15/01/2013

कच्छ नहीं देखा तो कुच्छ नहीं देखा-2

कच्छ का नक्शा
कच्छ और भुज - भूगोल: भुज एक प्राचीन स्थान है। करीब 10-12 वर्ष पूर्व एक भीषण भूकंप ने इसे नष्ट कर दिया था। तब से यह प्राचीन शहर फिर से उठ खड़ा हुआ है और मानुषी जीजीविषा का उदाहरण है। देश का दूसरा सबसे बड़ा ज़िला कच्छ कई कारणों से विशिष्ट है। कच्छ से कुछ याद आता है आपको..... नहीं? सोचिए क्या यह किसी जानवर का नाम है ----चलिये बताए देते है, कच्छप या कछुए से बना है यह शब्द। असल में बारिश के बाद इस क्षेत्र में पानी भर जाने के कारण यह पूरा क्षेत्र द्वीप बन जाता है और कछुए की पीठ जैसा दिखता हैं। यह क्षेत्र बहुत रोचक है। गुजरात राज्य का यह हिस्सा सिंधु नदी के प्रवाह क्षेत्र का भाग हुआ करता था और जलनिमग्न रहता था लेकिन 1819 के भीषण भूकंप ने इस क्षेत्र का भूगोल बादल दिया। भूकंप से पड़ी दरारों के कारण एक हिस्सा ऊपर उठ गया और सिंधु नदी का मार्ग परिवर्तित हो कर और पश्चिम की ओर चला गया। इस जगह को आज पाकिस्तान के सिंध प्रांत में देखा जा सकता है और इसका बहुत ही उपायुक्त नामकरण हुया है - “ अल्लाह बन्ध”। तो इस तरह यह हिस्सा शुष्क होने लगा। लेकिन आज भी बारिश में यह भूमि पानी से तर हो जाती है और इसकी विशिष्ट मिट्टी दलदल बन जाती है। जब पानी धीरे धीरे वाष्पीकृत हो जाता है या ज़मीन में सोख लिया जाता है तब इस मिट्टी पर नमक की सफेद पर्त जम जाती है। नमक के कारण यह भूमि वनस्पति विहीन है लेकिन फिर भी कहीं कहीं खेती होती नज़र आती है। कटा-फटा होने के कारण इस क्षेत्र में अनेक प्रकृतिक बंदरगाह हैं। मांडवी, कांडला और मूंदड़ा बन्दरगाह प्रमुख व्यस्त बन्दरगाहों में हैं। कच्छ का तटीय प्रदेश मैदानी है और खेती होती हैं। मुख्य रूप से सरसों, कपास और मोटे अनाज उगाये जाते हैं।
कच्छ का दक्षिणी हिस्सा डेक्कन ट्रेप की चट्टानों से बना है और उत्तरी हिस्सा सिंधु, घग्घर और लूनी के जलोढ़ अवसादों से। इनके बीच में रेगिस्तानी रण (रेगिस्तान) है। इसमें भारत के सबसे पुराने डायनासोर अवशेष मिले हैं यद्यपि गुजरात सरकार ने इन्हें प्रमुखता नहीं दी है अपने पर्यटन नक्शे पर।
अन्वी और विश्वम कपास के खेत में - मांडवी से भुज के रास्ते में 
कच्छ में सफर करते समय आपको दूर तक या तो नमक के मैदान नज़र आते हैं या फिर घास वाली ज़मीन। इसे बन्नी मैदान कहते हैं। हाँ जब आप मांडवी की ओर जानते है तो तटवर्तीय इलाकों में सरसों और कपास के खेतों की भूरी और पीली कतारें आपका मन मोह लेतीं हैं( दिसंबर जनवरी में ).

NRI गाँव :  भुज एक छोटा सा शहर है। स्टेशन से होटल तक के रास्ते में भारत के अन्य अधिकांश शहरों की तरह ही झुग्गियाँ और गंदगी आपका स्वागत करती है।  लेकिन अंदरूनी शहर बनिस्बत साफ है और इसका एक कारण मुझे स्थानीय टेम्पो चालक ने बताया कि यह सब निर्माण 9 से 5 वर्ष ही पुराना है । भूकंप के बाद पूर्णतया बर्बाद हो चुके शहर ने फिर अपनी रफ्तार पकड़ ली है और इंडियन एक्सप्रेस अखबार के हवाले से आपको यह भी बताता चलूँ की भुज में विदेशी निवेश भी तेजी से बढ़ा है। भूकंप से पूर्व यह बहुत कम था जबकि पिछले वर्ष तक यहाँ 2000 करोड़ से भी अधिक का निवेश हो चुका है। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हमने भी देखा। अपनी यात्रा के अंतिम दिन हम मांडवी तट जा रहे थे। रास्ते में एक सूनसान लेकिन खूबसूरत गाँव दिखा। ध्यान गया की यहाँ ज़्यादा चहल पहल नहीं थी लेकिन घर बड़े अच्छे थे परंतु अधिकांश में ताले जड़े हुये थे। टैक्सी ड्राइवर और चाय विक्रेता ने बताया की यह NRI गाँव है। यहाँ के लगभग सभी निवासी एनआरआई हैं और यहाँ सिर्फ केयरटेकर रहते हैं। फिर तो इसे केयरटेकरों का गाँव भी कह सकते हैं। शायद दईसारा नाम था।  


भुज के दर्शनीय स्थल : 

हिल गार्डन :- 
होटल के बाहर - सपरिवार 
हमने 1 जनवरी को भुज पहुँच कर होटल प्रिंस में कमरे लिए और सामान जमा कर नहाया धोया। नाश्ता और आराम करके यह तय किया गया की शाम को पास ही में हिल गार्डन देख लिया जाय। इसके बारे में ममेरे भाई ने पहले ही बता दिया था कि बच्चों के लिए बहुत अच्छा है। हिल गार्डन काफी बड़े क्षेत्र में फैला है और मुख्यतः बच्चों के लिए झूले 
हिल गार्डन 
और राइड्स का बहुत बढ़िया स्थान है। यह रोटरी क्लब द्वारा संचालित है और अनेक लोगों के धर्मार्थ दान से बना है। सभी झूले और पार्क दान दाताओं ने बनवाए हैं और इनका प्रयोग मुफ्त है। पार्क में प्रवेश शुल्क भी मात्र 2 रुपये है। बच्चों ने यहाँ खूब मज़े किए।
 यहाँ एक अक्वेरियम भी है जहां बहुत सी मछलियाँ प्रदर्शित की गईं हैं और साथ में एक विशाल ब्लू व्हेल का कंकाल भी है जो इस अद्भुत और सबसे बड़े जीवधारी के आकार काआभास  दिलाता है 


दुनियाँ के विशालतम जीव ब्लू व्हेल का कंकाल - हिल गार्डन भुज 

कुल मिला कर बच्चों के लिए बढ़िया जगह रही और बच्चे खुश तो बड़े भी खुश। यह देख कर भी सुखद आश्चर्य हुया कि अनेक स्कूल भी यहाँ आए दिन बच्चों को लाते हैं। यह सिलसिला और दिनों भी देखने को मिला जब हम कच्छ संग्रहालय देखने गए। एक छोटा सा लेकिन दर्शकों से भरा संग्रहालय देख कर मन प्रसन्न हो गया।  ऐसा चलन अपने तथाकथित हॉट सिटी शहर गाजियाबाद में तो असंभव ही लगा। यहाँ अव्वल तो पार्क या संग्रहालय हैं ही नहीं और हैं भी तो उनमें बच्चों के खेलने पर मनाही है क्यूंकी पार्क के जॉगिंग रास्ते और पौधे खराब हो जाते हैं और लायन्स व रोटरी क्लब प्रतिवर्ष मेले आयोजित करवाते हैं। काश ऐसा ही कोई प्रयास यहाँ भी होता। गाजियाबाद शहर में भी एक संग्रहालय होना चाहिए। आखिर इस ज़िले का इतिहास भी सिंधु सभ्यता के महत्वपूर्ण स्थल "आलमगीरपुर" से जुड़ा है जो हिंडन नदी के किनारे स्थित था और सबसे पश्चिमी स्थल था। इसके अलावा, महाभारतकालीन,मुगल कालीन और 1857 से जुड़े इस शहर में आज गुंडा राज है और एक ढंग का पुस्तकालय भी नहीं है। घूमने की जगहों के नाम पर ले दे कर मॉल हैं बस। 
हिल गार्डन पार्क का विहंगम दृश्य


शक सम्राट चष्टन का अंधाऊ अभिलेख : कच्छ संग्रहालय भुज 
कच्छ संग्रहालय:  हमारे होटल से नजदीक ही स्वामीनारायण चौक से कुछ दूरी पर एक छोटा सा संग्रहलय है। हमारे पास बहुत समय नहीं था क्यूंकी हमने इसे अपनी यात्रा के अंतिम दिन स्टेशन जाते समय देखा था लेकिन इस संक्षिप्त दर्शन में ही हम बहुत प्रभावित हुये। यहाँ भी हमें 4-5 स्कूलों के बच्चे मिले जिनके उत्साह से संग्रहालय गुंजायमान था। इतिहास और  वर्तमान का मिलन खूबसूरत था। यहाँ धोलावीरा के कुछ अवशेष हैं। सबसे खास है शक क्षत्रपों के तिथि सहित प्रस्तर अभिलेख।भारत में पहला   साम्राज्य चाणक्य और चन्द्रगुप्त मौर्य ने स्थापित किया था और इसमें महान अशोक जैसा शासक हुआ था। उसने गुजरात पर शासन भी किया था जिसका प्रमाण उसका जूनागढ़ अभिलेख है। मौर्य साम्राज्य के विघटन के बाद इस क्षेत्र में ईसा की पहली शताब्दी में पहले शक फिर कुषाण शासकों का अधिकार रहा। यह दोनों ही भारतीय नहीं बल्कि चीन के पश्चिमी क्षेत्र की क़बायली जनजाति थे। चीनी शासक शी हुआंग ती  द्वारा जब चीनी सीमा पर दीवार खड़ी कर यू-ची जाति को सीमा से भगाया गया और उधर उत्तर में हूणों की गतिविधियों से शक जाति पहले मध्य एशिया  के बल्ख क्षेत्र में सीर दरिया और आमू दरिया के दोआब में बस गयी।यू-ची  तिब्बत और बल्ख पहुंचे और बल्ख में शकों को खदेड़ कर यहाँ बस गए। भगाये गए शक सिंधु नदी पार करके भारत में प्रविष्ट हुयी और भारत में पहलव शासकों को पराजित कर यहाँ दो शाखाओं में बाँट गए। उत्तरी क्षत्रप जो तक्षशिला और मथुरा में थे तथा पश्चिमी क्षत्रप जो नासिक और उज्जैन के शासक थे। ये स्वयं को क्षहरात क्षत्रप कहते थे।उधर यू-ची  भी  भारत आ पहुंचे और बिखरते मौर्य साम्राज्य पर कब्जा कर लिया।  इनका आगमन भारतीय जाति व्यवस्था के लिए असमंजस भरा था। ये विदेशी थे इसलिए अछूत थे परंतु शासक भी थे। केवल यही नहीं कुषाण, पहलव, और ग्रीक भी थे। इनसे अनेक संकर पैदा हो चुके थे अतः यही समय था जब लचीली हिन्दू जीवन शैली ने सत-क्षत्रिय और असत-क्षत्रिय की दो श्रेणियाँ बना कर इन्हें भी क्षत्रिय वर्ण में शामिल कर लिया गया। असल में वर्ण -संकर जैसे सिद्धान्त का जन्म ही इसी आवश्यकता से हुआ क्यूंकी शक्ति और सत्ता के विदेशी स्वामियों को म्लेच्छ कह कर खारिज नहीं किया जा सकता था। बहरहाल गुजरात का यह क्षेत्र ईसा की प्रथम शताब्दियों में एक उथल पुथल भरे दौर से गुजर रहा था। इस क्षेत्र का सबसे प्रसिद्धा राजा चष्टन था। इसके अभिलेखों में कच्छ, सौराष्ट्र और मालवा जैसे प्रदेशों का उल्लेख हुआ है। चष्टन  का 11वे वर्ष का एक अभिलेख यहाँ कच्छ संग्रहालय में है। चष्टन  एवं रुद्रदामन के अन्य अभिलेख भी यहाँ हैं। आपको बताता चलूँ की इन्हीं शक क्षत्रपों के नाम से एक नया संवत शुरू हुया था जिसे शक संवत कहते हैं। यद्यपि इसके आरंभ की तिथि 78 इसवीं है जो कुषाण शासक कनिष्क के राज्यारोहण की तिथि है। इन विदेशी जनजतियों ने भारत में स्थिरता पायी और इन्हें यहाँ बहुत कुछ सीखने को मिला। भारत के साथ सभी आक्रमणकारियों का यह अनुभव रहा। वे सब यहाँ आए, लड़े और फिर यहीं के हो गए चाहे शक हों, कुषाण हों, तुर्क या मुग़ल हों। जय शंकर प्रसाद की इन पंक्तियों का शायद यही अर्थ भी है -


अरुण यह मधुमय देश हमारा,
जहां पहुँच अंजान क्षितिज को मिलता एक सहारा । 

और तभी विदेशियों के दिल से निकलता है 

"गर फिरदौस बर रूए ज़मीं अस्त, हमीं अस्त, हमीं अस्त।"

यह सभी विदेशी जनजातियाँ यहाँ आयीं और यहाँ की संस्कृति में घुल मिल गईं। वे लुटेरे नहीं थे। उन्होंने यहाँ की दौलत अपने देशों को नहीं भेजी  । और इनके आने से भारतीय संस्तृति और विविधतापूर्ण  हुयी। इस उपमहाद्वीप को हिंदुस्तान नामक देश बनाने में इस प्रक्रिया का भी हाथ है। यही मेल मिलाप का वह आंतरिक सूत्र है जो अंग्रेजों के आने से पहले भी सांस्कृतिक रूप में मौजूद था। यही कारण है कि हिंदुस्तान महज़ एक भौगोलिक इकाई नहीं था जैसा कि अंग्रेज़ इतिहासकारों ने लिखा है बल्कि एक देश था जिसे आप आस पास के अन्य देशों से अलग करके पहचान सकते थे। 
                                     दुनियाँ लोकतन्त्र का जन्मदाता फ्रांस को मानती है पर मेरे विचार से तो भारतीय हिन्दू संस्कृति ही लोकतन्त्र का जीता जागता उदाहरण है । आखिर और कौन सा धर्म इतनी विविधताओं को समेत सकता है वह भी अद्भुत समन्वय के साथ। यहाँ वैदिक देवताओं के साथ ही शैव, शाक्त, गाणपत्य, सौर, वैष्णव, जैन और बौद्ध धर्मों का संगम निरंतर प्रवाहित है।

 मुझे गर्व है अपने भारत पर और अपनी संगमी संस्कृति पर। इसीलिए मैं गुजरात गया और वहाँ की प्रशंसा कर रहा हूँ तो इसका अर्थ यह नहीं है कि मैं नरेंद्र मोदी जी के हिन्दुत्व प्रयोगों से सहमत हूँ। बेशक गुजरात प्रभावित करता है और उनमें विकास की संभावनाएं हैं परंतु अपनी स्वतन्त्रता की कीमत पर मैं उन्हें स्वीकार नहीं कर सकता पीएम के तौर पर। याद रखिए कि दुनियाँ के सभी तानाशाहों ने बहुत तेज़ आर्थिक विकास का दावा किया था, चाहे वह हिटलर हो, सोवियत रूस के शासक हों, मुसोलिनी, या जापान और चीन हों, लेकिन लोगों और समाज के प्रति उनकी सोच संकुचित, खतरनाक और पश्चगामी थी - इतिहास गवाह है। 


सोमनाथ मंदिर का खंडित बाहरी हिस्सा 
कच्छ मूजियम में वह पखवाड़ा सोमनाथ मंदिर दर्शन पखवाड़ा भी था और इस अवसर पर सोमनाथ मंदिर के कुछ पुराने अवशेष और एक चित्र प्रदर्शनी भी आयोजित की गयी थी। सोमनाथ पर कन्हैया लाल माणिक लाल मुंशी की "जय सोमनाथ" जब से पढ़ी थी सोमनाथ देखने का मन था। यहाँ इस इच्छा की आंशिक पूर्ति हो गयी। अनेक चित्रों और लेखों से समृद्ध यह प्रदर्शनी सोमनाथ के इतिहास के बारे में अनेक तथ्य बताती है। लीजिये आप भी देखिये एक चित्र। पूरा मजा तो वहाँ जा कर ही आएगा। 


धोलावीरा : 
धोलावीरा का प्रस्तर कुंड 
कच्छ के खादर प्रदेश में भुज के उत्तर में स्थित है एक छोटा सा गाँव धोलावीरा डॉ आर एस बिष्ट और उनकी टीम के अद्भुत प्रयासों से आज प्राचीन विश्व इतिहास के नक्शे पर सबसे महत्वपूर्ण जगहों में से एक है। यह युनेस्को के विश्व धरोहर सूची में भी शामिल है। श्री बिष्ट के अथक प्रयासों का आरंभ 1960 ई0 में हुआ था और एक प्राचीन शहर का यह उत्खनन 1990 तक चलता रहा। विभाजन के बाद सिंधु सभ्यता का भारत में स्थित यह सबसे बड़ा स्थल बन गया और साथ ही यह उन छ्ह सैन्धव महानगरों में से अभी सबसे बड़ा है जो आज से तकरीबन 5000 वर्ष पहले भारत की शान हुआ करते थे। जब यूरोप जंगलों में घूम रहा था तब सात नदियों से सिंचित इस प्रदेश के मानव अपने शिल्प, उद्यमशीलता और नवीन प्रयोगों से मानव के भविष्य का इतिहास रचने में व्यस्त थे। सिंधु प्रदेश के इन निवासियों ने न केवल व्यापार और कृषि का विकास किया बल्कि दुनियाँ में सबसे पहली बार व्यवस्थित नगरों , पक्के मकानों, जल प्रबंधन, मानक माप और तौल की प्रणालियाँ और नगर सफाई व्यवस्था का भी ईजाद किया। सिंधु वासियों ने ही विश्व को सुई और कपास से परिचित कराया और सिले वस्त्र बनाए थे। सिंधु सभ्यता ही उस समय एकमात्र ऐसी सभ्यता थी जिसमें पक्की ईटों से बने घर और उनसे निकालने वाली गंदगी के प्रबंधन के लिए पूरे नगर में नालियों की व्यवस्था की गयी थी और सबसे ज्यादा ध्यान इस बात पर जाता है की ये नालियाँ ढँकी हुयी थीं। सफाई का ऐसा आग्रह न जाने आज कहाँ खो गया है! न जाने क्यूँ जिस देश ने आधुनिक शहरी स्वच्छता की नींव डाली उसी के शहर गंदगी से बजबजाते क्यूँ हैं? ढोलावीरा तो इन सभी नगरों में खास था। यह सिंधु नदी के मुहाने पर मनसर और मनहर नदियों के दोआब (आब शब्द फ़ारसी से आया है और इसका अर्थ है पानी या नदी, आबोहवा या आबोदाना भी अब शायद आपको समझ में आगए होंगे और ध्यान पेशाब पर भी गया होगा वैसे संस्कृत "आप" भी इसके नजदीक है  और आपको पता होना चाहिए की संस्कृत और फ़ारसी दोनों बहनें हैं - दोनों ही इंडो-ईरानियन भाषा से निकलीं हैं और ऐसा ही रिश्ता अङ्ग्रेज़ी और हिन्दी का है दोनों भाषाएँ इंडो - यूरोपियन भाषा से निकलीं दो बहनों लैटिन और संस्कृत की बेटियाँ हैं । तो हिन्दी हमारी मातृभाषा है और अङ्ग्रेज़ी मौसी है और मौसी चाहे जितनी अच्छी क्यूँ ना हो माता सदैव प्यारी ज्यादा होती है। इसीलिए यह ब्लॉग भी हिन्दी में है ) में बसा यह शहर एक औद्योगिक महानगर था और शायद सबसे समृद्ध भी। इसका खूबसूरत स्थापत्य और अनोखी जल प्रबंधन व्यवस्था सबसे उल्लेखनीय है। जल प्रबंधन के लिए इस नागर में एक 80 मीटर लंबा विशाल चट्टान को काट कर बनाया गया टैंक अनोखा है। पूरे नगर के चारों ओर कुओं और कृत्रिम तालाबों की एक व्यवस्था थी। ढोलावीरा भारत के अनेक स्थानों से व्यापारियों को आकर्षित करता था जो अपने सामान को सिंधु मुहाने स्थित लोथल बन्दरगाह से मकरान तट, अदन की खाड़ी, लाल सागर और मिस्र व मेसोपोटामिया (आज का ईराक) तक ले जाते थे। 


यहाँ पर्यटकों के रुकने के लिए जीटीडीसी का होटल तोरण है। भुज से अगर आप 6 -7 बजे तक निकल सकें तो यहाँ 12 बजे तक पहुंचा जा सकता है। रोड से यह 230 KM के लगभग है। खाना वगैरह साथ रखें और पहुँचने से पहले ही खा पी लें तो 2 घंटे में आप इस जगह को देख कर अगर 3 बजे तक भी निकाल सकें तो रात 8 बजे तक वापस भुज लौट आएंगे। एक व्यावहारिक सलाह है की अगर साथ में छोटे बच्चे हों तो ऐसा तूफानी दौरा न करें। बच्चों को इन खंडहरों में कोई मज़ा नहीं आएगा। 





क्रमशः 




09/01/2013

कच्छ नहीं देखा तो कुच्छ नहीं देखा


कच्छ नहीं देखा तो कुच्छ नहीं देखा

गाजियाबाद स्टेशन पर ट्रेन का इंतज़ार 
यात्रा की तैयारी और प्रस्थान: मेरे श्वसुर जब से रिटायर हुये हैं अपने अधूरे सपनों को पूरा करने के मिशन पर हैं। वर्षों तक राज्य कर विभाग की शुष्क नौकरी करने के बावजूद जिंदगी में रस वे खोज ही लेते हैं। इस मिशन का आरंभ उनकी अंडमान यात्रा से हुआ था। उसकी प्लानिंग में मैंने सहयोग किया था। उसी दौरान कच्छ के रण उत्सव का प्रचार किसी अखबार में निकला तो उनहोने वहाँ भी नव वर्ष मनाने की ठान ली। अब इतनी यात्रा की प्लानिंग आप करेंगे तो मन में कुबुलाहट तो होने ही लगेगी ना सो मेरे मन में भी कच्छ देखने की लालसा जाग उठी। फिर तीन दिन टेंट में बिताने की बात ही कुछ और है। पर जाने आने और ठहरने में कुल 7 दिन चाहिए थे और भला आजकल की जिंदगी में इतनी बड़ी छुट्टी के बारे में सोचना ही अपने आप में एडवेंचर स्पोर्ट जैसा है। मन फिर भी वहीं लगा रहा। पत्नी भी डॉक्टर है और 7 दिन की छुट्टी मुश्किल है। तो लगभग आइडिया ड्रॉप ही कर दिया था की तभी चाचा जी कानपुर से सपरिवार आए हुये थे। बातों बातों में चर्चा पापा जी की यात्राओं की योजनाओं पर चल पड़ी तो जैसा की होना था आनन फानन में उनहोने भी कच्छ देखने की इच्छा व्यक्त कर डाली। चर्चा हुयी और तय पाया गया की 7 दिन की छुट्टी किसी भी तरह हासिल और प्रबंधित की ही जाए। चाचा जी ने फौरन अपने ट्रेवेल प्लानर को फोन करके 6 ट्रेन टिकट गाजियाबाद से भुज आला हज़रत एकक्स्प्रेस से बुक करने का आदेश दे डाला। फिर क्या था। मैंने भी अगली साप्ताहिक छुट्टी में दिल्ली कनाट प्लेस में स्थित गुजरात टूरिज़म के दफ्तर पहुँच कर टेंट बुक करा ही दिये।एसी टेंट का किराया 9500 रुपये प्रति व्यक्ति था और साथ में प्रत्येक यात्री की फोटो और मुख्य लोगों का पहचान पत्र आवश्यक था। एक टेंट 2 व्यक्तियों के लिए है और अतिरिक्त बिस्तर के लिए 4500 रुपये और लगेंगे। यह एक महंगा सौदा लगा। इसके बाद शुरू हुयी छुट्टियों की प्लानिंग। जैसे तैसे कर के हम सब ने छुट्टियों की प्लानिंग कर ही डाली। बीच में एक वह भी पल आया जब लगा कि अब कोई नहीं जा पाएगा। पर आखिर अमिताभ की पुकार ही भारी पड़ी। इस बीच मैंने इन्टरनेट,  गूगल मैप, यात्रा डॉट कॉम आदि स्रोतों से भुज के मौसम, होटल और दर्शनीय स्थलों की वास्तविकता के बारे में कुछ जानकारी हासिल कर ली। मेरा यात्रा के विषय में यह विश्वास है कि होटलों का चुनाव करते समय अगर आप 5 स्टार के व्यसनी नहीं हैं तो सबसे पहले राज्य टूरिज़म के होटलों को देख लेना चाहिए। ये होटल ना केवल अच्छी जगहों पर स्थित होते हैं बल्कि सस्ते, ठीक ठाक सेवा वाले होते हैं। जिन राज्यों का टूरिज़म विभाग बहुत अच्छा है उनमें मुझे सबसे बढ़िया केरल और गुजरात ही लगा। लेकिन भुज में GTDC (Gujarat Tourism Development Corporation) का कोई होटल नहीं था अतः GTDC की वेब साइट पर ही सुझाए गए एक होटल प्रिस रेसिडेन्सी को चुन लिया। मेरा एक ममेरा भाई भी भुज में 4 वर्षों तक रह चुका था अतः उससे भी जानकारी ले ली गई।उसके अनुसार ही दिन में आप एक स्वेटर या कोट के साथ काम चला सकते हैं लेकिन रात में तापमान 14 डिग्री के करीब पहुँचने पर आपको जैकेट आदि की जरूरत पड़ती है। भुज में हवाएँ तेज़ चलतीं हैं इसलिए टोपी और मफ़लर भी आवश्यक हैं। बच्चों के लिए विशेष तौर पर। बच्चे साथ में थे और मौसम ठंडा था अतः हम यात्री धर्म की एक शर्त निभाने में नाकाम रहे - सीमित सामान। हमारे और पापा जी के मिला कर कुल 14 अदद हो चुके थे और गाजियाबाद स्टेशन पर कुली नहीं मिलते हैं यह सोच कर मैं थोड़ा परेशान था। अतः ड्राइवर के साथ ही ऑफिस में काम करने वाले गुड्डू को भी साथ ले लिया गया। ट्रेन 10:50 AM पर थी और हम ठीक 10 बजे स्टेशन पर पहुँच गए। इसका एक कारण यह भी था कि मैंने सभी को ट्रेन का समय 9:50 एएम बता रखा था। 31 दिसंबर 2012 को गाजियाबाद स्टेशन घने कुहासे में ढका था। स्टेशन की गंदगी, बू और भीड़ से जूझते हमने आखिरकार सारा सामान एक जगह लगा लिया। अब शुरू हुआ ट्रेन का इंतज़ार और जैसी कि स्वाभाविक ही था ट्रेन तय समय से 1 घंटा विलंब से पहुंची। A-1 और B-2 बोगी में हमारी सीटें थीं। सारा सामान जमा कर हम भी अपनी सीटों पर जम गए और ट्रेन चल पड़ी।
आला हज़रत एक्स्प्रेस  से सूर्यास्त 
भारतीय रेलवे की दुर्दशा : दुनिया की सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण रेल प्रणाली पर हमें गर्व है लेकिन उतना ही दुख भी कि यह अपने यात्रियों को सही सेवा उपलब्ध नहीं करा पाती। बेहद गंदी और उपेक्षित इस ट्रेन में एसी 2 टायर में भी बाथरूम प्रयोग लायक नहीं थे, कूड़ेदान बजबजा रहे थे और सीटों से काकरोच झांक रहे थे। पर्दे अपनी जगह रहें इसलिए यात्रियों ने ही पिनों और कीलों से उन्हें रोक रखा था। भारतीय रेल को अपनी दशा सुधारनी ही चाहिए। थोड़ा किराया बढ़ा कर अगर व्यवस्था सुधरती हो तो क्या बुरा है? फिर अकेले किराए से ही काम नहीं चलेगा कार्यसंस्कृति भी विकसित होनी चाहिए। कर्मचारियों की ज़िम्मेदारी ताया होनी चाहिए और यात्रियों को भी शिकायत पुस्तिका का प्रयोग करना चाहिए। कम से कम दो क्षेत्र तो ऐसे है जिनमें बिना पैसे बढ़ाए ही सुधार लाया जा सकता है पहला है कि प्रत्येक स्टेशन पर कूड़े की सफाई और बाथरूम की सफाई होनी चाहिए और दूसरा खान पान को ले कर बेहतर विकल्प उपलब्ध होने चाहिए। ट्रेन में जो भी खाना हमने लिया वह बिलकुल भी खाने लायक नहीं था। यह कोई सरकारी खैरात नहीं थी जिसे बिना गुणवत्ता देखे ले लिया जाए जैसा कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली या मिड ड़े मील मैं होता है। यहाँ तो हम निजी वेंडरों से पैसे दे कर खाना खरीद रहे हैं। 40 रुपये की प्लेट में चावल, 2 रोटियाँ, तीन सब्जियाँ, पापड़, आचार, गुलाबजामुन और दही शामिल करने की क्या जरूरत है अगर ये सब खाने लायक ही ना हों। इसके बजाए अगर आप 40 रुपये में केवल 4 पूरियाँ और एक सब्जी ही रखें लेकिन वह उचित गुणवत्ता की हो तो अधिक सुकून मिलेगा। दाल में दाल थी ही नहीं और आलू सड़े हुये थे। चावल तो ऐसे कि छूने को बन ना करे। दही तो सफ़ेद पानी था और गुलाब जामुन की तो जाने दीजिये। रेलवे प्रबंधन को इस ओर तुरंत ध्यान देने की जरूरत है। खैर अन्य सभी यात्रियों कि तरह और एक अच्छे भारतीय नागरिक की तरह हमने संतोषी सदा सुखी का आदर्श मानते हुये यात्रा का आनन्द लेने लगे। साथ में और भी कई परिवार थे जो रण उत्सव में ही जा रहे थे। बातें करते और खाने पीने में दिन बीता और रात सोने में। अन्वी ने आस पास के बच्चों से दोस्ती कर ली और सारे रास्ते बतियाते,रूठते मानते रहे। विश्वम ने भी यात्रा का मज़ा लिया और सारे रास्ते गुजरात का इंतज़ार करता रहा। यह उसकी पहली लंबी ट्रेन यात्रा थी। मुझे अपना बचपन याद आ गया। मुझे ट्रेन बहुत पसंद है। इसकी तुलना आप किसी से नहीं कर सकते विशेष तौर पर भाप के इंजन वाली ट्रेन से। ऐसी खूबसूरत मशीन मानव ने शायद ही और कोई बनाई हो। शायद ट्रेन कि इसी हसीन चाल से प्रेरित हो कर दुष्यंत कुमार ने लिखा होगा

 “वोह ट्रेन सी गुजरती है मैं पुल सा थरथराता हूँ”

ट्रेनों और स्टेशनों पर मुझे हमेशा ही अच्छा लगता है। शायद आप महसूस कर सकें कि स्टेशन की आवाजें, बू, स्टाल, यात्रियों की भीड़ और चहल पहल, पीली और सफ़ेद रोशनियाँ, एनाउंसमेंट सब कुछ मिल जुल कर कैसा माहौल बनाते हैं। कम ही होंगे जिनहोने ट्रेन की खिड़की से बाहर पटरियों का तेज़ खेल ना देखा हो। ती इन्हीं विचारों में खोया जागा पहुँच गया गुजरात के शहर भुज।