिश हुकूमत को लिखा था। इनमें भारतीय राष्ट्रीय सेना (आईएनए ) के उन 4 स्वयंसेवकों की रिहाई और फांसी माफी की प्रार्थना की गयी है। अंततः उन्हें रिहा कर दिया गया था। इनमें श्री हरिदास मित्रा भी थे जो बंगाल के प्रमुख नेता अमित मित्रा के पिता थे। शायद गांधी जी से खफा लोगों के जले दिल पर कुछ पानी पड़ा हो। साथ ही बोस के साथ उनके सम्बन्धों को लेकर विचलित बंगाली मानस भी राहत महसूस करे। इतिहास तो तथ्य बताता है। आप उसे कैसे समझते हैं यह आपकी समझ पर निर्भर है।

(खबर साभार TOI कोलकाता 2 फरवरी 2014 ऑनलाइन) 

16/08/2014

रिमोट कंट्रोल: एक शोध

रिमोट कंट्रोल: एक शोध
अगर कोई आपसे पूछे कि रिमोट कंट्रोल का जनक कौन है तो स्मार्ट फोन के जरिये गूगल करके स्मार्ट बनने की कोशिश मत कीजिये, मैंने इस पर काफी शोध किया है और बता दूँ कि इसका आविष्कार निकोला टेस्ला ने नहीं बल्कि हिंदुस्तान ने ही किया था।
रिमोट परंपरा: हमारे यहाँ रिमोट कंट्रोल की सुदीर्घ परंपरा रही है। आपको तो केवल एक ही रिमोट कंट्रोल का नाम पता है ...दस जनपथ लेकिन मैंने इतिहास का विषद अध्ययन करके ऐसे बहुत से रिमोट और कंट्रोल दोनों खोज निकाले हैं।
अब अगर शुरू से ही शुरू करें तो यह सृष्टि ही रिमोट और कंट्रोल का अनूठा उदाहरण है।ॠग्वेद की ॠचाएँ भी यही बताती हैं कि इस संसार का नियंता कोई और है। रिमोट की खोज वहीं से शुरू हुयी थी। ऋग्वेद के हिरण्यगर्भ सूक्त में हमें उसी रहस्य की खोज के दर्शन होते हैं। 

सृष्टि का कौन है कर्ता ! कर्ता है वा अकर्ता !
ऊंचे आकाश में रहता । सदा अध्यक्ष बना रहता। 

वही सचमुच में जानता, या नहीं भी जानता !

हैं किसी को नहीं पता ! नहीं है पता !!!!!

यानि रिमोट की चिंता आदि कालीन है। हमें रिमोट का अभी तक कोई दृश्य प्रमाण तो नहीं मिल पाया है लेकिन महसूस यही होता है कि हम सब नाचने के लिए ही पैदा होते हैं। परम ज्ञानी श्री राजेश खन्ना जी ने भी कुछ ऐसा ही संकेत अपनी फिल्म “आनंद” में दिया था जब वे कह रहे थे “बाबू मोशाय....हम सब उसके हाथ कि कठपुतलियाँ हैं...” कुछ ऐसे ही तुलसी ने भी कहा है
“उमा दारु-जोशित की नाई, सबहीं नचवात राम गोसाईं”
उपनिषदों में भी इस रिमोट कि दूर ध्वनि सुनाई देती है। बुद्ध को रिमोट के बारे में ज्ञान प्राप्त हो गया था इसलिए उन्होंने माध्यम मार्ग निकाला और रिमोट के चक्कर से निर्वाण या मुक्ति पाने के रास्ते बताने लगे। यह रास्ता बहुत उम्दा था बहुत कुछ गांधी जी के असहयोग जैसा। सब कुछ छोड़ कर सन्यासी बन जाओ। जब किसी काम के ही नहीं रहोगे तो रिमोट क्या खाक चलाएगा तुम्हें। कठपुतली जनता ने उनके रास्ते को हाथों हाथ लिया क्यूंकी वह रिमोट से संचालित होती रह कर भ्रमित ही गयी थी। फिर तो बुद्ध भी अपने बोधिसत्वों सहित इस रिमोट से मुक्ति दिलाने में सक्रिय हो गए, ऐसा ग्रंथ हमें बताते हैं। हालांकि जब भी बुद्ध से रिमोट और इसकी प्रकृति के बारे में पूछा गया तो वे चुप्पी साध गए। उन्होंने इस चर्चा को अव्याकृत कह कर टाल दिया था।
बहुत बाद में जा कर शंकरचार्य ने “ब्रह्म सत्यं जगत मिथ्या” के सूत्र द्वारा इस उपनिषदों की ध्वनि को स्पष्ट किया और बताया कि यह सूक्त रिमोट की सर्वोच्चता और कंट्रोल की ओर ही संकेत करता है। जिस प्रकार ब्रह्म कण कण में है, रिमोट भी कण कण में है। यह रिमोट असल में किस के पास है यह पता लगाना ज़रा टेढ़ीखीर है। आखिर कौन किसे कंट्रोल कर रहा है यह बड़ी भ्रम पूर्ण स्थिति है। एक ओर तो भजन गायक का कहना है –
“भगत के बस में हैं भगवान”
तो उधर तुलसी कहते हैं कि -
“होयहि सोई जो राम रची राखा”
कुछ ऐसी ही स्थिति यहाँ भी है। अब लोकतन्त्र में मतदाता सोचता है कि नेता का कंट्रोल उसके हाथ में है तो नेता सोचता है कि जनता का कंट्रोल उसके पास है लेकिन उपनिषद के नेति नेति सूत्र की मानें तो “न यह है ना ही वह” बल्कि असली कंट्रोल तो कहीं और है। आज ब्रह्म पूंजी है और पूंजीपति ही असली कंट्रोलर है।
अगर आपको साहित्यिक प्रमाण कुछ हल्के लगते हैं तो ऐतिहासिक प्रमाण भी मौजूद हैं। ऐसा ही रिमोट और कंट्रोल का जबर्दस्त तंत्र कौटिल्य और चन्द्रगुप्त मौर्य का था। पर्दे के पीछे कौटिल्य था और सामने चन्द्रगुप्त। कौटिल्य आज के रिमोट कंट्रोलरों से अधिक चालाक थे इसलिए रिमोट कंट्रोल की उस व्यवस्था पर, इससे पहले कि कोई और नटवर प्रसिद्दि कमाए, खुद ही एक पुस्तक “अर्थशास्त्र” लिख डाली जो अब तक उनके लिए प्रसिद्धि का जरिया है और अनेक प्रकाशकों के लिए कमाई का। 
सोनियाँ जी तो अब लिखने का प्लान बना रहीं हैं। काश मैं उनका “रिमोट सलहकार” होता तो बता देता कि उन्हें चुनाव के ठीक बाद एक किताब लिख देनी चाहिए “एक्सपेरिमेंट विद रिमोट कंट्रोल”। खैर अब बिन मांगी सलाह मोदी जी के लिए है, इससे पहले कि नृपेन्द्र मिश्रा जी 2019 या 2024 में ऐसी ही कोई खुलासू पुस्तक लिखें एक किताब मोदी जी को पहले से लिख रखनी चाहिए “वन रिमोट इस नॉट इनफ़” आखिर उन्हे एक से अधिक रिमोटों का अनुभव है जैसे संघ, अडानी और अंबानी आदि।

मध्यकाल में रिमोट कंट्रोल का प्रचलन बहुत बढ़ गया था। इस काल में स्त्रियों ने अपनी रिमोट ताकत को पहचाना और कई पेटीकोट सरकारों की स्थापना की जिनमें अकबर की माहम अनघा, शाहजहां की नूरजहां आदि प्रमुख हैं।
अंग्रेजों के काल में भी रिमोट कंट्रोल का प्रयोग खूब हुआ। बंगाल में अंग्रेजों ने रिमोट कंट्रोल को वह अर्थ दिया जिसकी जरूरत आज हर रिमोट कंट्रोल महसूस करता है। यह था द्वैध शासन। मतलब शासन के लड्डू का लुत्फ खुद उठाओ और डायबिटीज़ के दुःख दूसरे को भोगने दो।
एक तरफ तो हमारे देसी रजवाड़े भोगविलास में डूब कर इतने नाकारा हो चुके थे कि कोई वारिस पैदा करने में अक्षम हो जाते थे। अब राजे-रजवाड़े  के जमाने में भारत की इस राष्ट्रिय बीमारी का शर्तिया इलाज का दावा करते किसी हाकिम उसमानी का अस्तित्व तो शायद नहीं था , अंग्रेजों ने इसका इलाज कर दिया। इसी बीमारी के सहारे अंग्रेजों ने रिमोट कंट्रोल सरकारों कि एक श्रंखला ही खड़ी कर दी और भारत पर कब्जा कर लिया। स्कूलों में इसे सहायक संधि के नाम से पढ़ाया जाता है।

आज़ादी के बाद यू पी ए युग में इस प्रथा का पूर्ण विकास हुआ जब इसे द्वैध शासन के स्थान पर “त्याग का शासन” कहा जाने लगा और रिमोट कंट्रोलर एक मसीहा के रूप में देखा जाने लगा। इस प्रथा का लोगों पर इतना असर हुआ है कि लोग किताबें लिख कर इसका विश्लेषण कर रहे हैं। 

इस प्रकार अपने वर्षों के अध्ययन से मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूँ कि भविष्य रिमोट कंट्रोल का ही है।

25/07/2014

Clueless First post with eyeless writers

Clueless First post with eyeless writers

फर्स्ट पोस्ट में छपे लेख की प्रतिक्रिया

लेख पढ़ने के लिए लिंक पर क्लिक करें
http://www.firstpost.com/world/eyeless-gaza-clueless-india-shouldnt-care-1632867.html

1-First, the current Palestinian troubles are self-inflicted, as there is no point in provoking Israel and then complaining about their reaction.
यह कहना वैसे ही है जैसे गली के गुंडे के बारे में कोई कहे कि पहले उसे उकसाया अब पछताओ ....लेकिन रहेगा तो वह गुंडा ही ना ?

2- Second, the refugee status and grievances of Palestinians can easily be solved by wealthy Arabs themselves if only they were willing to resettle them in their vast territories.
क्या लेखक महोदय को बेघर कर दिया जाए और फिर कहा जाए कि जाओ अपने समृद्ध संबंधियों के साथ रहो जा कर।

3- Third, there is the specious argument that Indians have in the past supported Palestine, and therefore they must do so now.This is like saying, “We’ve been defecating in public since Nehru’s days, and therefore we must continue to do so, QED”
श्रीनिवासन जी ने लिखा है “यह तो इस तरह है कि हम नेहरू के जमाने से ही खुले में हगते आए हैं सो अब भी यही करेंगे” उनके तर्क और ज्ञान का स्तर इसी उदाहरण से पता चलता है।
 भारत ने अतीत में फिलिस्तीन का समर्थन सोचे समझे सिद्धांतों के आधार पर किया था अगर भारतीय विदेश नीति के आज भी वही सिद्धान्त हैं तो बेशक उसे फिलिस्तीन का समर्थन करना चाहिए। खुद गांधी जी ने लिखा था "मेरी सहानुभूति यहुदिओं के साथ है.मैं उनसे दक्षिण अफ्रीका से ही नजदीकी रूप से परिचित हूँ कुछ तो जीवन भर के लिए मेरे साथी बन गए हैं.... पर मेरी सहानुभूति मुझे न्याय की आवश्यकता से विवेकशून्य नही करती यहूदियों के लिए एक राष्ट्र की दुहाई मुझे ज्यादा आकर्षित नही करती. जिसकी मंजूरी बाईबल में दी गयी और जिस जिद से वे अपनी वापसी में फिलिस्तीन को चाहने लगे हैं. क्यों नही वे, पृथ्वी के दुसरे लोगों से प्रेम करते हैं, उस देश को अपना घर बनाते जहाँ पर उनका जन्म हुआ और जहाँ पर उन्होंने जीविकोपार्जन किया. फिलिस्तीन अरबों का हैं, ठीक उसी तरह जिस तरह ....इंग्लैंड अंग्रेजों का और फ्रांस फ्रंसिसिओं का. यहूदियों को अरबों पर अधिरोपित करना अनुचित और अमानवीय है जो कुछ भी आज फिलिस्तीन में हो रहा हैं उसे किसी भी आचार संहिता से सही साबित नही किया जा सकता" श्रीनिवासन को गांधी जी का संदर्भ भी शायद अच्छा ना लगे। इसमें भ्रांतिपूर्ण अगर कुछ है तो वह खुद राजीव श्रीनिवासन हैं

4 Fourth, the prevailing mythology about Palestinians suggest that they are somehow uniquely downtrodden and worthy of support.
अगर फिलिस्तीन का शोषण एक मिथक है तो सत्य का उदघाटन राजीव श्रीनिवासन जी को करना चाहिए। या फिर प्रबंधन की पढ़ाई और सलाहकर्म के बाद उन्हें इतिहास पढ़ने का मौका नहीं मिलता ? मुझे तो उनका विदेश नीति पर लिखना ही एक मिथक लग रहा है।

5-Fifth, by implying that the Palestinian cause is supported ipso facto by all Muslim Indians, the latter are stereotyped and ghettoised.
 दरअसल श्री श्रीनिवासन की सोच खुद संकुचित और स्टीरियोटाइप है। सभी भारतीय मुसलमानों को एक खास नज़र से देखना ही इसका सबूत है।

6 - Sixth, there are no major Indian interests at play in the Israel-Gaza conflict, and therefore India should only give it the attention it deserves
इस्रायल - फिलिस्तीन विवाद से और उस क्षेत्र से हमारे बहुत से हित जुड़े हैं । अगर हम अतीत में इस्रायल का समर्थन करते तो हमें भारत के विभाजन के आधारों को भी मानना पड़ता। आज भी अगर हम फिलिस्तीन के विभाजन को स्वीकार करेंगे तो कश्मीर पर समस्या खड़ी होगी। अगर हम इस्रायल के हमलों को समर्थित करते हैं तो हमें चीन के हमलों पर चुप रहने को तैयार हो जाना चाहिए। श्रीनिवासन फिर कहते हैं कि अरबों ने इस्रायल के अस्तित्व के अधिकार को चुनौती दे रखी है .... अब या तो फर्स्ट पोस्ट में किसी तरह के आर्काइव्स नहीं हैं या फिर श्रीनिवासन ने मेहनत नहीं की है क्यूंकी तथ्य तो उल्टे हैं। इस्रायल के पास सब कुछ है ....ज़मीन, लोग, सरकार, अमेरिका और फिलिस्तीन ? एक ऐसा देश जिसे आप नक्शे पर नहीं खोज पाएंगे.

अगर हमास ने अपराध किया और तीन किशोरों की हत्या की तो उसके बदले हजारों मासूमों की जानें लेना जायज़ है ? क्या श्रीनिवासन इसी को विदेश नीति मानते हैं। इसके बदले क्या कोई और रास्ता नहीं था ? दरअसल इस्रायल का यही दादगीरीपूर्ण रवैया इस क्षेत्र की शांति का दुश्मन है। अगर हमास दोषी है तो इस्रायल भी एक आतंकवादी राष्ट्र ही है। 

और लीजिये अंत में वे गोधरा को भी ले आते हैं कि फिलिस्तीनीयों ने इस्रायल को उकसाया लेकिन इस्रायल कि प्रतिक्रिया ज्यादा बदनाम हो गयी ठीक उसी तरह गोधरा के बाद की प्रतिक्रिया ही ज्यादा बदनाम हुयी। श्रीनिवासन साहब ऊपर आप कह चुके हैं कि इस्रायल – फिलिस्तीन विवाद का भारत के लिए महत्व नहीं है और अब आप गोधरा कि प्रति हिंसा को जायज़ ठहराने के लिए प्रयोग कर रहे हैं .. खुद को ही विरोधाभासी सिद्ध कर लिया ?
एक अन्य तर्क आपने कश्मीरी पंडितों के बारे में दिया है। अगर हम इस्रायल को समर्थन करते हैं तो हमें कश्मीरी पंडितों का पलायन भी स्वीकार कर लेना चाहिए। अगर पंडितों को अपनी ज़मीन पर लौटने का हक है तो फिलिस्तीनीयों को भी है। खुद श्रीनिवासन आतंकियों का तर्क प्रयोग कर रहे हैं कि फिलिस्तीन को कतर, सऊदी और कुवैतियों द्वारा जमीन देनी चाहिए थी। वही तर्क जो कश्मीरी अलगाववादी पंडितों के लिए देते हैं कि भारतीय प्रदेशों को उन्हें जगह देनी चाहिए।
भारतीय संसद के प्रस्ताव कि प्रभावोत्पादकता को लेकर श्रीनिवासन पता नहीं ऐसे क्यूँ कह रहे हैं? आखिर और किस देश की संसद के प्रस्ताव को उस देश के बाहर विशेष ध्यान दिया जाता है सिवाय अमेरिका को छोड़ कर। संसद के प्रस्ताव बाहर की बजाए भीतर के लिए अधिक होते हैं। सरकारें भारत कि जनता के प्रति जिम्मेदार होतीं हैं इसलिए अगर इस्रायल के खिलाफ प्रस्ताव पास करने से भारत कि जनता सुकून महसूस करती है तो यह होना चाहिए।


श्रीनिवासन को गुटनिरपेक्षता पिलपिला गणतन्त्र (बनाना रिपब्लिक) लगता है तो यह उनकी समस्या है। नेहरू कि विदेश नीति में विश्व दृष्टि थी लेकिन आज तो वह दृष्टि विहीन है। गुटनिरपेक्षता के कारण ही आज हम यहाँ है नहीं तो अमेरिका या रूस के पुछलग्गू हो कर रह जाते और क्या मालूम “भारत” रह भी जाता या फिर वह भी गाज़ा, फिलिस्तीन और इस्रायल जैसी ही गति पाता। 
फर्स्ट पोस्ट को बेहतर लेखकों का चुनाव करना चाहिए। 

04/07/2014

वेदों का विरोध स्वीकार्य नहीं : स्वरुपानन्द

वेदों का विरोध स्वीकार्य नहीं : स्वरुपानन्द

शंकरचार्य (?) को वेदों का विरोध स्वीकार्य नहीं है। यह होता रहा है। बहुत सी बातें इसलिए सही हैं की शास्त्रों में लिखा है। ये कौन से शास्त्र है कोई नहीं बताता। क्यूँ बताएगा ? कोई देख लेगा कि लिखा है या नहीं। शंकरचार्य ने भी नहीं बताया है की ठीक ठीक कौन सी बातों का विरोध किसने किया है। शुरुआत तो द्वेष की स्वयं शंकरचार्य ने ही की थी जबकि अथर्व वेद का कथन है
.....मा नो विदद्वृजिना द्वेष्या या 
(ऐसे बुरे कार्यों से हम दूर रहें जो द्वेष बढ़ाने वाले हों)
और इस तरह स्वयं स्वरूपनन्द ने साई बाबा को देवता और खुद को मनुष्य सिद्ध कर दिया है क्यूंकी वैदिक साहित्य के अंग शतपथ ब्राह्मण में कहा गया है
.....सत्यमेव देवाः, अनृतं मनुष्याः (देवता सत्याचरण करने वाले और मनुष्य अनृत का आचरण करते हैं )
यजुर्वेद में मनुष्यता के लिए जो प्रार्थना है वह भी श्री स्वरूपानन्द जी भूल गए जिसमें कहा गया है
मित्रस्याहं चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षे।
मित्रस्य चक्षुषा समीक्षामहे।।
 (“मैं सभी प्राणियों को मित्र की दृष्टि से देखूँ । हम सब परस्पर मित्र की दृष्टि से देखें”)

साईं बाबा के प्रति अपने पूर्वगृह के कारण वे न केवल खुद वैदिक विरोधी (वेदाभ्यासजडः) सिद्ध हुये हैं बल्कि वे जिस पीठ के स्वामी हैं उसी के प्रवर्तक आदि गुरु शंकराचार्य के अद्वैत दर्शन के भी विरोधी सिद्ध हुये हैं। 
ॠग्वेद में कहा है
“एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति” 
(एक ही मौलिक सत्ता को विद्वान अलग अलग नामों से पुकारते हैं)
इसी ॠग्वेद के सामंजस्य सूक्त में कहा है
“ येन देवा न वी यंति नो चविद्विशते मिथः।
  तत्कृण्मो ब्रह्म वो गृहे संज्ञानं पुरुषेभ्यः ।। “
 (जिस ज्ञान को प्राप्त करने के बाद विद्वान एक दूसरे का विरोध नहीं करते और आपसी द्वेष समाप्त कर लेते हैं वह सर्वश्रेष्ठ विद्या ब्रह्मविद्या है जिसे हम सभी के घरों में पहुँचने की कामना करते हैं।) और आप तो द्वेष को बढ़ावा दे रहे हैं। आप कैसे ब्रह्म ज्ञानी है ?
स्वयं आदि शंकर ने अद्वैत की स्थापना करते हुये सिद्ध किया था की ब्रह्म ही परम तत्व है और उसकी कोई जाति या धर्म नहीं होता जीव और ब्रह्म दो नहीं, एक हैं और जीव ही वस्तुतः वास्तविक रूप में ब्रह्म है । आदि शंकर प्रत्येक जीव को ब्रह्म मान रहे हैं और आप एक मनुष्य को भगवान मानने से इंकार कर रहे हैं वह भी धर्म के आधार पर ? 
आप भी जानते हैं कि पत्थर देवता नहीं होता ....भक्ति उसे देवता बना देती है। भक्ति की शक्ति का स्रोत “भज गोविंदम” में स्वयं आदिशंकर ने स्पष्ट किया है - 
“जब बुद्धिमत्ता परिपक्व होती है तो हृदय में जमकर जड़ें जमा लेती है, वह प्रज्ञा बन जाती है। जब यह प्रज्ञा जीवन के साथ संयुक्त होती है तथा क्रिया का रूप ले लेती है तब भक्ति बन जाती है। ज्ञान जो परिपक्व होता है भक्ति कहलाता है। यदि यह भक्ति में नहीं बदलता तो निरुपयोगी है।
  

साईं बाबा को आप नहीं मानते ना सही उनके करोड़ों अनुयायी उनके बताए रास्ते को हृदय में जमा कर , उसे जीवन में उतार कर भक्ति के कारण पूजते हैं तो आप परेशान क्यूँ होते हैं ? यदि आप साईं को गलत सिद्ध करना चाहते हैं तो आपको बड़ी लकीर खींचनी पड़ेगी, जैसा की स्वयं आदि शंकरचार्य ने बौद्ध धर्म के सापेक्ष किया था। आपको खुद को छोटा हो कर नहीं , बड़ा होकर जीतना होता है, यही हिन्दू परंपरा है ...उसका पालन कीजिये। 

29/06/2014

कब आएंगे बाल साहित्य के अच्छे दिन ?

आप यह जो किताब देख रहे हैं यह  अन्तरिक्ष यात्री अलेक्सेई लेओनोव द्वारा स्वयं लिखी गयी है जिसे प्रगति प्रकाशन मॉस्को ने सोवियत दिनों में 1978  छापा था और हिन्दी में इसका अनुवाद बुद्धिप्रसाद भट्ट ने किया था।  लेओनोव वे पहले अन्तरिक्षयात्री थे जो अन्तरिक्ष यान से वाह्य अन्तरिक्ष में निकले थे। मुझे यह किताब मेरे चाचा जी श्री प्रदीप दीक्षित ने जन्मदिन के उपहार स्वरूप सन 1982 में दी थी जब में 7 वर्ष का था। एक और किताब थी जवाहरलाल नेहरू कि पिता के पत्र पुत्री के नाम ।  इन दोनों पुस्तकों में एक समानता यह है कि दोनों दो महान लोगों के द्वारा बच्चों के लिए लिखीं गईं। बच्चों से सीधा संवाद। पश्चिम में बहुत से नायकों ने बच्चों के लिए पुस्तकें लिखीं हैं लेकिन  भारत में  ये ना के बराबर हैं। अच्छा बाल साहित्य तो छोड़िए आज हिन्दी में एक भी स्तरीय बाल साहित्य की पत्रिका नहीं है (पराग एक सरहनीय प्रयास था लेकिन वह 90 के दशक के पूर्वार्ध में ही बंद ही गया) हिन्दी लेखक भी बच्चों के लिए लिखने में हिचकते हैं जबकि पश्चिम में अनेक महान लेखकों ने बच्चों के लिए भी लेखन किया है जैसे टोल्स्तोय, चेखोव, हैमिंगवे, अप्टन सिंक्लेयर, जेम्स जॉयस तो मुझे याद आ रहे हैं लेकिन हिन्दी में पंडित नेहरू,  प्रेमचंद को छोड़ कर बहुत नाम नहीं हैं जिन्होंने बच्चों के लिए भी लिखा है।  शायद उन्हें टाइप्ड हो जाते का खतरा रहा होगा लेकिन यह एक आवश्यक परंपरा होनी चाहिए। आगामी पीढ़ी को अच्छे साहित्य, शब्द सम्पदा और अनोखी कलपनशीलता का लाभ भी मिलना चाहिए। शाश्वत भावनाओं की रचनाएँ महान लेखक ही कर सकते हैं। अब प्रेमचंद की कहानी ईदगाह के आधारमूल्यों की तुलना भला कहाँ है।  भारत में न जाने कितने खिलाड़ियों, वैज्ञानिकों, इंजीनियरों ने सफलता और साहस की ऐसी मिसालें पेश की हैं जिन्हें हर कोई सुनना, पढ़ना चाहेगा और बच्चे तो विशेष तौर पर। लेकिन ऐसे उदाहरण बहुत कम हैं जब किसी महापुरुष ने बच्चों के लिए खुद कोई पुस्तक लिखी हो। ज़रा सोचिए एक बच्चा खुद सचिन द्वारा लिखी गयी खुद के लिए रोचक शैली में लिखी पुस्तक से जितना अभिभूत और प्रेरित होगा उतना किसी दोयम दर्जे के लेखक द्वारा गूगल से उठा कर नीरस भाषा में लिखी गयी सचिन  कि जीवनी से नहीं। इसी तरह एक महान लेखक द्वारा लिखी एक कहानी ही बच्चों को शाश्वत मानवीय मूल्यों का एहसास करा सकती है। चेखोव की "लाखी" या  "वांका"  और प्रेमचंद की ईदगाह जैसी कहानियाँ गहन प्रभाव डालती हैं।

कभी कोफ्त होती है कि हिन्दी में अच्छा बाल साहित्य नहीं है। और देशों की ओर देखता हूँ तो लगता है ऐसा हमारे यहाँ क्यूँ नहीं हो सकता। जो कुछ थोड़े प्रयास थे भी वे अब बंद हैं। ना तो हिन्दी के बड़े लेखक बच्चों के साहित्य में रुचि लेते हैं और न ही बच्चों के साहित्य में बड़े लेखक हैं। ना संपादक और ना ही प्रकाशन इस क्षेत्र में रुचि लेते हैं। राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, नेहरू बाल पुस्तकालय जैसे प्रतिष्ठानों ने काम तो बहुत किया है लेकिन यह भी सरकारी विभागों के दोषों से पूर्णतया मुक्त नहीं है। नए लेखक भी आए हैं पर सभी पाठकों का रोना रोते हैं । जबकि पाठक है .....वे पढ़ना भी चाहते हैं लेकिन समस्या है कि लेखन उनके मनोनुकूल नहीं है। बाल साहित्य का मतलब भारत में नैतिक शिक्षा हो चुका है। किताब उठाते ही अगर उपदेश शुरू हो जाएंगे तो भला कौन पढ़ना चाहेगा। यह सही है कि बाल साहित्य सोद्देश्य हो लेकिन यह एक कला है कि यह उद्देश्य आप साहित्य के मूल "मनोरंजन" को ध्यान में रख कर दी जाए। भारत में जब भी कुछ लिखा जाता है वह रामायण, महाभारत, पुराण से आगे नहीं निकाल पाता। आज तो बाल साहित्य कम, बाल साहित्य पर शोध पुस्तकें बहुत सी हैं ...हद है ।

अभी हाल ही में एक अनुभव हुआ ।  बेटी के स्कूल में पीटीएम में तथा कथित पुस्तक मेला भी लगता है और पुस्तक प्रेमी होने  के नाते शिक्षिका के साथ कम पुस्तक मेले में ज्यादा समय व्यतीत करता हूँ। वहीं एक बार जब मैं कुछ पुस्तकें देख रहा था तो एक मम्मी और बेटी की नौंक झौंक कानों में पड़ी। बिटिया को चाहिए थी कोई पुस्तक , शायद वह डिस्कवरी चैनल पर देख कर उत्साहित थी और ग्रहों के बारे में एक मोटी सी किताब  पकड़े थी उधर मम्मी (वे दाम को लेकर ज्यादा परेशान नहीं हो सकतीं थीं क्यूंकी जिस गाड़ी से वे आयीं थीं हमारे लिए वह सपना ही है। लेकिन फिर भी वे असहज थीं। झुंझलाहट बढ़ी और उन्होने  किताब लेने से साफ  मना कर दिया। आखिर बेटी भी उन्हें की थी सो वह इंगलिश ग्रामर कि एक किताब ले आई और ज़ोर से बोली " ये वाली तो तुम ले ही लोगी न ? लेकिन आज में कोई किताब लिए बिना नहीं जाऊँगी" मम्मी ने अपनी लाज रखते हुये वही किताब ले ली सो भी यह कहते हुये " पहले अपनी पढ़ाई तो कर लो फिर फालतू कि किताबें पढ़ना"। मेरे अंदर से आवाज़ आई कि उन्हें कहूँ, समझाऊँ कि अभी अभी आपने जिज्ञासा। कलपनशीलता और मौलिकता कि हत्या कर दी, अभी अभी आपने मैकाले के सपने को और सच्चा कर दिया, अभी अभी आपने एक भारतीय प्रतिभा की लौ को बुझा दिया। एक और वाकया है एक दुकान पर मुझे  गुलज़ार की "गोपी गायन बाघा बायन"  किताब दिखी मैं उसे उठाने बढ़ा कि एक और महिला ने उसे देख लिया । समवयस्क थीं सो उनकी आँखों में भी बचपन की वही यादें तिरती देखीं जो मेरी आँखों में थीं। वे भी दूरदर्शन के उस सीरियल को याद करके भावुक थीं। सहसा अपनी बिटिया से कह उठीं ...देखो "गोपी गायन...." और फिर कुछ हुआ ..... बचपन को ठेल कर अनुशासन का पर्दा खिंच गया । कठोर भाव बना कर वे स्टेशनरी के रैक पर मुड़ गईं। काश वे समझ पातीं कि बच्चों को कोर्स के अलावा इन किताबों की कितनी जरूरत है। स्कूल में लाइब्रेरी देखी तो विशाल मात्रा में फेमस 5, नैन्सी ड्रू जैसी सामान्य सीरीज़ तो थीं लेकिन अच्छा साहित्य एक अलमारी में सिमटा था और हिन्दी में तो कुछ था ही नहीं। पता नहीं बाल साहित्य के अच्छे दिन कब आएंगे (बाल नरेंद्र जैसी चापलूसी की बजाय अगर नरेंद्र मोदी खुद बच्चों के लिए अपने अनुभव लिखते तो शायद कुछ बात बनती)

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अनतोन चेखोव की मार्मिक कहानी लाखी

26/06/2014

अग्निवर्षा के बीच पानी मौजूद है : बुद्ध ग्रह

अग्निवर्षा के बीच पानी मौजूद है : बुद्ध ग्रह


हाल ही में अमेरिकी अन्तरिक्ष एजेंसी नासा द्वारा भेजे गए ग्रहीय यान मसेंजर (संदेशवाहक) ने बहुत से आंकड़े और तस्वीरें भेजीं हैं। वैज्ञानिक इन तसवीरों का विश्लेषण करके बुद्ध से संबन्धित अपनी संकल्पनाओं को और सटीक बनाने में जुटे हुये हैं। इसी क्रम में एक चौंकाने वाले अनुमान को बल मिला है कि बुद्ध ग्रह पर भी पानी की मौजूदगी संभव है।
बुध है कुछ खास: 
सूर्य से सबसे नजदीक होने के कारण बुध सभी ग्रहों से खास है। यह सबसे छोटा ग्रह भी है हमारे सौर परिवार का। प्राचीन सभ्यताओं में भी इसे पहचान लिया गया था। ग्रीक साहित्य में इसे अपोलो (भोर) और हरमिस (शाम) के नाम से जाना जाता है। यह ग्रह अपनी धुरी पर 175.97 पृथ्वी दिनों में अपनी धुरी पर घूम जाता है जबकि अपनी कक्षा में सूर्य का मात्र 58 पृथ्वी दिनों में यह चक्कर पूरा कर लेता है। यानि बुध पर दिन, साल से छोटा होता है। मतलब यह कि आप बुध पर अपना जन्मदिन लगभग रोज़ मना सकते हैं। बुध का वातावरण बेहद जटिल और विषम है। यहाँ अधिकतम तापमान 450°C और न्यूनतम तापमान – 170°C से भी नीचे चला जाता है। वातावरण ना नन के कारण बुध पर लगातार उल्कापात होता रहता है जिसके कारण पूरा ग्रह उल्का क्रेटरों से भरा है। 1500 किलोमीटर व्यास का  कैलोरिस बेसिन नामक क्रेटर ना केवल बुद्ध का सबसे बड़ा बल्कि सौर मण्डल का सबसे बड़ा क्रेटर है। 
अरेशीबो वेधशाला का है कमाल  कई वर्षों से प्योर्तो रिको स्थित अरेशीबो वेधशाला बुध ग्रह का प्रेक्षण कर रही है। 1000 फीट व्रस की यह वेधशाला विश्व की सबसे बड़ी एकल रेडियोवेधशाला है जिसे 1960 में स्थापित किया गया था। इसी वेधशाला की मदद से गॉर्डन पेटेंगिल्स और उनके साथियों ने यह पता लगाया था कि बुध ग्रह मात्र 59 दिनों में अपनी धुरी का एक चक्कर पूरा कर लेता है जबकि पहले यह माना गया था कि बुद्ध का परिभ्रमण काल 88 दिन है। अरेशीबो वेधशाला से ही वैज्ञानिकों ने न्यूट्रोन तारे के अस्तित्व की पुष्टि की, पहले द्वितारे (बाइनरी) खोजे और पहली बार सौर परिवार से बाहर के ग्रह खोजे। जेम्स बॉन्ड की फिल्म गोल्डन आई के अलावा यह वेधशाला द स्पीशीज़ और X- फाइल्स जैसी प्रसिद्ध फिल्मों में भी दिखी है। कुछ समय से इसे सेटी (SETI: search for Extraterrestrial Intelligence) के प्रोजेक्ट हेतु भी उपयोग किया जा रहा है।
अरेशीबो संकल्पना : अरेशीबो द्वारा एकत्रित आंकड़ों के आधार पर निर्मित रेडियो चित्रण से पता चला कि बुध के सभी हिस्से समान रूप से रेडियो किरणों को परावर्तित नहीं करते। कुछ हिस्से जो अधिक मात्र में परावर्तन करते हैं वे मुख्य रूप से ध्रुवों के आस पास स्थित हैं। इस विषय में एक
संकल्पना यह थी कि संभवतः इन हिस्सों में जमी हुयी बर्फ है जो अधिक परावर्तन का कारण है। मेसेंजर यान द्वारा भेजी गयी तसवीरों को जब अरेशीबो वेधशाला के रेडियो चित्रों के साथ मिलाया गया तो पता चला कि अधिक परावर्तन वाले ये हिस्से (पीले स्थान) दरअसल क्रेटर हैं और अधिक परावर्तन वाले हिस्सों की संख्या ऊतरी ध्रुव की ओर बढ़ती जाती है। इसके अलावा यह भी देखा गया कि ये सभी हिस्से बुध के ध्रुवों के उन हिस्सों में स्थित हैं जहां सूर्य की रोशनी नहीं पहुँच पाती (लाल रंग ) अर्थात बड़े और गहरे क्रेटरों कि तलहटी या दीवारें। दरअसल बुध सूर्य से सबसे करीब स्थित ग्रह है। इसी वजह से प्रकाशमान हिस्सों में यहाँ तापमान लगभग 400° C से अधिक हो जाता है लेकिन क्रेटरों की तलहटी में जहां सूर्य कि किरणें नहीं पहुँच पातीं तापमान – 170°C से भी नीचे चला जाता है। इतने कम तापमान पर उल्काओं के साथ आया पानी यहाँ जमा रह सकता है।
तस्वीरें व संदर्भ : नासा (शैक्षणिक एवं सामान्य ज्ञान हेतु उपयोग) 

25/06/2014

दो मुहाँ


ऑरलैंडो, फ्लोरिडा  के साठ वर्षीय पॉल हेनेसी को वन्य जीवन और आश्चर्यजनक चीजों की छवि उतारने में मज़ा आता है। विश्व प्रसिद्ध नेशनल  ज्योग्राफिक पत्रिका में उनका लिया गया  यह छविचित्र अनोखा है। यह एक दोमुहें होण्डुरन मिल्क स्नेक का छविचित्र है जिसे स्थानीय विश्वविध्यालय के जीव विज्ञानी की सहायता से लिया गया है । यह एक अल्बिनो है जिसका मतलब है इसमें कुछ रंग प्रदर्शित  वाले जीन नहीं हैं। ऐसे साँप जहरीले नहीं होते। यह बहुतायत में कनाडा, अमेरिका, इक्वेडोर, वेनेज़्वेला आदि देशों में मिलता है। अपने बचाव के लिए इसके शरीर के रंग और डिजायन एक अन्य जहरीले कोरल साँप से मिलते जुलते हैं। इन्हें मिल्क स्नेक नाम इनके बारे में प्रचलित एक मिथक से पड़ा की ये गायों के थनों से दूध चूस लेते हैं हालांकि यह केवल एक मिथक ही है। ये साँप रात में निकलते हैं और चूहे, कीड़े और छिपकलियाँ खाते हैं। प्रकृति के इस खूबसूरत प्राणि को आप भी देखिये। 

09/04/2014

आज़म खाँ ने एक हाल ही में कहाँ कि कार्गिल युद्ध मुसलमान सैनिकों की वजह से जीता। बवाल मचने पर बयान से मुकर गए। अंदरखाने की खबर यह है कि वे कहना चाहते थे कि कारगिल में भारत ने तो पूरा ज़ोर लगाया लेकिन जीते हम इसलिए क्यूंकी मुसलमान सैनिक जो पाकिस्तान की सेना में थे भाग गए। जीते ना हम मुसलमान सैनिकों की वजह से।

(वैसे भी भारतीय सेना में इंसान होते हैं)

23/03/2014

क्वीन - उथले तर्क और स्वाभाविक अभिनय वाली मनोरंजक फिल्म

भारतीय फ़िल्मकार न जाने क्यूँ हर बार असफल होते हैं जब वे कोई अच्छे मुद्दे उठाने की कोशिश करते हैं। अक्सर व्यावसायिकता के चलते ऐसे हर मुद्दे को उठाना तो दूर वे उचका भी नहीं पाते। क्वीन भी एक ऐसी ही फिल्म है। सुना था कि यह हीरोइन आधारित फिल्म है जो कि मुंबई फिल्म जगत में एक रिस्की काम है। फिल्म एक मध्यवर्गीय लड़की की शादी से शुरू होती है और लड़के द्वारा शादी से एक दिन पहले मना कर देने जैसे खतरनाक मोड से होती हुयी हनीमून पर अकेले जाने जैसे अभूतपूर्व निर्णय से गुजरती है और अंततः गुजरिया के सस्तेपन में खो कर साधारण रूप से खतम हो जाति है। लड़की अपने हनीमून के टिकट को बेकार ना करते हुये पहुँच जाती है पेरिस। यहाँ उसकी मुलाक़ात भारतीय मानस की एक ऐसी फेंटेसी से होती है जो बड़े अजीब ढंग से दशकों से जस की तस बनी हुयी है – विदेशी औरत – मतलब शराब पीने और सिगरेट पीने वाली व एक ऐसी औरत जो समान्यतः या तो तलाक़शुदा होती है या बिन ब्याही माँ और जो हर समय संगीत की धुन पर मटकती रहती है या सेक्स करती रहती है – इस फिल्म में उसका नाम विजयलक्ष्मी है। यह चरित्र मुख्यतः पेरिस जैसे हाइपरमेट्रोपॉलिटन शहर में रानी की सहायता करता है और हर भारतीय फिल्म चरित्र की तरह फिल्मी है। रानी अनेक पबों, स्ट्रिप क्लबों और ऐसी ही अन्य बदनाम जगहों में घूमती, दारू पीती और एम्स्टर्डम में के एक हॉस्टल में एक रूसी (शायद रुसियों का नाम एलेक्ज़ेंडर कि जगह एलेक्सान्द्र होता है), जापानी जिसे  और फ्रांसीसी लड़कों के साथ रूम शेयर करती एक इतावली को चूमती हुयी आखिर आत्मविश्वास पा लेती है और अपने उस मंगेतर से पीछा छुड़ा लेती है जो अचानक रानी द्वारा निराशा में भेजी चेंजिंगरूम कि एक तस्वीर को देख कर फिर उससे शादी करने की इच्छा जाहिर करता है। मुझ जैसे कहानी प्रिय व्यक्ति को यह समझने में थोड़ी दिक्कत हुयी की रानी को इस यात्रा में आखिर कौन से मूल्यों ने उसे आत्मविश्वास दिया और वह अपने मंगेतर की अंगूठी लौटाने का फैसला करती है।  इस फिल्म की एक किरदार रोक्ज़ेट या रुखसार है जो एक स्ट्रिप क्लब में इसलिए काम करती है कि करने को कोई काम नहीं है, रिसेशन है और जब तक जॉब नहीं है यही है। यह खतरनाक सांस्कृतिक प्रदूषण है। स्ट्रिप क्लबों में काम करने का यह तर्क निश्चित रूप से खतरनाक है और जिस आयु वर्ग के लिए है उसे स्ट्रिप क्लबों कि असलियत भी पता नहीं है। यह अमेरिकी संस्कृति का वह अंग है जिससे खुद अमेरिकी भी परेशान हैं। हाल ही में एक अमेरिकी पिता अपनी बेटी के द्वारा अपनी कॉलेज फीस के लिए पॉर्न फिल्म में काम करने के निर्णय से परेशान नज़र आया। वह बेटी भी शायद हॉलीवुड की ऐसी ही फिल्मों के उथले तर्कों से प्रभावित रही होगी। नारी सशक्तिकरण देह बेच कर नहीं बल्कि देह से मुक्त हो कर संभव है। देह से मुक्ति का मतलब आत्मनिर्णय का अधिकार है। स्ट्रिप क्लब ऐसी जगह नहीं होते जहां आप सुरक्षित घूम सकें। रानी स्ट्रिप क्लब में दोस्तों के साथ प्लेटोनिक भावना के साथ घूमती है जो दरअसल बचकाना है। गूगल पर जाइए और शूटिंग एट स्ट्रिप क्लब्स टाइप करके जान लीजिये कि ये जगहें अपराध, नशा और वेश्यावृत्ति के वे गहरे दलदल हैं जहां अमेरिकी सभ्य समाज नहीं जाता। ये जगहें उतनी ही बदनाम हैं जितनी भारत की सोनगाछी या जी बी रोड बस हालत पैसे के मुताबिक वहाँ चमक दमक ज्यादा है लेकिन शोषण उतना ही है। बताता चलूँ कि रोकजेन नाम से द पुलिस नामक बैंड का एक गाना है भी है जो एक ऐसे लड़के कि तरफ से है जो एक वेश्या को प्यार कर बैठता है और वह इसे ग्लोरीफ़ाई नहीं करता है।
इस फिल्म का मुद्दा एक लड़की का आत्मविश्वास है जिसे पाने का नुस्खा हमारे फ़िल्मकार आजकल बरास्ता पश्चिम, पब और सेक्स में खोज रहे हैं। ह्यू हैफनर (प्लेबॉय पत्रिका के मालिक और अमेरिका में अश्लीलता की गंगा बहाने वाले) के दर्शन वाली आज के जो दिखता है वही बिकता है” की मार्केटिंग करने वाली, अस्वाभाविक पात्रों वाली हल्की फिल्म में अगर कुछ स्वाभाविक है तो कंगना का अभिनय। दिल्ली कि एक मध्यमवर्गीय लड़की के किरदार में जो स्वाभाविकता है वह फिल्म को मनोरंजक बनाए रखती है।  

11/02/2014

60 वर्ष गए पिक्चर अभी बाकी है

60 वर्ष गए पिक्चर अभी बाकी है
आज भारतीय राजनीति जिस बहुराहे पर खड़ी है वहाँ से आगे जाने का रास्ता सावधानी और उच्च सिद्धांतों के आलोक में तय किया जाना चाहिए। हमारी राजनीतिक व्यवस्था बहुदलीय लोकतन्त्र पर आधारित है और इस व्यवस्था का मुख्य पहलू है दलीय प्रतिस्पर्धा। दुर्भाग्य से आज़ादी के आंदोलन में मुख्य भूमिका निभाने वाले नेताओं और संस्थाओं ने पार्टियों का रूप लेकर इस प्रतिस्पर्धा का गला घोंट दिया और आज़ादी को महज़ सत्ता हस्तांतरण बना दिया गया। 1947 में चुनावी राजनीति में कांग्रेस और इसके सभी नेताओं से परे कोई सोच नहीं थी और इसी पूर्ण सहमति ने पहले आम चुनाव को जहां अभूतपूर्व रूप से सफल बनाया तो दूसरी ओर इसने बहुदलीय व्यवस्था को अप्रासंगिक बना दिया।  संसदीय व्यवस्थ में विपक्ष का महत्वपूर्ण स्थान होता है और एक मजबूत विपक्ष एक अच्छी सरकार का आश्वासन भी होता है। लेकिन कांग्रेस के सर्वाधिकार ने भारतीय संसदीय व्यवस्था में कभी भी एक मजबूत विपक्ष को उभरने नहीं दिया। आज़ादी को लेकर जो गरिमा, स्फूर्ति और आशा पूरे देश में फैली थी उसे आगे की पीढ़ियों में हस्तांतरित करने की प्रक्रिया को भी इस प्रवृत्ति ने बाधित किया। एकाधिकार और निर्विरोध चुनाव ने कांग्रेस को एक ओर वंशवादी बना दिया तो दूसरी ओर जनता को यथास्थितिवादी। विपक्ष का कमजोर विकास राजनीति में निजी स्वार्थों को सर्वोपरि रखने वाले लोगों के लिए वरदान बन कर आया। ऐसे में कुनिर्णयों, दुर्भाग्य और परिवार्तनों के दौर में सत्ता पर पकड़ बनाए रखने के लिए एकाधिकारवादी और अवसरवादी दोनों ने मिल कर देश की राजनीति को ठीक उन्हीं बिन्दुओं पर ला कर खड़ा कर दिया है जिनसे आज़ादी पाने के लिए हमने अंग्रेजों से लड़ाई लड़ी थी। इसी अवसरवाद ने ठीक अंग्रेजों की तरह भारतीय समाज के तानेबाने में मौजूद सभी दरारों को और बड़ा किया एवं नयी दरारें भी ईज़ाद की गईं। जाति, भाषा, धर्म और क्षेत्रीयता के जिन मुद्दों के लिए आशा की गयी थी कि स्वशासन के दौर में ये मुद्दे पृष्ठभूमि में चले जाएंगे उन्हीं मुद्दों के सहारे गैर कांग्रेसी दलों ने अपने पैर जमाने की कोशिश की। इस तरह देश की राजनीति ने कल्याणकारी की बजाए जातिवाद, सांप्रदायिकता, क्षेत्रीयता और कट्टरवाद का रास्ता चुन लिया। इस राजनीति ने आज़ादी के बाद के सुनहरे सपनों को ज़मीन पर उतारने की कोशिश करने की बजाए यथास्थितिवाद को प्राथमिकता दी। इस राजनीति ने कर्तव्यबोध और काम करने की संस्कृति की बजाए चापलूसी, भाई भतीजावाद और रिश्वतख़ोरी को जन्म दिया। जनता के मोहभंग और क्षेत्रीय, भाषायी, धार्मिक और जातिवादी राजनीति के कारण जब कांग्रेस का एकाधिकार दरकने लगा तो अब यथास्थिति बनाए रखने के लिए इन्दिरा गांधी द्वारा प्रतिबद्ध नौकरशाही, न्यपालिका और दमन का सहारा लिया गया और फिर आपातकाल जैसे गैर लोकतान्त्रिक कदम भी उठये गए और अंततः पीछे के दरवाजे की राजनीति भी आरंभ हुयी जब कि बूथ कैप्चरिंग, राजनीतिक हत्याएँ, पुलिस और खुफिया तंत्र का इस्तेमाल सत्ता पाने या गिराने में होने लगा। बूथ कैप्चरिंग, आलोकतांत्रिक तरीकों के क्षेत्र में भारत का आविष्कार था। इस तरीके ने राजनीति में अपराधियों के लिए एक बेहतर रोजगार का अवसर पैदा किया और 70 के दशक में बिहार, बंगाल और उत्तर प्रदेश में अनेक ऐसे अपराधी बकायदा विभिन्न चुनावी हथकंडों की संगठित सेवा देने लगे। राजनीति और अपराध नजदीक आ गए। प्रतिबद्ध नौकरशाही, न्यायपालिका और पुलिस की अवधारणा ने ट्रांसफर-पोस्टिंग, थानों की नीलामी, पदों की नीलामी और काले धन का प्रचलन बढ़ा दिया। सार्वजनिक जीवन से कर्तव्य, आदर्श और शुचिता के सभी आग्रह समाप्त हो गए और भारतीय जनता अपने संतोषी सदा सुखी को आदर्श मान कर अपने खोल में दुबक गयी। अनेक विफल और अधूरी क्रांतियों के बाद अंततः अब कोई राष्ट्रकवि भी नहीं है। देश के इतिहास में अनेक भीषण मानवीय त्रासदियाँ हुईं पर भारतीय कला चुप रही। समाज की अभिव्यक्ति लुप्त हो गयी। 84 के दंगे हुये, आपातकाल के सितम, नर-संहार, युद्ध, क्रांतियाँ, गरीबी, आतंकवाद और फिर दंगे लेकिन कलाकार, साहित्यकार, संगीतकार चुप रहे। जैसे जैसे देश में निराशा घर कर रही थी कला का फ़लक भी स्याह होता जा रहा था। फिल्मों, संगीत, चित्रकला में उत्तरोत्तर अश्लीलता भी बढ़ रही थी। साहित्य भी चुप ही रहा बल्कि साहित्य भी राजनीतिक-सामाजिक क्षरण के प्रभाव से नहीं बच पाया और इस दौर में प्रकाशस्तंभ की बजाए महज आईना बन कर रह गया। साहित्य भी राजनीति की भांति जातिवादी, खेमेबाजी, धार्मिक और अवसरवादी हो गया। अब हमारे पास कहानीकार नहीं बल्कि दलित या स्त्री या मुस्लिम कहानीकार होते हैं। अब साहित्य रसास्वादन के लिए नहीं बल्कि खेमेबाजी के लिए लिखा जाता है। साहित्य अब राजनीति की B टीम बन गया है। यह वह साहित्य नहीं जो जनसंवेदनाओं को जगाए बल्कि यह उसे भ्रमित करने वाला और बांटने वाला साहित्य है। उयाह कुरीतियों पर कुठराघात नहीं करता बल्कि नयी कुरीतियाँ पैदा और पुष्ट करता है। यह जनता से दूर है और राजनीति के करीब। यह वह आईना है जो उल्टी तस्वीर दिखाता है। यह मूल्यों को पीढ़ियों में हस्तांतरित करने में रुचि नहीं दिखाता। यह नई पीढ़ी के लिए कुछ नहीं देता।
आज़ादी के भंग सपने और जीवन की जद्दोजहद में हमने एक आलसी, यथास्थितिवादी, और असंवेदनशील समाज विकसित कर लिया है। पुरुषार्थ और कर्मवाद के जन्मदाता देश में इन्हीं मूल्यों को खो दिया गया। यह हताशाजनक ही है कि 65 आज़ाद वर्षों बाद भी आज विश्व में सर्वाधिक गरीब, अशिक्षित, कुशासित और प्रदूषित देशों में हम गिने जाते हैं। देश में शिक्षा का जो ढांचा अंग्रेज़ विकसित कर गए थे हम उसी के खंडहरों पर खड़े हैं। शिक्षा के क्षेत्र में नवीनता के नाम पर सिर्फ पब्लिक स्कूल और उनकी विशालकाय इमारतें, भारी बस्ते, भीषण फीस,  ठूँसे हुये दिमाग और ठस शिक्षक ही हैं हमारे पास। कोई नया विचार, आंदोलन नहीं है। सब कुछ सरकार पर निर्भर है।

भारतीय समाज के मानस में अंग्रेजों ने हीन भावनाओं ने जो बीज बोये थे और हमें भरोसा दिलाया था कि हम एक समाज के तौर पर विफल हैं, वे अब फल दे रहे थे। हम एक विफल समाज के रूप में विकसित होते जा रहे हैं। हमारे यहाँ व्यक्तिगत उपलब्धियां बहुत हैं पर सामूहिक सफलताएँ कम। व्यक्तिगत रूप से हम विदेशों में जा कर बड़ी सफलताएँ हासिल करते हैं पर सामाजिक तौर पर हमारी उपलब्धियां शून्य हैं। देश में धन का उदारीकरण तो हो गया पर मन का उदारीकरण होना बाकी है। पुराने मूल्यों को तो हमने त्याग दिया है पर नए श्रेष्ठ मूल्यों का निर्माण अभी बाकी है। देश पुनः एक बहुराहे पर खड़ा है। 

28/01/2014

राष्ट्रपति के नाम पत्र

महामहिम राष्ट्रपति को पत्र
राष्ट्रपति उद्वेलित हैं । उन्होने अपने भाषण में अपनी व्यथा सामने रखी। लगभग पूरा भाषण वर्तमान राजनैतिक परिदृश्य के इर्दगिर्द केन्द्रित रहा।
राष्ट्रपति जी आपके भाषण ने मुझे अचंभे में डाल दिया है। प्रश्न उमड़ रहे हैं पर उत्तर नहीं मिल रहे तो सोचा आपसे ही पूछ लूँ।
राष्ट्रपति जी अपने कहा है कि -
 महामहिम जी जनता कभी विश्वासघात नहीं करती बल्कि वह तो विश्वासघात का शिकार होती है। इलेक्शन वाच नामक संस्था ने एक लिस्ट दी है। इसमें वर्तमान कुल 536 लोकसभा सांसदों में से 160 के खिलाफ आपराधिक मामले चल रहे हैं और इनमें 76 के खिलाफ गंभीर किस्म के मामले है। इनमें से 28 सांसद यूपीए के हैं (14 कांग्रेस, 8 सपा और 6 बसपा) और 20 बीजेपी के हैं। क्या संविधान की मूल आत्मा और उसके महान रचयिताओं का यह आशय रहा होगा कि हत्या, अपहरण और बलात्कार के दोषी लोकतन्त्र के मंदिर में बैठ कर उस पवित्र भरोसे को तोड़ें जिसका आपने ज़िक्र किया? क्या आप अपने भाषण में इन्हीं खामियों की ओर इशारा कर रहे थे – सत्ता के लालच के लिए क्या राजनीतिक पार्टियां आत्मतुष्टि और अयोग्यता को प्रश्रय दे कर सर्वोच्च लोकतान्त्रिक संस्था संसद को कमजोर नहीं कर रहीं और लोकतन्त्र में हमारे पवित्र भरोसे का मज़ाक नहीं उड़ा रहीं, जो इस खुले खेल के बावजूद भी 65 वर्षों से कायम है और ईश्वर ही जानता है कि कब तक कायम रहेगा?
आपने कहा है कि चुनाव किसी व्यक्ति को भ्रांतिपूर्ण अवधारनाओं को आज़माने की अनुमति नहीं देते तब शायद आप इंगित कर रहे होंगे कि किस तरह आज बिना स्पष्ट अवधारणाओं के मात्र चुनाव जीतने कि क्षमता को देख कर ही पार्टियां टिकट बँटतीं हैं और सत्ता के लिए बिना स्पष्ट अवधारणाओं के गठबंधन करतीं हैं। क्या आप आज की इस विडम्बना पर तंज़ कसना चाहते थे कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस तो कब की विलुप्त हो चुकी है और वर्तमान कांग्रेस असल में कांग्रेस (आई) का ही विस्तार है। इसके पदाधिकारी अक्सर अपनी पार्टी की नीतियों के खिलाफ खड़े हो जाते हैं और विचारधाराओं वाले मंचों पर पारिवारिक कहानियाँ सुनाते हैं। क्या आप कांग्रेस के उस विद्रूप की ओर तो इशारा नहीं कर रहे थे जो इसकी कथनी और करनी में झलकता है। कांग्रेस का हाथ आम आदमी के साथ और कांग्रेस खुद पूँजीपतियों के हाथ। वहीं दूसरी ओर समाजवादी पार्टी बस नाम के लिए समाजवादी है और उसमें वह तमाम तत्व शामिल हैं जिनका समाजवाद से नहीं अराजकतावाद से सीधा नाता जरूर है। उधर भाजपा कि विचारधारा भी दिग्भ्रमित करने वाली है। वे कहते कुछ हैं और करते कुछ हैं। मोदी जी विकास पुरुष बना दिये गए हैं लेकिन गुजरात अभी भी सामाजिक विकास के महत्वपूर्ण मानदंडों पर पिछड़ता जा रहा है, लेकिन मैं भ्रमित हूँ कि आपने “व्यक्ति” क्यूँ कहा ? क्या आप किसी खास व्यक्ति को इंगित कर रहे थे ? बेशक ऐसी स्थिति किसी भी लोकतन्त्र के लिए खतरनाक है जहां सभी जिम्मेदार पार्टियां का कोई विज़न न रह जाए और वे आकंठ भ्रष्टाचार में डूब कर पूँजीपतियों के हाथ का खिलौना बन जाएँ। निश्चित ही आप दुखी हैं कि पार्टियों और सरकारों के लिए जनकल्याण की बजाए स्व कल्याण ही मुख्य मुद्दा रह गया है। आपने सही कहा है कि सरकार कोई खैराती संस्था नहीं है जो अपने सदस्यों की  तिजोरियाँ भरने के काम आए। आखिर कैसे कोई सरकार कैसे देश के संसाधनों को खैरात में बाँट सकती है। कोयला, प्रकृतिक गैस और स्पेक्ट्रम जैसे महत्वपूर्ण संसाधनों की खैराती बंदरबाँट को कोई कैसे सही मान सकता है।
मैं तब भी भ्रमित हुया जब आपने कहा कि लोकलुभावन अराजकता शासन का विकल्प नहीं हो सकती। आप किस अराजकता की बात कर रहे थे ? राज्य की सम्पूर्ण शक्ति के बावजूद दंगे और हत्याएँ होना 1984, 1991, 2002, 2013 निरंतर अलग अलग सरकारें और पूर्ण सत्ता फिर भी ऐसी अराजकता? घोटालों के गवाहों की जेलों में हत्या, ईमानदार अफसरों और पत्रकारों कि सड़क पर हत्या। नेताओं पर हत्या, रेप और अपहरण के केस दर्ज होना और न्यायालय के आदेश को पुनः इन अपराधी नेताओं के पक्ष में पलट देना भी तो अराजकता ही है – लोकप्रिय अराजकता। राष्ट्रपति जी महाराष्ट्र में गणतन्त्र दिवस के अगले दिन एक नेता द्वारा खुले आम अपने लोगों को चुंगीनाका पर हमला करते और हिंसा करने का आदेश देना, उत्तर भारतियों के खिलाफ मुहिम चलना और निरंतर अल्पसंख्यकों के खिलाफ जहर उगलना यही दिखाता है कि लोकप्रिय अराजकता अब शासन का विकल्प बन चुकी है। ओवैसी के जहरीले भाषणों के बावजूद वे जब सदन में दिखते हैं तो विश्वास पक्का होजाता है कि लोकलुभावन राजनीति अब सुशासन का विकल्प बन चुकी है।


पता नहीं लोग क्यूँ कह रहे थे की आपका भाषण अरविंद केजरीवाल और उनकी आम आदमी पार्टी की निंदा है। पर मुझे लगा कि आप भी केजरीवाल की ही भांति हमारी सरकारों, नेताओं और पार्टियों की ही आलोचना कर रहे थे। क्यूंकी जनता के हित के लिए शांतिपूर्ण प्रदर्शन और शासन पर हिंसक हमले में वही अंतर है जो लोकतन्त्र और लोकलुभावन अराजकता में हैं। आप केजरीवाल द्वारा बिजली और पानी पर सबसिडी को बेशक खैरात नहीं कह रहे थे क्यूंकी आप महामहिम जानते हैं कि जनकल्याण खैरात नहीं अधिकार है।

गणतन्त्र का नागरिक 

अनुपम दीक्षित