30/11/2012

धारा 19 बनाम धारा 66


पिछले दिनों मुंबई के एक स्थानीय नेता के निधन के बाद जैसा माहौल बिके हुये समाचार चैनलों ने बनाया उससे लगा जैसे इसके अलावा और कोई जरूरी मुद्दे नहीं हैं। बॉलीवुड के घाघरे में हर समय घुसे रहने वाले इन चैनलों को शाहरुख, सलमान बच्चन से अगर फुर्सत मिलती है तो कैमरा टिकता है ऐसे नेताओं पर जिनकी दुकान ही चलती है चुन चुन कर भारत के संविधान द्वारा प्रदत्त गारंटियों को ध्वस्त करने से। ये बिके चैनल हर सामान्य कलाकार से उसकी खबर के ऐवज में पैसे मांगते हैं, हर अखबार खबर के बदले विज्ञापन चाहता है। न्यूज़ चैनलों पर या तो नेताओं और एंकरों की फिक्स लफ़्फ़ाजियाँ होतीं हैं या फिर करोड़ों रुपये ले कर फिल्मों और सीरियलों के प्रचार। कोई ढंग की स्टोरी, खबर से अब इनका नाता नहीं रहा। जनता का सरोकार जनता की रुचि के नाम पर स्वाहा कर दिया गया है लेकिन मुंबई के कार्टूनिस्ट और स्वयंभू हिन्दू हृदय सम्राट 
के निधन पर लगभग पूरा पखवाड़ा ही स्वाहा कर दिया गया। उन महान नेता के व्यक्तित्व पर खूब चाशनी लपेटी गयी और भरा पूरा श्रद्धांजली वाला माहौल बनाया गया। 
                             फेसबुक पर एक लड़की द्वारा ऐसे ही माहौल पर प्रश्न खड़ा करना उस नेता के पिछलग्गुओं (अनुयाई सिद्धांतों के लिए प्रयोग  किया जाता है ) और इनसे भयभीत राज्य का वह महकमा जो असल में जनता को भयमुक्त करने के लिए था, इन लड़कियों को भयभीत करने में जुट गया। मुंबई पुलिस को आधा घंटा भी नहीं लगा यह सुनिश्चित करने में की इन लड़कियों ने, जिनमें से एक ने तो केवल उस पोस्ट को लाइक ही किया था, सूचना तकनीक कानून की धारा 66ए का उल्लंघन किया है और माननीय न्यायाधीश को उससे भी कम समय लगा उन नागरिकों के प्रथम दृष्टया अपराध निर्धारित करने में। और उन गुंडों को तो खैर और भी कम समय लगा लड़की के रिश्तेदार डॉक्टर का क्लीनिक ध्वस्त करने में। इस चापलूसी, भय और राजनौतिक मजबूरी के कुहासे में यह तथ्य कहीं खो गया की फेसबुक पर महाज़ 200 शब्दों की छोटी से टिप्पणी अगर सेडिशन और व्यवस्था के लिए खतरा हो सकती है तो फिर उन दिवंगत महान नेता के वे जहर बुझे वाक्य क्यूँ नहीं सेडिशन, अराजकता का खतरा जैसी चिंताएँ नहीं उठा सके? आखिर धारा 19 का ध्यान मुंबई पुलिस को क्यूँ नहीं आता और क्यूँ नहीं कोई न्यायालय धारा 19 के उल्लंघन को निर्धारित नहीं कर पाते। (धारा 19 हमारे संविधान में है और नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता कुछ प्रतिबंधों के साथ देती है।)


संविधान द्वारा मिले अधिकार: संविधान का अनुच्छेद १५ हमें आश्वासन देता है कि हमसे भारत देश में धर्मजाति,मूलवंशलिंग या जन्मस्थान के आधार पर विभेद नहीं किया जाएगा. अनुच्छेद १६ के द्वारा संविधान सरकारी नौकरियों में  न केवल अवसर की समानता देता है बल्कि यह भी सुनिश्चित करता है कि हमसे धर्मजातिमूलवंशलिंग या जन्मस्थान के आधार पर विभेद ना हो. इसी प्रकार अनुच्छेद १९ प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति एवं अन्तःकरण की स्वतंत्रता प्रदान करता है. हमें यही अनुच्छेद सम्पूर्ण भारत में घूमने फिरनेकहीं भी बस जाने और कोई भी व्यवसाय कहीं भी करने का अधिकार देता है.
परन्तु अभिव्यक्तिका यह अधिकार निर्बाध नहीं है. इन स्वतंत्रताओं पर रोक भी लग सकती है यदि इनका प्रयोग भारत कि एकताअखंडतासंप्रभुतालोकव्यवस्थाविदेशी राज्यों के साथ मैत्री पूर्ण संबधों पर विपरीत असर डालने में किया जायेगा. संवैधानिक पदों पर व्यक्ति को प्रतिज्ञन करनी होती है उसका पूरा खाका भी संविधान कि एक अलग सूची (तीसरी अनुसूची) में किया गया है. प्रत्येक विधायकसांसद और मंत्री को संविधान के प्रति निष्ठा कि और एकता व अखंडता को सुरक्षित रखने कि शपथ लेनी होती हैं.

अब यदि उपरोक्त तमाम कानूनों के प्रकाश में हम बाल ठाकरेउद्धव ठाकरे और राजठाकरे के वक्तव्यों को देखें तो प्रथम दृष्टया यह स्पष्ट हो जाता है कि उनके वक्तव्य संविधान विरोधी हैं.

बैंक या रेलवे के परीक्षर्थियों पर हमला और उन्हें परीक्षा से वंचित करना अनु० १५ और १६ का उल्लंघन है. साथ ही यह ऐसी अभिव्यक्ति है जो लोकव्यवस्थाएकताअखंडता,संप्रभुता पर विपरीत असर डालती है अतः इसकी अनुमति किसी संगठन को नहीं दी जा सकती (अनु० १९).

पाकिस्तान या ऑस्ट्रेलिया के खिलाडियों सम्बन्धी राज - बाल ठाकरे के बयान निश्चित तौर पर विदेशी राज्यों से संबंधों पर विपरीत असर डालते हैं और अनु ० १९ का उल्लंघन करते हैं.

उत्तर भारतीयों को मुंबई से भगानेउन पर हमला करने जैसे कृत्य अनु० १५१६ कीबखिया उधेड़ते हैं तो एक राजनीतिक दल के रूप में चुनाव आयोग की आचार संहिता का उल्लंघन भी करते हैं. चुनाव आयोग एक संवैधानिक निकाय है और राजनैतिक दलों के लिए निर्धारित आचार संहिता के पहले पैराग्राफ में ही लिखा है कि "कोई भी पार्टी ऐसीकिसी गतिविधि में शामिल नहीं होगी जो धर्मंजातिसमुदाय या भाषा के आधार पर विभेद पैदा करती हो." पर शिवसेना आदि दल ऐसा ही करते हैं औरखुले आम करते हैं. 

ये दल स्वयं को सांस्कृतिक दल कहते हैं परन्तु इनकी कार्यवाहियां हिंसकफासीवादी और अलगाववादी हैं. यह दल इसी अराजकता के सहारे थोड़ी सी राजनैतिक शक्ति जुटा कर क्षेत्रीय राजनीति में सौदेबाजी करते हैं और तो और केंद्रीय राजनीती को भी प्रभावित करते हैं. यह भी संविधान का उल्लंघन ही है क्यूंकि संविधान लोकतान्त्रिक व्यवस्था कि गारंटी देता है जबकि यह दल हफ्ता वसूली दल कि भांति काम करते हैं. शिवसेना केवल मुंबई कि राजनीती कर के स्वयं को पूरे महाराष्ट्र का ठेकेदार मानती है. २८८ में से केवल १३ सीटें जीतने वाले दल आखिर राजनीती कि दिशा क्यूँ तय करेंइस प्रकार शिवसेना हमारी लोकतान्त्रिक व्यवस्था पर हर दृष्टि से प्रश्नचिंह लगाती है.  है कोई कानून जो इन महान नेताओं को नाथ सके



(भारत भाग्य विधाता के भरोसे अपलोड कर रहा हूँ )

21/11/2012

हंगामा है क्यूँ बरपा !

एक भारतीय दांत चिकित्सक महिला की आयरलैंड में इसलिए मौत हो गयी क्यूंकी डॉक्टर ने उसकी जान बचाने के लिए आवश्यक होते हुये भी गर्भपात करवाने से इनकार कर दिया क्यूंकी उसका कानून इसकी इजाज़त नहीं देता। इससे पुनः आइरिश कानून पर बहस छिड़ गयी है और भारत ने तो बकायदा आयरलैंड को सलाह भी दे डाली है की इस मामले की निष्पक्ष जांच करा ली जाए (जैसी की अपने यहाँ के नताओं को आदत सी हो गयी है) अनेक भारतीय समाचार चैनल इस मसले पर हंगामा बरपा रहे हैं । उस महिला की मौत दुर्भाग्यपूर्ण है और वह डॉक्टर तो निश्चित ही निंदनीय है जिसने उसका सही इलाज करने के अपने कर्तव्य का निर्वाह नहीं किया लेकिन ज़रा यहाँ ठहरिए और सोचिए क्या हमें अधिकार है इतना हंगामा खड़ा करने का ?

  • भारत के लोग हर वर्ष लाखों बच्चियों को गर्भ में मार डालते हैं। भारत के छोटे से छोटे कस्बे में अल्ट्रासाउंड सबसे चोखा धंधा है। इसे ले कर किसी डाक्टर को कानून क्या भगवान भी याद नहीं आते। आयरलैंड के डाक्टर कम से कम कानून का तो पालन करते हैं। 
  • भारत में हर वर्ष असुरक्षित प्रसव से लाखों माताओं की मौत होती और लाखों बच्चे मर जाते हैं तब कोई हँगामा नहीं सुनाई देता बस हर दस वर्ष में रस्मी तौर पर जनगणना के आंकड़ों पर बहसें हो जाया करतीं हैं। 
  • भारत में हर वर्ष लाखों बच्चियों की अल्पवयस्क होते हुये भी शादी की जाती है तब कोई हंगामा नहीं होता। 
  • भारत के चौराहों पर, मंदिरों में, और उनके बाहर, रेलवे स्टेशनों पर लाखों बच्चे भीख मांगते हैं पर तब हमें शर्म, गुस्सा या खीज नहीं होती। 
  • भारत के लाखों बच्चे आज भी भूख से मर जाते हैं पर किसी के कण पर जूँ तक नहीं रेंगती । 
  • भारत में हर वर्ष लाखों विवाहित महिलाएं दहेज के लिए मार डालीं जातीं हैं पर हमें फर्क नहीं पड़ता। 
  •  भारत जो एक धर्मनिरपेक्ष राज्य है ( हम आयरलैंड की कैथोलिक एंगिल से भी आलोचना कर रहे हैं ) औरतों के लिए अलग अलग कानून हैं - हिंदुओं के लिए अलग और मुसलमानों के लिए अलग।
  • भारत में हर वर्ष सैकड़ों लड़कियां इसलिए मार दी जाती हैं क्यूंकी वे अपनी पसंद का जीवन साथी चुन लेतीं हैं। 
इन सबके लिए -----ध्यान से देखिये सरकार नहीं लोग दोषी हैं ----यही सबसे बड़ा भ्रष्ट आचरण है ---- स्विस बैंकों में दौलत जमा करने से बड़ा पाप है अजन्मी बच्चियों की हत्या, पैसे के लिए अपनी पत्नी, बहू की हत्या, धर्म की आड़ में बच्चों को टीकाकरण से दूर रखना, स्त्रियॉं को सामान्य मानव के हकों से दूर रखना। चिंता हमें आयरलैंड के क़ानूनों की नहीं अपने समाज की करनी चाहिए। आयरलैंड का क़ानून ो मुझे स्पष्ट लगा की अगर माँ की जान बचाने के लिए गर्भपात आवश्यक है तो इसकी अनुमति है पर हमारे देश के उन क़ानूनों की चिंता कीजिये जो ऐसे छेद छोड़ देते हैं जिससे उन्हें तोडा जा सके। आइये चिंता करें उन क़ानूनों की जो किसी स्त्री को उसका अधिकार नहीं दे सकते। आयरलैंड को निपटने दीजिये इस मुद्दे से वे इसे अपनी तरह से हल कर ही लेंगे। 

12/11/2012

जनता है सोने की मुर्गी

2G घोटाले के बाद अब तक घोटालों के प्रति हमारी संवेदनाओं को तृप्त करने वाले और भीषण, विभीषण प्रकार के घोटाले सामने आ चुके हैं। पर जैसा की हर घोटाले में होता है - दोनों ओर से जनता ही हलाल होती है। पहले तो जनता के कारों के पैसों से विकसित तकनीक को कौड़ियों के दामों पर निजी कंपनियों को बेच दिया गया। इन कंपनियों ने इसके ज़बरदस्त दाम वसूले। शायद आपको वह ज़माना याद भी ना हो की 1997 में मोबाइल कॉल दरें 18 रू प्रति मिनट थीं और इंकमिंग भी फ्री नहीं थी। फिर घोटाला खुला और न्यायालय ने सभी आबंटन रद्द कर दिये। हालांकि सज़ा नहीं हुयी। न्यायालय असाहय है। आरोप सिद्ध करना जिसका काम है वह करबद्ध और नतमस्तक है। लेकिन न्यायालय के इस फैसले के बाद अब मंत्री जी का संकेत है की दाम बढ़ेंगे। यानि जनता को फिर से हलाल किया जाएगा। क्या न्यायालय सुओ मोटो इस मामले को ले कर न्याय दिलाएगा की स्पेक्ट्रम के आबंटन से जो घाटा हुया वह इन कंपनियों के प्रॉफ़िट से वसूला जाए, दोषी नेताओं के वेतनमान, भविष्यनिधि और पेंशन फंड से काटा जाए। स्पेक्ट्रम नीलामी के नाम पर कॉल दरों को बढ़ाना नैसर्गिक न्याय का स्पष्ट उल्लंघन है। आखिर जनता कितनी बार और क्यूँ टैक्स भरे? पहले तकनीक विकास के लिए, फिर उस तकनीक के उत्पाद को खरीदने और प्रयोग करने पर टैक्स, और अब घोटालेबाज कंपनियों को जब दोबारा पैसा देना पड़ रहा है तो बढ़ी कॉल दरों के रूप में अनुचित भुगतान और अनुचित टैक्स। क्या न्यायालय संज्ञान लेगा ? 

Oh My God: भगवान की सही व्याख्या

भगवान को देखा है? कैसा है वह? कहाँ रहता है ? हिन्दू है या मुसलमान? आदमी है या औरत? शक्ल कैसी है? ये और इन जैसे अनेक प्रश्न मनुष्य को आदि काल से मथते आए हैं। इसी मंथन से वेद, उपनिषद, वेदांग, गीता, बाइबल, अवेस्ता, क़ुरान जैसे ग्रंथ निकले हैं। इन्हें किसने रचा कोई नहीं जानता पर इनमें मानव जाति  के सबसे महत्वपूर्ण ज्ञान का समावेश है। यह ज्ञान है अस्तित्व का, मनुष्य के होने के कारण का, उसकी कठनाइयों का और उसकी जिम्मेदारियों का। यह ज्ञान है मनुष्य के विकास का, उन्नयन का। पशुत्व से मानवत्व के विकास की कुंजी का। यह ज्ञान है आस्था का, भरोसे का और इसी ज्ञान से जब जब भरोसा टूटता है तब तब उसे फिर से स्थापित करने के लिए किसी मुहम्मद, ईसा, कृष्ण या बुद्ध को आना पड़ता है और इन ग्रन्थों की शिक्षाओं को फिर से नए संदर्भों में स्थापित करना पड़ता है। दुनियाँ के सबसे पुराने हिन्दू धर्म में यह प्रवृत्ति स्पष्ट दिखती है। इस धर्म में निरंतार नए तत्वों का समावेश होता रहा है। यह सबको अपने भीतर ले कर चलने वाला सही मायने में लोकतांत्रिकता का प्रतीक है। इसमें सनातन से लेकर पुरातन, नास्तिक, तांत्रिक, अघोर, शैव, शक्त, वैष्णव, बौद्ध, जैन, निरीश्वरवादी और हर तरह का वाद विवाद शामिल होता आया है। यह धर्म हर एक वाद को फलने फूलने का स्पेस देता आया है। इसीलिए जब ओह माई गॉड में कांजी भाई (कान्ह जी - कृष्ण का अपभ्रंश) भगवान को कोसते हैं और मूर्तियों का धंधा चोखा करते हैं तो कोई फतवा जारी नहीं होता। कोई मंत्री करोड़ों के ईनाम की घोषणा नहीं करता। लोग हँसते हैं और कांजी भाई की बातों पर कहीं गहरे ध्यान भी देते है। संतों के विद्रूप पर किसी का सिर कलम करने की घोषणा नहीं होती। OMG मज़ाक में उस धर्म की उस सड़न की ओर इशारा करती है जिसकी दुर्गंध के अब हम आदि हो गए हैं। अनेक बापू, बाबाओं और निर्मलो के चोखे धंधे से पर्दा फ़ाश करती यह फिल्म एक सरहनीय प्रयास है। भगवान का असली स्वरूप तो प्राणियों में है। देखने के लिए ज्ञान चक्षु नहीं प्रेम की दृष्टि चाहिए। एक शायर का कहना है

सामने है जो उसे लोग बुरा कहते हैं, जिसको देखा ही नहीं उसको खुदा कहते हैं।

फिल्म कांजीभाई को नास्तिक कहती है और नास्तिक का अर्थ भी बताती है - वह जो प्रमाण में आस्था रखे। यह भारत की ही खूबी है की वैदिक दर्शन को ना मानने वाले नास्तिक दर्शन भी हिंदुओं के ही माने जाते हैं। चार्वाक के लोकायत दर्शन का भौतिकवाद, बुद्ध का क्षणिकवाद और जैन का इंद्रियनिग्रह एक ही समस्या के अलग अलग हल हैं। बौद्ध और जैन धर्मों ने मानवता, अहिंसा और क्षमा पर जो बल दिया है वह असल में इसी तथ्य पर बल है की असली धर्म है प्राणियों के प्रति दया, अहिंसा, शुद्ध विचार और सादा जीवन। आडंबर यज्ञ, कीर्तन, पूजा और मंत्रों से श्रेष्ठ है दया और मन की शुद्धता। मन चंगा तो कठौती में गंगा। दारम की सरलता में ही उसका कल्याणकारी स्वरूप निहित है। आज बापुओं, निर्मलो ने न केवल धर्म को दुकान में बदल दिया है बल्कि उसका विद्रूप भी बना दिया है। खैर दुकानें तो चलती ही रहेंगी संतोष बस इतना  ही है की इनके खिलाफ आवाज़ उठती रहनी चाहिए। जो समाज खुद की आलोचना नहीं करता वह विकसित नहीं हो सकता है।