19/08/2011

अन्ना का आंदोलन


आज अभूतपूर्व दिन है। अन्ना हज़ारे के नेतृत्व में हजारों लोग वंदेमातरम के नारे लगते हुये तिहाड़ जेल से मायापुरी चौराहे तक गए। इनके हाथों में बैनर तो थे लेकिन उस से ज्यादा तादाद में तिरंगे थे। लबों पर गलियाँ नहीं देशभक्ति के तराने थे, मुट्ठियाँ तनीं थीं लेकिन संकल्प से। आज से पहले वन्देमातरम विवादों का केंद्र था, आज से पहले देशभक्ति के तराने रस्मी हो चले थे और आज से पहले लोग धर्म, भाषा, प्रांत, जाति, वंश, वर्ग को भुला कर एक ही जगह इकट्ठे होते थे - क्रिकेट का स्टेडियम। आज से पहले लोग गांधी जी को मजबूरी का नाम बताते थे, स्कूलों में शिक्षक निबंध लिखवाते थे क्या गांधी जी 21वी सदी में प्रासंगिक हैं। आज से पहले हम निराश और हताश थे जब हमने देखा संसद में हमारे प्रतिनिधि हमारी भलाई के विषय में प्रश्न पूछने के बजाय कॉर्पोरेट हितों के लिए प्रश्न पूछते हैं और इसके एवज़ में पैसे लेते हैं, जब हमने जाना और देखा कि कैसे जरूरी मुद्दों पर संसद के अंदर मतदान को करोड़ों रुपये के काले धन से सांसदों को खरीदा गया, जब हमने देखा कि कैसे सभी राजनीतिक पार्टियां सिर्फ और सिर्फ पैसा बनाने के लिए ही बनीं हैं, जब हमने देखा कि देश को शर्मसार करते हुये कैसे कलमाड़ी और उसके गिरोह ने खुले आम लूट की, जब हमने देखा कैसे एक नाम का राजा देश के पैसे को दांव पर लगा कर सचमुच का राजा बन गया। और हमारा दिल हर बार टूटा था जब सरकार और हमारे तथाकथित प्रधानमंत्री जी हर मौके पर उन्हीं लोगों के साथ खड़े नज़र आए जो हमारे विरोध में थे। लेकिन आज कुछ बादल गया था। आज आशा की लहरें ज़ोर पकड़ रहीं थीं। आज हमने देख कि लोग खुद ब खुद अन्ना के समर्थन में जुड़ रहे थे और देशभक्ति के तराने गा रहे थे, तिरंगे फहरा रहे थे। ये लोग किसी प्री-पेड रैली का हिस्सा नहीं थे। इन्हें गाड़ियों में ढो कर नहीं लाया गया था। यह वोट बैंक नहीं थे। ये लोग आज़ाद देश के इतिहास में दूसरी बार इतनी बड़ी संख्या में एकत्रित हुये और दुनियाँ ने भी देखा और सराहा कि चार दिनों से हजारों लोग पूर्ण शांति से आंदोलन में शामिल है। अन्ना के मतवालों ने अचानक गांधी को प्रासंगिक बना दिया और तथाकथित गांधी परिवार को अप्रासंगिक। वर्षों से बिसर चुके रघुपति राघव राजा राम कि गूंज फिर सुनाई दी। देश के लिए जज़्बा फिर दिखाई दिया। अन्ना का आंदोलन सरकार को याद दिला गया कि इतिहास खुद को इसलिए दुहराता है क्यूंकी लोग इससे शिक्षा नहीं लेते। कपिल सिब्बल, कमलनाथ और चिदम्बरम ने हरवर्ड, स्टीफेंसन और ऑक्सफोर्ड में तो पढे हैं लेकिन जनता को पड़ना यहाँ नहीं सिखाया जाता। इसे सीखने के लिए तो गांधी जी ग्रामीण भारत की ओर गए थे तो अन्न स्वयं वहीं से आते हैं। कपिल सिब्बल चुनाव तो जीत सकते हैं पर जनता का दिल तो अन्ना ने ही जीता है। सरकार ने ठीक वही रणनीतिअपनाई जो अक्सर दमनकारी सारकरें अपनातीं है तो अन्ना ने भी गांधी जी के सबसे खतरनाक औज़ार को अपनाया - सविनय अवज्ञा। यह एक ऐसा हथियार है जो दमनकारी को हाशिये पर पहुंचा देता है। सरकार ने यदि अन्ना को पहले ही रामलीला मैदान दे दिया होता तो शायद बात इतनी ना बढ़ती लेकिन सरकार के दमनकारी कदम ने निश्चित ही अन्ना के आंदोलन का दायरा बढ़ा दिया और यह देश व्यापी हो गया।
यद्यपि अभी भी इस आंदोलन के स्वरूप और पहुँच व सरोकारों पर बहस हो सकती है कि यह आंदोलन क्या केवल शहरी माध्यम वर्ग का आंदोलन है,या फिर  इसे जनांदोलन कहने कि बजाय मात्र भद्र समाज (सिविल सोसायटी) का आंदोलन कहा जाए। आपत्तियाँ कुछ और भी हैं जैसे कि यह आंदोलन मात्र उच्च जाति आंदोलन है और दलित वर्ग इसमें अपना हिस्सा नहीं देखता और बड़ा प्रश्न मुस्लिम वर्ग की अनुपस्थिती का भी है लेकिन फिर भी हम यह कह सकते हैं कि अपनी समस्त सीमाओं में यह आंदोलन निश्चित ही ऐसी घटना है जिससे भारत और भारतीयता मजबूत होगी और सांप्रदायिक ताक़तें कमजोर होंगी और जातिवाद पर आघात होगा। मिससे एक फायदा मुझे और भी दिख रहा है और वह यह कि यह भारतीय राजनीति के स्वरूप और दिशा पर गहरा असर डालेगा। जनता को जागरूकता की जिस घुट्टी और ट्रेनिंग की जरूरत थी वह इस आंदोलन ने उसे दी है। बेशक यह आंदोलन हो सकता है कुछ दिनों में ठंडा पड़ जाए लेकिंग जो आग दिलों भड़क चुकी है वह इतनी जल्दी बुझने वाली नहीं और यदि सरकार ने जल्दी ही ठोस कदम नहीं उठाए तो जनता जो अभी तक जुलूस कि शक्ल में थी अब दावानल बन कर लील जाएगी।
एक अन्य अहम प्रश्न इस आंदोलन के मुद्दे को ले कर भी है अर्थात जन लोकपाल। बेशक जन लोकपाल आज हमारी प्रशासनिक व्यवस्था के लिए अत्यंत आवश्यक हैऔर एक प्रभावी लोकपाल व्यवस्था में पारदर्शिता के अभाव को दूर कर सकेगा परंतु आवश्यकता इस बात कि भी है कि हम ऐसी व्यवस्था बना सकें कि लोकपाल एक सुपर पवार ना बन जाए।आप प्रधान मंत्री को लोकपाल के डायरे में लाएँ या न लाएँ पर संविधान में एक उपबंध तो यह भी होना चाहिए कि यदि प्रधानमंत्री या उनका कार्यालय अपने उत्तर दायित्व सही तरह से ना निभा पाये तो जवाबदेही सुनिश्चित की जा सके। बेशक न्यायपालिका को आप बाहर रखिए पर यह एक विडम्बना ही है कि अन्ना के आंदोलन के बीच आज़ादी के बाद दूसरी बार एक न्यायाधीश को महाभियोग के द्वारा हटाया गया। इसलिए इस बात की भी आवश्यकता है कि न्यायपालिका के भ्रष्टाचार से निपटने के लिए एक प्रभावी न्यायिक आयोग का बिल भी साथ ही साथ लाया जाए। लोकपाल को सांसदों और नौकरशाहों के विरुद्ध अधिक प्रभावशाली होना ही पड़ेगा। यह ऐसे प्रश्न हैं जिंका हल ऐसे आंदोलनों से संभव नहीं है। सरकार के पास मौका था जब वह अन्ना के सहयोगियों से बात कर रहे थे। उस मौके को अब गंवा दिया गया है लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि अब अन्ना आर पार कि लड़ाई लड़ रहे हैं। अन्ना को समझना होगा कि जनांदोलनों की एक सीमा होती है। कोई भी आंदोलन अनंत काल तक उतना ही स्फूर्त नहीं रह सकता जितना कि वह आरंभ में था। अतः अन्ना को इन्हीं 15 दिनों के अंदर ऐसा रास्ता निकालना होगा जो सरकार को भी मौका दे और जनता को भी। स्वयं गांधी जी ने भी यही रणनीति अपनाई थी संघर्ष-विराम-संघर्ष अन्यथा सरकार इस आंदोलन को भी टीवी आंदोलन प्रचारित कर पाने में सफल हो जाएगी और क्रांति फिर अधूरी रह जाएगी।
इस आंदोलन के बारे में यह भी कहा जा रहा है कि यह कंस्ट्रक्टिव कनसेनसस की उपज है अर्थात मीडिया द्वारा उत्पन्न किया गया आंदोलन। हो सकता है कि इसमें सत्यता हो। हम सभी फेसबुक, ट्विटर और खबरिया चैनलों से ही ऊर्जा ले रहे हैं लेकिन यह भी सही है कि हर आंदोलन को विकसित होने में किसी न किसी मेडिया की जरूरत होती ही है। गांधी जी ने प्रिंट का प्रयोग किया था तो आज टीवी का हो रहा है। दूसरी बात यह है कि हर आंदोलन फसबुक पर ऐसे नहीं फैलता जैसे यह फ़ेल रहा है। इतना प्रचार फकेबुक पर पाने को आपको लाखों पैसे देने होंगे लेकिन यह लोक शक्ति ही है जो ऑनलाइन आंदोलन को ज़िंदा रहे है।
मेरा मानना हैं कि  इस आंदोलन की संभावनाओं को उभारिए न कि उसे खारिज कीजिये क्यूंकी अगर ऐसा होगा तो यह देश के लिए ही बुरा होगा।

16/08/2011

अन्ना का आंदोलन, सरकारी दमन और संविधान

अन्ना का आंदोलन, सरकारी दमन और संविधान
मैं 1975 में पैदा हुआ था और मैंने आज़ादी की लड़ाई को नहीं देखा पर इतिहास में पढ़ा था की कैसे गांधी जी के अहिंसक आंदोलनों ने अंग्रेजों को हर बार और गहरी मुसीबत में दाल दिया था। उस दौरान हमें ऐसे जुमले सुनाई देते थे “यह अधनंगा बुड्ढा” या फिर “सिरफिरा फकीर” या फिर “पागल आदमी”। ब्रिटिश सरकार के कारनामे भी भयानक थे। नेताओं को गिरफ्तार किया गया, आवाज़ दबाई गई। यह सब मैंने केवल पढ़ा ही था। आश्वस्त था की आज़ादी के बाद अब कभी ऐसे ज़ुल्म देखने को नहीं मिलेंगे और किसी की भी शांतिपूर्वक कही गयी बात को दबाया नहीं जाएगा। हमारा संविधान हमें कुछ मौलिक अधिकार देता है और इसके भाग 3 के पैरा नंबर 13(2) में यह साफ साफ कहा गया है कि -
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और ठीक इसके बाद खंड 19 मुझे अधिकार देता है स्वतन्त्रता का जिसमें बहुत से अधिकार शामिल हैं ।
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इन अधिकारों की रोशनी आज धुंधली पड़ गयी जब मैंने सरकार को, उसमें शामिल चुने हुये प्रतिनिधियों को ठीक वही भाषा बोलते सुना। मेंने सुना महाराष्ट्र के एक कद्दावर नेता को अन्ना को पागल कहते हुये, मैंने सुना कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं को अन्ना के आंदोलन को ढोंग, नाटक, राजनीति, अवसरवाद ठहराते हुये। मैंने देखा सरकार को दिल्ली में लोगों पर लठियाँ भँजते हुये, निहत्थे लोगों पर ताकत आजमाते हुये। आज 16 अगस्त 2011 को आज़ादी की 64वीं वर्षगांठ के ठीक एक दिन बाद मेंने सरकार को हमारे पवित्र संविधान की धज्जियां उड़ाते हुये देखा। सरकार ने अन्ना को गिरफ्तार किया पर उनका कसूर नहीं बताया। सरकार ने उन्हें शांतिपूर्वक आंदोलन करने की अनुमति नहीं दी। उन्हें उसी जेल में रखा जिसमें महा भ्रष्ट मगरमच्छ रखे गए हैं। मुझे अपने संविधान पर भरोसा है। इसी संविधान में हमारी सर्वोच्च न्यायपालिका को यह शक्ति दी गयी है की वह ऐसे मामलों पर बिना किसी याचिका का इंतज़ार किए स्वयं सक्रिय हो कर आवश्यक कदम उठा सकती है। सरकारों को जवाब देना होगा।

05/08/2011

बोल.................. ..........कि लब आज़ाद हैं तेरे


बोल एक फिल्म नहीं आवाज़ है। यह आवाज़  जहां से आई है वहाँ आवाज़ों को दबाने का रिवाज़ रहा है। यह राजनैतिक आवाज़ नहीं है -सामाजिक आवाज़ है। लाहौर की गलियों से निकाल कर हमारे दिल की गहराइयों में गूँजती यह आवाज़ हमें सोचने को मजबूर करती है । चाहे भारत हो या पाकिस्तान लड़की का जन्म दोज़ख की आग है। एक साथ कई प्रश्नों से रूबरू करती बोल धर्म की एकतरफा व्याख्या पर भी बहुत तीखा व्यंग्य है। फिल्म में हिंदुस्तान से आए एक हकीम साहब और उनके परिवार की कहानी है जो हकीम जी की लड़के की आरज़ू में सात बेटियों और एक ट्रांसजेंडर सैफुद्दीन सहित एक बड़ा कुनबा हो गया है। पर्दानशीन यह बेटियाँ घर में कैद हैं। स्कूल से दीवार सटी होते हुये भी स्कूल उनके लिए मीलों दूर है। हकीम साहब के दक़ियानूसी विचार, उच्च कुल की ऐंठ  और कम आमदनी के चलते परिवार अनेक मुसीबतों में घिरा है। दुनियाँ देखने की छटपटाहट और मुफ़लिसी का दोज़ख न केवल हकीम जी को बल्कि उनकी लड़कियों को भी बहुत से  अप्रिय फैसले लेने पर मजबूर करता है। हकीम जी की सबसे बड़ी लड़की जैनब ही फिल्म की केन्द्रीय पात्र है और कहानी उसी के नेरेशन के साथ आगे बढ़ती है। उसके जरिये मंसूर का कैमरा बेधड़क सच्चाइयाँ दिखाता रहता है। इस समाज में न हिजड़ों का कोई स्थान है और न ही बेटियों का। धर्म केवल औरतों के लिए है। हकीम साहब कर्ज़ के लिए तवायफ के साथ सो कर उतने नाराज़ और शर्मसार नहीं हैं और ना ही अपनी औलाद के कत्ल से बल्कि वे ज्यादा नाराज़ है कि उनकी एक बेटी शिया लड़के से शादी कर रही है। मुस्लिमों में आबादी नियंत्रण को ले कर फैली दक़ियानूसी सोच पर नश्तर चलाती यह फिल्म धीरे से वह कह देती है जिसे कहने की हिम्मत बहुतों में नहीं होती। फिल्म का अंत होते होते निदेशक न जाने कितनी समस्याओं को बखूबी उठा चुका होता है। फिल्म शिक्षा की आवश्यक्ता और उदार सोच की अहमियत भी बताती चलती है। किसी फिल्म के बहाने ही सही हमारे देश के दोनों समुदायों के के लोग अगर अपने कठमुल्लेपन पर कुछ शर्म महसूस करें तो फिल्म निर्देशक का  प्रयास सफल हो जाएगा।