03/10/2012

क्यों मुझे गाँधी पसंद नहीं है ?

क्यों मुझे गाँधी पसंद नहीं है ?
इन्टरनेट पर गांधी जयंती के दिन ही फेसबुक पर एक पोस्ट टैग की गयी जिसका शीर्षक था - क्यों मुझे गाँधी पसंद नहीं है ? इसने मुझे आहात कर दिया। इसमें वही गलत तथ्य थे जिन्हें ले कर गांधी जी को बदनाम किया जाता है मसलन भगत सिंह, 55 करोड़ आदि। प्रस्तुत है पूरी रिसर्च के साथ इन गलत तथ्यों के पीछे के सही तथ्य जो पिछले 60 वर्षों से अनेक गोडसे के पुत्र गांधी की बार बार हत्या करने के लिए प्रयोग करते हैं। आशा है आपमें से बहुतों की गलतफहमियां  दूर होंगी और आप अपने प्यारे देश और इसके महान स्वतन्त्रता शहीदों को सम्मान देना सीख पाएंगे बजाय टुच्ची विचारधारा वाली राजनीति का शिकार बनने और खुद की नज़रों में गिरने के। यह लेख मैंने आरोप और उनके उत्तर के रूप में लिखा है। आरोप उन महोदय के हैं जिन्होंने मुझे टैग किया था और उत्तर मेरे हैं।



आरोप 1: अमृतसर के जलियाँवाला बाग़ गोली काण्ड (1919)  समय समस्त देशवासी आक्रोश में थे तथा चाहते थे कि इस नरसंहार के खलनायक जनरल डायर पर अभियोग चलाया जाए। गान्धी ने भारतवासियों के इस आग्रह को समर्थन देने से मना कर दिया।
उत्तर : 1 - जलियाँवाला बाग कांड के बाद हुये कांग्रेस के 1919 दिसंबर अधिवेशन में श्री मोतीलाल नेहरू अध्यक्ष थे। कांग्रेस ने सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित किया जिस में जनरल डायर को पंजाब का कसाई घोषित करते हुये उसे हटाये जाने की मांग रखी थी। इस प्रस्ताव पर गांधी जी के हस्ताक्षर भी हैं। यह पहला अधिवेशन था जिसमें गांधी जी ने कांग्रेस की कार्यवाही में सक्रिय भाग लिया था। खुद गांधी जी ने एक अलग प्रस्ताव में ब्रिटिश सरकार की हिंसा की निंदा की थी। इसमें उन्होने लोगों से शांत रहने की अपील की थी और शायद आप इसी बात से चिड़े हुये हैं। आप इसे कांग्रेस के अधिवेशनों के लिखित रिकॉर्ड में देख सकते हैं।
जलियाँवाला बाग कांड, रौलट एक्ट और सरकार के ज़ुल्म ही वह बिन्दु थे जिन्होंने गांधी को भारत में अपना दक्षिण अफ्रीका वाला आंदोलन चालू करने की प्रेरणा दी। किसी भी अन्याय का विरोध करने का अभी तक एक ही तरीका था - आक्रोश। यह भगत सिंह इत्यादि ने अपनाया। पर इसके सीमित लाभ होते हैं जबकि आप एक विश्वशक्ति से लड़ रहे हों। जनता आपके कार्य में सक्रिय सहयोग नहीं कर सकती क्यूंकी जान जाने का खतरा रहता है। क्या बंधुवर किसी अन्याय के विरुद्ध आप भगत सिंह वाला तरीका अपनायेंगे? या फिर आप इसे भगत सिंह के लिए ही निरापद मानते हैं ?
दूसरा तरीका गांधी जी का था जिसे 20 वर्षों तक उनहोंने दक्षिण अफ्रीका में सफलता के साथ लागू किया। यह तरीका था निष्क्रिय अहिंसक प्रतिरोध का। यह उनहोंने भारत में भी 1915 - 16 के दौरान चंपारण, खेड़ा और अहमदाबाद में किसानों और मजदूरों के लिए लड़ कर उनका हक दिलवाया था। अहमदाबाद की हड़ताल और उसका परिणाम आज तक विश्व में हुयी हड़तालों में सबसे सफल हड़तालों में से एक है।
1919 में गांधी जी के रौलट सत्याग्रह का परिणाम यह रहा कि सरकार पीछे हट गयी और मार्शल ला पूरे देश में नहीं लगाया गया। यह आंदोलन भारतीय आंदोलनकारियों को एक करने में सफल हुआ। इसी आंदोलन के बाद कांग्रेस अब छुट्टियों के जलसे से आगे बढ़ कर जनता की आवाज़ बन गयी। भगत सिंह व अन्य नौजवान गांधी के साथ थे और उनका समर्थन करते थे। भगत सिंह के विचार भी पढ़िये  महात्मा गांधी के बारे में।

आरोप 2: भगत सिंह व उसके साथियों के मृत्युदण्ड के निर्णय से सारा देश क्षुब्ध था व गान्धी की ओर देख रहा था कि वह हस्तक्षेप कर इन देशभक्तों को मृत्यु से बचाएं, किन्तु गान्धी ने भगत सिंह की हिंसा को अनुचित ठहराते हुए जनसामान्य की इस माँग को अस्वीकार कर दिया। क्या आश्चर्य कि आज भी भगत सिंह वे अन्य क्रान्तिकारियों को आतंकवादी कहा जाता है।
उत्तर 2- भगत सिंह ने जो कुछ किया था उसके अंजाम से वे वाकिफ थे। उन्होने असेंबली में बम इसलिए नहीं फेंका था कि गांधी जी उन्हें बचा लेंगे। .उनका मकसद ही था कि बम फेंक कर, गिरफ्तार हो कर, अदालत में बयान के जरिये दुनियाँ को सरकार की करतूतों के बारे में बताना। यह एक बेहद बहदुरी का काम था। अगर उन्हें बचना ही होता तो वे मुक़द्दमे के लिए वकील लेते। पर उनहों ने ऐसा नहीं किया और अपना कृत्य अदालत में मान लिया, और ऐसे में फांसी के अलावा कोई सजा नहीं थी। बीबीसी में प्रोफेसर चमन लाल के लेख में लिखा है 

"असलियत तो यह है कि भगत सिंह हर हाल में फाँसी चढ़ना चाहते थे ताकि इससे प्रेरित होकर कई और क्रांतिकारी पैदा हों. वो कतई नहीं चाहते थे कि उनकी फाँसी रुकवाने का श्रेय गांधी को मिले क्योंकि उनका मानना था कि इससे क्रांतिकारी आंदोलन को नुकसान पहुँचता"

 गांधी की जी क्या करते जबकि स्वयं भगत सिंह ने ही ना अपील की और ना ही यह चाहा। गांधी पर उंगली उठा कर आप जैसे लोग भगत सिंह की शहादत को एक नाटक बना देते हैं। इससे ऐसा लगता है की यह शहादत नहीं बल्कि एक खेल था जो उनहोंने शायद गांधी जी के दम पर खेला था। ऐसा ना करें।  बेशक गांधी जी ने भगत सिंह की फांसी माफ करने के लिए पत्र लिखा था (राष्ट्रिय अभिलेखागार national archives) में यह पत्र आपको मिल जाएगा। और इरविन से कहा भी था पर इरविन ने साफ मना कर दिया। पूरे सविनय अवज्ञा आंदोलन के जमा हासिल को यह एक मुद्दा खत्म कर सकता था। इरविन समझौते के लिए तैयार हुये थे, पहली बार देश के आंदोलन को ब्रिटिश सरकार की मान्यता मिली थी। ऐसे में कांग्रेस और गांधी जी ने इस पर बल नहीं दिया। गांधी जी के अपने तरीके थे। वे सुभाष चन्द्र बोस की भांति दिल्ली में प्रदर्शन नहीं कर सकते थे। हाँ आप यह कह सकते हैं की गांधी जी ने भूख हड़ताल नहीं की लेकिन अगर गांधी जी को आप ज़रा भी जानते हैं तो मान जाएंगे की यह मुद्दा भूख हड़ताल का नहीं था। 

आरोप 3: मोहम्मद अली जिन्ना आदि राष्ट्रवादी मुस्लिम नेताओं के विरोध को अनदेखा करते हुए 1921 में गान्धी ने खिलाफ़त आन्दोलन को समर्थन देने की घोषणा की। तो भी केरल के मोपला में मुसलमानों द्वारा वहाँ के हिन्दुओं की मारकाट की जिसमें लगभग 1500 हिन्दु मारे गए व 2000 से अधिक को मुसलमान बना लिया गया। गान्धी ने इस हिंसा का विरोध नहीं किया, वरन् खुदा के बहादुर बन्दों की बहादुरी के रूप में वर्णन किया।
उत्तर 3: भारत में हिन्दू मुस्लिम दंगे ब्रिटिश सरकार की देन हैं। असहयोग आंदोलन में खिलाफत के प्रश्न को शामिल कर के गांधी जी ने इन्हीं हिन्दू मुस्लिम के बीच कि खाई को कम करने का एक अवसर पैदा किया था जो मुस्तफा कमाल पाशा (आधुनिक तुर्की के जन्मदाता) के क्रांतिकारी कदम और भारत में अवसरवादी ब्रिटिश समर्थक मुसलमानों के कारण असफल हो गया। 

1906 में कर्ज़न के ही द्वारा प्रेरणा पा कर मुस्लिम लीग का गठन किया गया जिसने भारत के अवसरवादी मुसलमानों को संगठित करने का प्रयास किया। मुस्लिम लीग का आरंभ से ही अजेंडा था हिंदुओं का विरोध और इसके जरिये खुद को अंग्रेजों के करीब ले जाने का। सर सैयद अहमद की सोच के अनुरूप ही ऐसा होने भी लगा और जब 1920-21 में असहयोग - खिलाफत का माहौल चला तो उसे तोड़ने के लिए ही केरल में स्थानीय लीगी नेताओं ने ऐसे दंगे कराये। केरल में एक बात और थी । किसान अधिकांश मुसलमान थे और जमींदार हिन्दू। किसानों द्वारा शोषण के खिलाफ हिंसक आंदोलन को सांप्रदायिक राग देना मुश्किल नहीं था। और रही बात गांधी द्वारा दंगाइयों को बहादुर बताने की तो अफसोस कि ऐसा कोई बयान नहीं है। यह प्रोपेगैंडा द्वारा रचा गया है।  ज़िन्हा खिलाफत के प्रश्न के बेशक विरोध में थे क्यूंकी वे गांधी जी के तौर तरीकों में भरोसा नहीं रखते थे। उनकी अपनी राजनैतिक महत्वाकांक्षाएँ भी थीं और वे कांग्रेस या ब्रिटिश सरकार में अपने लिए बड़ी भूमिका तलाश रहे थे। 

आरोप ४: यह गान्धी ही था जिसने मोहम्मद अली जिन्ना को कायदे-आज़म की उपाधि दी।
उत्तर ४ : बेशक गांधी जी ने मुहम्मद अली ज़िन्हा को कायदे - आजम कहा था लेकिन तब जबकि वह वाकई इस लायक थे।एक राष्ट्रवादी मुस्लिम का एक विभाजनकारी नेता में बादल जाना और एक राष्ट्रवादी कवि इकबाल (सारे जहां से अच्छा के रचयिता) का सांप्रदायिक हो जाना भारत जैसे मुल्क में सोचने लायक प्रश्न है। इसका उत्तर भी खोजिए। सारे जहां से अच्छागीत तो आप गाते होंगे। हमारे राष्ट्रगान से अधिक देशभक्ति का संचार करने वाले गीत का रचनाकार यदि बाद में सर्वइस्लामवाद के तराने लिखे तो इसे हिंदुस्तान की क्षति ही मानना होगा। गांधी कीश्रेष्ठता इसी से पता चलती है की अपने विरोधी को भी सम्मान जनक भाषा में बुलाते थे और एक आप हैं जो राष्ट्रपिता के लिए अपमानजनक टोन (यह गांधी ही था ) का प्रयोग कर रहे हैं। यह नीचता है।

आरोप : 1926 में आर्य समाज द्वारा चलाए गए शुद्धि आन्दोलन में लगे स्वामी श्रद्धानन्द जी की हत्या अब्दुल रशीद नामक एक मुस्लिम युवक ने कर दी, इसकी प्रतिक्रियास्वरूप गान्धी ने अब्दुल रशीद को अपना भाई कह कर उसके इस कृत्य को उचित ठहराया व शुद्धि आन्दोलन को अनर्गल राष्ट्र-विरोधी तथा हिन्दु-मुस्लिम एकता के लिए अहितकारी घोषित किया।
उत्तर ५: स्वामी श्रद्धानंद की हत्या 23 दिसंबर 1926 को की गयी थी और इस समय गुहाटी में कांग्रेस का अधिवेशन था। इसमें खबर मिलते ही गांधी जी ने ही शोक प्रस्ताव परस्तुत किया और हिंसा की निंदा की थी। वे श्रद्धानंद को भी अपना भाई कहते थे और अब्दुल रशीद को भी। वे श्रद्धानंद के हिंसक तरीकों से सहमत नहीं थे और रशीद के भी। आप संदर्भ से काट कर, किसी और समय की गयी बात को किसी और घटना के साथ प्रस्तुत करेंगे तो अनर्थ तो होगा ही। शुद्धि आंदोलन निश्चित तौर पर व्यर्थ आंदोलन था और अंततः असफल हुया। आखिर सदियों पहले इस्लाम में परिवर्तित लोगों को हिंदू बनाने में क्या तुक थी। इससे तो हिंसा ही बढ़ती और बढ़ी भी। बेशक इसमें क्या शुबहा है की इसने हिंदू मुस्लिम एकता को धक्का पहुंचाया। लोगों के कष्टों, देश की दारुण समस्याओं से मुंहु मोड कर शुद्धि आंदोलन और गौ हत्या जैसे मुद्दों की आखिर क्या जरूरत है। शांति, विकास और समृद्धि से ही धर्म का विकास होता है। इन हरकतों से तो गुंडों का ही विकास होता है।

.आरोप ६: गान्धी ने अनेक अवसरों पर छत्रपति शिवाजी, महाराणा प्रताप व गुरू गोविन्द सिंह जी को पथभ्रष्ट देशभक्त कहा।
उत्तर ६: ऐसा कभी नहीं हुआ। गांधी जी का सम्पूर्ण जीवन और कथन पूरी तरह से सभी के सामने हैं। उनका जीवन एक खुली किताब था। इसमें कुछ भी छुपा नहीं है। ऐसे शब्द उन्होने कभी नहीं कहे थे। यह आपकी भाषा है गांधी जी की नहीं।


आरोप ७: गान्धी ने जहाँ एक ओर काश्मीर के हिन्दु राजा हरि सिंह को काश्मीर मुस्लिम बहुल होने से शासन छोड़ने व काशी जाकर प्रायश्चित करने का परामर्श दिया, वहीं दूसरी ओर हैदराबाद के निज़ाम के शासन का हिन्दु बहुल हैदराबाद में समर्थन किया।

उत्तर ७: अनावश्यक और अनर्गल है यह आरोप: महाराज हरी सिंह और निज़ाम दोनों ही अवसरवादी थे जिनके हाथ में लाखों लोगों की जिंदगियाँ दांव पर लगीं थीं। दोनों ही 15 अगस्त के बाद स्वतंत्र देश का ख्वाब सजाये हये थे। हरी सिंह के ख्वाब को तो पाकिस्तान के आक्रमण से ग्रहण लग गया और मजबूरी में उसे भारत की सहायता के एवज़ में विलय पत्र पर दस्तख्वत करने पड़े। इसी संदर्भ में गांधी जी ने उसे काशी जाने की हिदायत दी थी। निज़ाम भी स्वतन्त्रता पर अड़ा हुया था और सीधा न किया जाता तो ब्रिटिश उसे भी स्वायत्तता दे देते। उसे मनाने की भरसक कोशिश की गयी। गांधी जी द्वारा उसे पुत्र कहना भी इसी प्रक्रिया का नतीजा था। वे हमेशा बातचीत से समाधान निकालने के पक्ष में थे। खुद पटेल भी सेना के प्रयोग को लेकर असमंजस में थे क्यूंकी भारत के ठीक बीचों बीच युद्ध लड़ने से गृह युद्ध फैलने जैसे खतरे भी थे। इस अभियान को बहुत तेज़ और छोटा होना चाहिए था। इसलिए इसमें थल सेना के सीमित इस्तेमाल के साथ वायुसेना का प्रयोग किया गया और साथ ही उच्च पदों के लोगों पर कूटनीतिक दबाव का भी इस्तेमाल किया गया। अभियान का गांधी जी ने विरोध नहीं किया।
आरोप ८: कॉंग्रेस के ध्वज निर्धारण के लिए बनी समिति (1931) ने सर्वसम्मति से चरखा अंकित भगवा वस्त्र पर निर्णय लिया किन्तु गाँधी कि जिद के कारण उसे तिरंगा कर दिया गया।
उत्तर ८: झण्डा निर्धारण 1906 से ही जब गांधी जी आंदोलन में थे ही नहीं, बंगाल विभाजन के समय से ही विवादित रहा है। यह ब्रिटेन या अमेरिका का झण्डा नहीं था बल्कि भारत का झण्डा था जिसमें उंसके हरेक निवासी की आस्था जागृत हो। गांधी जी से पहले हर झंडे की कमी यही थी की इसके रंगों की व्याख्या धार्मिक आधार पर थी। सबसे पहले झंडे पर मुसलमानों का चाँद सितारा और हिंदुओं का सप्तऋषि और बंग- भंग आंदोलन के लोकप्रिय नारे वंदे मातरम(यह नारा  तब सांप्रदायिक नहीं था) का डिजाइन था। गांधी जी को वैंकइया जी द्वारा डिजायन किया गया झण्डा पसंद आया था जिसमें लाल रंग हिंदुओं के लिए और हरा रंग मुसलमानों के लिए था और बीच में चरखा था। जिस झंडे का ज़िक्र आपने किया है वह अनेक डिज़ाइनों में से एक था जिसे झण्डा निर्धारण कमेटी ने चुना था यह अंतिम नहीं था और इसपर जब चर्चा हुयी तो मुसलमानों को यह ठीक नहीं लगा क्यूंकी भगवा केवल हिंदुओं का प्रतीक था। उधर गांधी जी ने वैंकइया के झंडे की डिजायन में एक सफ़ेद पट्टी जोड़ दी जिसे उन्होने अन्य धर्मों का प्रतीक बताया। इसके बाद ही गांधी और नेहरू ने झंडे के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप पर बल दिया और अंततः गांधी जी के झंडे की तीन पट्टियों में से पहली पट्टी लाल की जगह भगवा की गयी, फिर एक सफ़ेद और अंत में हरी। बीच में चरखा रखा गया जिसे बाद में संविधान सभा द्वारा अशोक चक्र से बादल दिया गया। आज़ादी के बाद इसकी व्याख्या में भगवा को अपरिग्रह का प्रतीक बताया गया, सफ़ेद को शांति, सत्य और ज्ञान का तथा हरे को समृद्धि, आशा और भविष्य का। चक्र को शाश्वत सत्य, ऊर्जा, और प्रगति का प्रतीक बाते गया। इतने खूबसूरत झंडे में भी अगर आप विवाद खोजते हैं तो आप अपने दिमाग का इलाज कराये।

आरोप ९: कॉंग्रेस के त्रिपुरी अधिवेशन में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को बहुमत से कॉंग्रेस अध्यक्ष चुन लिया गया किन्तु गान्धी पट्टभि सीतारमय्या का समर्थन कर रहा था, अत: सुभाष बाबू ने निरन्तर विरोध व असहयोग के कारण पदत्याग कर दिया।
उत्तर ९: सुभाष चन्द्र बोस का गांधी जी से विरोध राजनैतिक था व्यक्तिगत नहीं। फिर भी महान देशभक्त सुभाष अपनी विनम्रता नहीं भूले। यह सुभाष बाबू ही थे जिन्हों ने गांधी जी को राष्ट्रपिता कहा था। आप यदि सुभाष को अपना आदर्श मानते तो अपनी टिप्पणी में गांधी जी के लिए “किन्तु गान्धी पट्टभि सीतारमय्या का समर्थन कर रहा (?) था” जैसी भाषा का प्रयोग ना करते। भारतीय संस्कार यही कहते हैं कि बड़ों का नाम आदर के साथ लिया जाना चाहिए।

आरोप १०: लाहौर कॉंग्रेस में वल्लभभाई पटेल का बहुमत से चुनाव सम्पन्न हुआ किन्तु गान्धी की जिद के कारण यह पद जवाहरलाल नेहरु को दिया गया।
उत्तर १० :यहाँ भी तथ्य गलत हैं। किसी स्कूली किताब में भी पढ़ लीजिये। असल में साइमन कमीशन के विरोध में कांग्रेस ने अपना एक आयोग बनाया था जिसके अध्यक्ष थे मोतीलाल नेहरू। इस आयोग ने एक रिपोर्ट दी थी जिसमें भारत को ब्रिटेन के अधीन ही स्वायत्ता देने की मांग की गयी थी लेकिन जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चन्द्र बोस पूर्ण स्वतन्त्रता की मांग कर रहे थे।1927 में नेहरू ने पूर्ण स्वतन्त्रता का प्रस्ताव पेश किया। गांधी जी के विरोध के कारण उनका पूर्ण स्वतन्त्रता का प्रस्ताव गिर गया। अगले वर्ष 1928 कलकत्ता कांग्रेस में गांधी जी ने भारत को 2 वर्ष के भीतर डोमिनियन दर्जा देने की मांग रखी और अल्टीमेटम की यदि मांग न मांगी गयी तो सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू किया जाएगा। इसी आश्वासन पर नेहरू जी अपना पूर्ण स्वतन्त्रता का प्रस्ताव वापस लेने को राजी हुये थे। नेहरू जी की लोकप्रियता चरम पर थी और अगले वर्ष लाहोर अधिवेशन में माहौल बादल गया था। सरकार चुप थी। गोल मेज़ सम्मेलन विफल हो गया था। दमन बढ़ गया था अतः गांधी जी भी नेहरू का समर्थन करने को बाध्य थे। नेहरू सर्वसम्मति से अध्यक्ष चुने गए और सरदार पटेल, पट्टाभि सीतारमाइय्या और चक्रवर्ती राजगोपालाचारी जैसे गांधी जी के समर्थक सविनय अवज्ञा आंदोलन की तैयारी के लिए कांग्रेस वर्किंग कमेटी में चले गए। यह वर्ष युवाओं का था। इसी अधिवेशन में पहली बार किसी भारतीय राजनैतिक मंच से पूर्ण स्वतन्त्रता का आह्वान किया गया था। यह जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चन्द्र का प्रभाव था। यह साम्यवादी विचारधारा का प्रभाव था। 26 जनवरी 1929 को लाहौर में रावी के तट पर अनोखे देशभक्ति पूर्ण माहौल में सभी देशभक्तों ने एकजुट होकर पूर्ण स्वतंत्रता की शपथ ली। यही वह क्षण था जिसका ज़िक्र नेहरू जी ने 14 अगस्त की मध्यरात्री को दुनियाँ के नाम अपने प्रसिद्ध संदेश में किया था “ वर्षों पहले हमने नियति से वादा किया था .....” यह वही वादा था जो रावी के तट पर किया गया था। इसी लिए भारत का गणतन्त्र दिवस हम 26 जनवरी को मानते हैं। यह दिन हमारे लिए अधिक महत्वपूर्ण है। 15 अगस्त तो ब्रिटेन ने हमें दिया था लेकिन 16 जनवरी हमारा अपना है। इसे इसीलिए गणतन्त्र दिवस चुना।यह अधिवेशन पवित्र है कृपया इसे टुच्चे विचारों से दूषित ना कीजिये।

आरोप ११: 14-15 जून, 1947 को दिल्ली में आयोजित अखिल भारतीय कॉंग्रेस समिति की बैठक में भारत विभाजन का प्रस्ताव अस्वीकृत होने वाला था, किन्तु गान्धी ने वहाँ पहुंच प्रस्ताव का समर्थन करवाया। यह भी तब जबकि उन्होंने स्वयं ही यह कहा था कि देश का विभाजन उनकी लाश पर होगा।
उत्तर ११: आप के तथ्य गलत हैं। इतिहास के लिखित और दर्ज़ किए गए प्रमाण मौजूद हैं की गांधी जी अंतिम समय तक विभाजन के खिलाफ थे। अगर पाकिस्तान के लिए कोई दोषी है तो यही मानसिकता जो गांधी जी को मुजरिम ठहरती है। पाकिस्तान के लिए अगर जिन्नाह दोषी हैं तो कट्टरवादी हिन्दू भी उतने ही दोषी हैं जिनहोने जिन्नाह को नफरत और हिंसा को जायज़ ठहराने का मौका दिया। मुहम्मद इकबाल और चौधरी रहमत अली ने 1930 के आस पास एक अलग मुस्लिम राष्ट्र का विचार प्रस्तुत किया था। 1937 के हिन्दू महासभा के अधिवेशन में बोलते हुये सावरकर ने हिन्दू और मुसलमानों को दो देश कहा था। पाकिस्तान के बाप यदि जिन्नाह थे तो माँ का फर्ज़ हिन्दू महासभा ने अदा किया। गांधी जी ने कहा था की विभाजन उनकी लाश पर होगा और वही हुआ। विभाजन हुआ, हिंसा फैली और इतनी फैली की दुनियाँ ने कभी नहीं देखी। देश पर गर्व करने वालों का सिर शर्म से झुक गया। आखिर और लाश कैसी होती है। जिस उद्देश्य के लिए जीवन आहुति दे दी उसी का यह हश्र आखिर किसे जीने देगा। लेकिन जीवट देखिये उस महात्मा का जिसने इसके बावजूद नफरत के खिलाफ अपनी लड़ाई जारी रखी और सीने पर गोली खा कर अमर होगया। आप अगर इस ऊंची शख्सियत पर थूकेंगे तो थूक आप पर ही गिरेगा।

आरोप १२: मोहम्मद अली जिन्ना ने गान्धी से विभाजन के समय हिन्दु मुस्लिम जनसँख्या की सम्पूर्ण अदला बदली का आग्रह किया था जिसे गान्धी ने अस्वीकार कर दिया।
उत्तर १२: विभाजन के समय सम्पूर्ण जनता की अद्ल बदली अगर आप चाहते थे तो फिर वल्लभ भाई पटेल को क्यूँ पूजते हो। आखिर जब इस देश से भारी मात्र में मुसलमान पाकिस्तान जाते तो अंततः उनके रहने के लिए जगह की मांग उठती और पाकिस्तान और बड़ा होता। भारत के संसाधनों में भी बंटवारा होता। जिन्नाह यही चाहते थे। वे चाहते थे की हैदराबाद, जूनागढ़, केरल, मैसूर, भोपाल, जैसी रियासतें भी पाकिस्तान का हिस्सा बनें। आप जैसे अकल के अंधे उनकी इस चालाक मांग में साथ देते और भारत को भी अफ्रीका या इस्रायल फलसतीन बना देते। अगर पूरी मुस्लिम जनसंख्या का बंटवारा होता तो भारत आज भारत नहीं होता बल्कि यह बहुत से छोटे छोटे आपस में लड़ते, मरते देशों का बहुत गरीब क्षेत्र होता और इसका अफ्रीका जैसा हो हाल होता।

आरोप १३: जवाहरलाल की अध्यक्षता में मन्त्रीमण्डल ने सोमनाथ मन्दिर का सरकारी व्यय पर पुनर्निर्माण का प्रस्ताव पारित किया, किन्तु गान्धी जो कि मन्त्रीमण्डल के सदस्य भी नहीं थे ने सोमनाथ मन्दिर पर सरकारी व्यय के प्रस्ताव को निरस्त करवाया और 13 जनवरी 1948 को आमरण अनशन के माध्यम से सरकार पर दिल्ली की मस्जिदों का सरकारी खर्चे से पुनर्निर्माण कराने के लिए दबाव डाला।
उत्तर १३: गलत - पटेल और कन्हैया लाल माणिक लाल मुंशी जी जब मंत्रिमंडल का प्रस्ताव लेकर गांधी जी के पास गए(क्यूंकी पटेल गांधी जी के सबसे सच्चे शिष्यों में से एक थे) तो गांधी जी ने इसका समर्थन किया लेकिन सलाह भी दी की चूंकि भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य है अतः इसे सरकारी पैसे से नहीं बल्कि जनता के द्वारा जुटाये गए पैसे से निर्मित होना चाहिए। संविधान इसकी इजाज़त देता है। यह एक सही सलाह थी। फिर चाहे पैसा सरकारी हो आखिर तो जनता का ही होता है पर इस सावधानी से संविधान की आत्मा की रक्षा हो गयी। आज कसाब के संदर्भ में भारत की न्यायिक प्रक्रिया की विश्व भर में प्रशंसा हो रही है तो वह ऐसे ही प्रयासों से विकसित हुईं है वरना संविधान क्या है? महज़ एक किताब! जैसे पाकिस्तान में, जहां उसका कोई सम्मान नहीं है और इसीलिए वह एक अभिशप्त राज्य है। भारत अभिशप्त नहीं है तो इन्हीं सावधानियों के कारण। 13 जनवरी को भी जो दबाव था वह जनता पर था। हिंदुओं पर था की वे मुस्लिमों के रहने खाने पीने और धर्म प्रार्थना की व्यवस्था करें। यह दिल्ली के समाज को साधने की कोशिश थी और इसीलिए दिल्ली बच भी गयी। आप जैसे लोग होते तो भारत की राजधानी ही बर्बाद हो चुकी होतो हिंसा के उस सैलाब में।

आरोप १४: सबसे बड़ा आरोप - 55 करोड़ 
22 अक्तूबर 1947 को पाकिस्तान ने काश्मीर पर आक्रमण कर दिया, उससे पूर्व माउँटबैटन ने भारत सरकार से पाकिस्तान सरकार को 55 करोड़ रुपए की राशि देने का परामर्श दिया था। केन्द्रीय मन्त्रीमण्डल ने आक्रमण के दृष्टिगत यह राशि देने को टालने का निर्णय लिया किन्तु गान्धी ने उसी समय यह राशि तुरन्त दिलवाने के लिए आमरण अनशन किया- फलस्वरूप यह राशि पाकिस्तान को भारत के हितों के विपरीत दे दी गयी।
उत्तर १४: यह भी इतिहास की हत्या है। भारत और पाकिस्तान के विभाजन के कानून में राजस्व के बँटवारे के तौर पर पाकिस्तान को 75 करोड़ रुपये दिये जाने थे न की यह माउंटबेटन का परामर्श था। 20 करोड़ तुरंत दे दिये गए लेकिन बाकी 55 करोड़ दिये जाने से पहले की पाकिस्तान ने कश्मीर में घुसपैठ की। भारत सरकार ने इसके बदले 55 करोड़ की किस्त रोकने का माँ बनाया। यद्यपि भारत के पहले वाइसराय माउंटबेटन के अनुसार इससे न केवल समस्या और बढ़ेगी बल्कि पाकिस्तान में अव्यवस्था फैलने का खतरा भी होगा। वाइसराय ने गांधी को बाते और गांधी जो नैतिक आदर्श के लिए जाने जाते थे साथ ही उनमें मामलों की व्यावहारिकता को परखने की जो सहज बुद्दि थी, ने सरकार से अनुरोध किया की किस्त अदायगी में देरी ना की जाए। अनेक नौकरशाह और नेता भी किस्त देने के पक्ष में थे। गांधी जी ने इस विषय में कोई अनशन नहीं किया था गांधी जी जब कलकत्ता में में थे और दंगे रुकवाने में सफल थे तभी उन्हें दिल्ली बुलाया गया था यहाँ की भीषण हालत को काबू में करने के लिए। उन्होने यहाँ जो अनशन किया वह इन्हें दंगों को लेकर था न की 55 करोड़ को लेकर। 55 करोड़ का ज़िक्र तक इस अनशन की 12 जनवरी की घोषणा में नहीं हुया। नहीं प्रेस इंटरव्यू में गांधी जी ने इसका ज़िक्र किया और न ही डाक्टर राजेंद्र प्रसाद की उस लिखित आश्वशन में इस मामले का ज़िक्र है जिसे अनशन तुड़वाने के लिए दिया गया था। अब यह तथ्य कब क्यूँ और कैसे प्रकट हुआ आप ही बता सकते हैं। 55 करोड़ के लिए स्वतन्त्रता आंदोलन के पुरोधा को गलत ठहरादेंगे लेकिन करोड़ों डकारे हुये नेताओं को चुनावों में माफ कर देंगे ....वाह रे मेरे भारतवासी। 

आरोप १५: गाँधी ने गौ हत्या पर प्रतिबंध लगाने का विरोध किया
उत्तर १५: गौ हत्या एक छद्म मुद्दा था। यह हिन्दू वादी राजनीति द्वारा पैदा किया गया एक भावनात्मक मुद्दा था। बेशक गांधी जी ने गौ हत्या की निंदा की थी पर वे इस मुद्दे को ले कर हिंसात्मक और अन्यायपूर्ण प्रतिकृया के विरुद्ध थे। गाय बेशक एक पवित्र प्रतीक है लेकिन हिंदुत्ववादी राजनीति ने इसे हिंसक प्रतिशोध का प्रतीक बना दिया है। इस अहिंसक पशु प्रतीक की सबसे निर्मम हत्या तो हिंदुवादी राजनीति ने की है।

आरोप १६: द्वितीय विश्वयुध मे गाँधी ने भारतीय सैनिको को ब्रिटेन का लिए हथियारउठा कर लड़ने के लिए प्रेरित किया , जबकि वो हमेशा अहिंसा की पीपनी बजाते है
उत्तर १६: गांधी जी ने 1914 में शुरू हुये पहले विश्व युद्ध में सैनिकों की भर्ती अभियान में हिस्सा लिया था जब वे दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों के साथ अन्याय के खिलाफ लड़ रहे थे। आप गलत हैं। सैनिकों को लड़ने के लिए प्रेरित किया 1919 से पहले। उसके बाद नहीं। उस समय भारत में रोजगार का एक ही विकल्प था सेना। और देशवासी खास कर पंजाब और नेपाल से बड़ी संख्या में सेना में शामिल हुये। गांधी के कहने से नहीं। दूसरी बात है की अहिंसा का अर्थ कायरता नहीं। गांधी जी युद्धा में शामिल भी हुये थे शायद यह आपको मालूम नहीं। वे बकायदा अंबुलेंस कोर में शामिल हो कर घायलों की मदद करते थे। आप यहा अपनी ज़ुबान से ही घायल कर रहे हैं। जब देश की आवश्यकता हो तो गांधी भी लड़ने के पक्ष में थे। दूसरा विश्व युद्ध हुआ था 1939 में और इस समय गांधी जी को ब्रिटिश सरकार ने बंबई के मणिभवन से गिरफ्तार कर यरवदा जेल भेज दिया था। इस युद्ध में उन्होने कोई भर्ती अभियान नहीं चलाया था हाँ अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन स्थगित ज़रूर किया था जिससे युद्ध लड़ने में कोई बाधा ना आए। यह एक फासीवादी युद्ध था। हिटलर के नापाक इरादे दुनियाँ को गुलाम बनाने के थे। जापान की मंशा भारत सहित एशिया को गुलाम बनाने की थी और गांधी जी भारत की धरती पर युद्ध नहीं चाहते थे। ब्रिटेन का साथ देना ही न्यायपूर्ण था।
.आरोप १७: क्या ५०००० हिंदू की जान से बढ़ कर थी मुसलमान की ५ टाइम की नमाज़ ? विभाजन के बाद दिल्ली की जमा मस्जिद मे पानी और ठंड से बचने के लिए ५००० हिंदू ने जामा मस्जिद मे पनाह ले रखी थी…मुसलमानो ने इसका विरोध किया पर हिंदू को ५ टाइम नमाज़ से ज़यादा कीमती अपनी जान लगी.. इसलिए उस ने माना कर दिया. .. उस समय गाँधी नाम का वो शैतान बरसते पानी मे बैठ गया धरने पर की जब तक हिंदू को मस्जिद से भगाया नही जाता तब तक गाँधी यहा से नही जाएगा….फिर पुलिस ने मजबूर हो कर उन हिंदू को मार मार कर बरसते पानी मे भगाया…. और वो हिंदू— गाँधी मरता है तो मरने दो —- के नारे लगा कर वाहा से भीगते हुए गये थे…,,,
रिपोर्ट — जस्टिस कपूर.. सुप्रीम कोर्ट….. फॉर गाँधी वध क्यो ?
उत्तर १७: “the communal contentions cannot be allowed to be given as Gandhi ji time and again preached and practised a completely secular form of life. Moreover, Godse had questioned his manners of preaching. This is not a valid contention as a person has the complete liberty to preach according to his own preferred method.
Hence we find the issue is still debatable and can be questioned. But the author humbly submits that any factor would have been too small to find an excuse as to assassinate Mahatma Gandhi. ” जस्टिस कपूर
जो आपने लिखा है वह न्यायमूर्ति कपूर का कथन नहीं है बल्कि नाथुराम गोडसे का बयान है जो उसने जस्टिस कपूर के सामने दिया था। कपूर रिपोर्ट १९६९ में आयी थी और यह उन कारणों की जांच के लिए थी जो गांधी जी की हत्या के लिए उत्तर दायी थे। इसमें नथोराम गोडसे का पक्ष भी सुना गया था। और इसी पर टिप्पणी की गयी थी जिसे मैंने शब्दशः प्रस्तुत किया है। यह गोडसे द्वारा गिनाए गए हर कारण को खारिज करती है ।
इसके अलावा में आपसे पूछता हूँ की अगर कल 5000 मुसलमान सोमनाथ मंदिर में किसी प्रकृतिक आपदा से त्रस्त हो कर शरण लें तो क्या आप आरती बंद कर देंगे? बेशक दोनों ओर ऐसे कठमुल्ले हैं जिन्हें लोगों की जान से अधिक बुतों की शान ज़्यादा प्यारी है। ईश्वर या अल्लाह की सच्ची इबादत तो इंसान की मदद करने में है।जब लोग एक दूसरे के खून के प्यासे हों तो भगवान को भी नहीं छोड़ते। ईश्वर के पुत्र (ईसा मसीह) को लोगों ने जहर दे दिया। ब्रिटिश सरकार की पूरी सेना पंजाब में दंगे बंद नहीं करवा पाए थी तब यह अधनंगा फकीर बंगाल के दलदलों में नोआखली में दंगों को शांत करवाने में सफल रहा था। लोग इस संत का आदर करते थे और बात मानते थे। विश्व मीडिया ने उन्हें “one man Army” कहा था।
आइन्स्टाइन ने उनके लिए कहा था की आनेवाली नस्लें भरोसा नहीं कर पायेंगी की हाड़ मांस का ऐसा कोई जीता जागता आदमी भी इस दुनियाँ में था। मार्टिन लूथर किंग (अमेरिकी अशेव्त अधिकारों के लिए लड़ने वाले गांधीवादी) नेल्सन मंडेला जैसे अनेक नेताओं को प्रभावित करने वाले गांधी जी को अपने ही देश में आज दुष्प्रचार के जरिये बार बार मारा जा रहा है। आशा है आपके दिमाग के जाले साफ कर पाया हूँ।

अनुपम दीक्षित 

संदर्भ ग्रंथ जिनका अध्ययन किया गया है इस लेख को लिखने में। यह सभी मेरी व्यक्तिगत लाइब्रेरी में उपलब्ध है। 
1 India's struggle for Independence - Bipin Chandra 
2- India Wins Freedom - Maulana Abul Kalam Azad
3. My Autobiography - Jawahar Lal Nehru
4. My Autobiography - Dr. Rajendra Prasad
5. sampoorna gandhi vangmay (Complete works of Gandhi ji) 
5 Gandhi ji - Loui Fisher
6. Gandhi ji - B.R. Nanda
7. My Experiment with Truth
8 Freedom at midnight - larry collins and Dominique lapierre 
9. Modern India - Sumit Sarkar
10. India after Independence - Bipin chandra
11. India After Gandhi - Ram CHandra guha
12. India after nehru - Ram Chandra Guha
13. makers of India - Ram Chnadra guha
14 History of Indian national Congress (authorised history of INC) - pattabhi sitaramaiyya
15. AZIZ K. K. Ed. /  Muslims under Congress rule 1937-1939: a documentary record. 2V. / 1986.1-1986.2
16.  Jinnah ek punar drishti:  by Virendra Kumar Baranwal
17- india wins Freedom - मौलाना आज़ाद 
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