24/03/2011

लीबिया पर लिबलिबापन : महाशक्तियों का हलकापन

फ्रांस ने लीबिया पर हमला कर दिया है। मीडिया और प्रचार साधनों के एकतरफा प्रचार से हम सभी को ऐसा लग सकता है की यह सबसे अच्छा उपाय है बेलगाम गद्दाफ़ी को नाथने का। बेशक यह एक लोकप्रिय और तुरंत फायदा पहुँचने वाला उपाय तो है लेकिन इसके अपने खतरे भी हैं। इतिहास पर यदि नज़र डालें तो विश्व के बड़े युद्ध ऐसे ही छोटे झगड़ों से शुरू हुये थे। अगर हम मानव इतिहास के सबसे भयानक युद्धों पर दृष्टिपात करें तो लगभग सभी मुख्य युद्धों के मूल कारण आर्थिक ही थे यद्यपि स्कूली किताबों में हमेशा इनके राजनीतिक पक्षों को ज्यादा महत्व दिया जाता है। पहले विश्व यद्ध का कारण विशुद्ध रूप से आर्थिक थे। ब्रिटेन, फ्रांस, रूस, जर्मनी और अमेरिकी अपने अपने आर्थिक हितों की सुरक्षा के लिए दो तरफा या तीन तरफा संधियाँ कर रहे थे और नए विकसित राष्ट्र जैसे जर्मनी, अमेरिका और रूस उपनिवेशों की होड़ में लगे थे। इसी सब के बीच अपने व्यापारिक मार्गों को बचाने के लिए योरोप के बीमार क्षेत्र यानि बालकन क्षेत्रों की जातीय, राजनीतिक और आर्थिक समस्याओं को अपने हितों के लिए प्रयोग करने की नीतियाँ पूरे विश्व को भारी पड़ीं। इस क्षेत्र में ब्रिटेन, रूस और फ्रांस के हितों ने इस क्षेत्र को युद्धों का आखाडा बना दिया और यहाँ की जनता के राष्ट्रवाद को अनदेखा किया जो अंततः भारी पड़ा और यूरोप के ताकतवर देश औस्ट्रिया के राजकुमार की हत्या के बाद घटनाएँ हाथ से निकाल गयीं और महाशक्तियाँ तुच्छता दिखाते हुये एकदूसरे से भिड़ गए। इस युद्ध की अगर सामाजिक आर्थिक पृष्ट भूमि देखें तो यह साफ पता चलता है की पूरा विश्व इस समय औपनिवेशिक अन्याय के शोषण से त्रस्त था। यूरोप का बलकन क्षेत्र तो गरीबी, बेरोजगारी और निरंतर युद्धों से ज़ार ज़ार हो चुका था और अंततः जब युद्ध खतम हुया तो वियना संधि में जो कुछ हुआ वह महाशक्तियों के लालच, स्वार्थी दृष्टिकोण का अच्छा उदाहरण था। अपने देशों की आर्थिक समस्याओं का हल इन लोगों ने युद्ध में खोजा। युद्ध आर्थिक मंदी को एक झटके में खत्म कर देते हैं। पूंजीवादी व्यवस्था मैं मंदी एक दुष्चक्र की भांति होती है। चीजों के दाम तेज़ी से बढ़ते हैं और मुद्रा की कीमत खत्म होने लगती है। ऐसे मैं मांग खतम हो जाती है और उत्पादन, व्यापार ठप्प हो जाता है। लोग बचत करने लगते हैं और बाज़ार में पूँजी का चक्र रुक जाता है। यह चक्र पुनः आसानी से नहीं शुरू नहीं हो पता है। इसे फिर से चलाने में युद्ध खास भूमिका निभाते हैं । आप नीचे बने एक चित्र से इसे अच्छी तरह समझेंगे।


इसी प्रकार दूसरे विश्व युद्ध के मुख्य कारण के रूप में मंदी ही थी। पूरा यूरोप पहले महायुद्ध के बाद अचानक मांग में आयी गिरावट और उत्पादन की कमी से त्रस्त था और जब हिटलर ने जर्मनी को इस मंदी से उबारने की कोशिश की तो उसके तौर तरीके अतिवादी थे। अमरीकी और ब्रिटिश सरकारों ने अपने आर्थिक हितों के कारण हिटलर के सभी अमानवीय कार्यों को अनदेखा किया और परिणाम स्वरूप हिटलर एक टनशाह के रूप में उभरा। हिटलर को रोकने और अपने स्वार्थों को पूरा करने के लिए ही ब्रिटेन और अन्य राष्ट्रों ने जर्मनी के खिलाफ युद्ध घोषित किया। इतिहास गवाह है की आज जो समृद्धि अमेरिका की दिखाई देती है उसका कारण याएह युद्ध ही हैं। अमरीका ने इन युद्धों में यूरोप के लिए बैंकर का काम किया और इन राष्ट्रों के पुनर्निर्माण के लिए ज़बरदस्त पैसा न केवल यूरोपीय सरकारों को दिया बल्कि अमेरिकी कंपनियों ने यूरोप में सभी प्रकार के उत्पादों की सप्लाई भी की। कहने की ज़रूरत नहीं है की इसने अमेरिकी समृद्धि के द्वार खोल दिये और जब युद्ध खत्म हुआ तब तक अमेरिका एक महा शक्ति बन चुका था। दूसरी ओर यूरोप में युद्ध को खतम करने असली श्रेय रूस को है जिसने इस युद्ध में सबसे ज्यादा हानी उठाई। पश्चिमी देशों ने हिटलर को रूस के विरुद्ध खड़ा किया था लेकिन वह भस्मासुर की भाँति विकसित हुआ। युद्ध के खात्मे के बाद सुनहरे आर्थिक दिन खत्म होने को थे। अमेरिका की शक्ति को रूस से लगातार चुनौती मिल रही थी और मंदी के पुनः छा जाने का खतरा था। ऐसे में युद्ध के बाद एक और युद्ध शुरू हुआ जिसे लोग शीत युद्ध के नाम से जानते हैं। मेरा मानना है की युद्ध असल में कभी खत्म ही नहीं हुआ था। शीत युद्ध दूसरे महायुद्ध का ही एक और रूप था। शीतयुद्ध ने पूरी दुनियाँ को दोनों महाशक्तियों की स्पर्धा का अखाड़ा बना दिया।

1946-1954 First Indochina War (also known as the French Indochina War)
1947 – USA in Greek Civil War
1948 – Israel War of Independence (also known as the Arab-Israeli War) till now (active participation of USA, France and UK)
1950-1953 Korean War (Active role of USA)
1954-1962 French-Algerian War
1955-1972 First Sudanese Civil War
1956 Suez Crisis (France/UK/USA)
1959 Cuban Revolution
1959-1973 Vietnam War
1979-1989 Soviet-Afghan War (USSR/USA)
1980-1988 Iran-Iraq War (USA/USSR)
1990-1991 Gulf War (USA)
1991-1995 Third Balkan War (NATO/USA)
2003 – Invasion of Iraq
2004 – War on terror – Afghanistan and Iraq
2004 Ivorian War (France)
2004 – Somalia war
1991 – till now Chechen war

ऊपर की लिस्ट से आपको अंदाज़ा हो गया होगा की युद्ध कभी रुका नहीं है बस इसका स्वरोपोप और स्थान बदलता रहा है। नीचे दिये चित्र में आप यह भी देखिये की आजकल विश्व में कहाँ कहाँ युद्ध चल रहा है।

इस चित्र के नीले रंग वाले स्थान युद्धरत क्षेत्र हैं। गौर कीजिये यूएसए निरापद है लेकिन विश्व के लगभग हर युद्ध में उसका सीधा या अप्रत्यक्ष हाथ है। युद्ध पूंजीवाद का इंजन है यह मेरी प्रस्थापना है। तो ज़रा सांसें थम कर बैठिए और देखिये की कोरिया, ईरान, सीरिया, लीबिया, सूडान, तंजानिया, चेचन्या, मेक्सिको, कश्मीर का एक एक कर नंबर आता जाएगा। आज सबसे महत्व का मुद्दा तेल है, कल पानी होगा (इस पर रिसर्च शुरू हो गए हैं की विश्व में कैसे साफ पानी की किल्लत होती जा रही है और ये रिसर्च संस्थाएं हम जैसे देशों को सुझाव दे रहीं हैं की साफ पानी पर टैक्स लगाने और उसे बेचने की जरूरत है। इसके बाद बारी आएगी अनाज की। पिछले वर्षों में हम अनाज की कमी के शगूफे और औसके प्रभाव में बड़ी कीमतों को आज भी झेल रहे हैं। ऐसे ही नए मुद्दे खड़े होते रहेंगे और युद्ध होते रहेंगे। निरीह मरते रहेंगे और मुट्ठीभर लोग इससे पैसे कमाते रहेंगे। इंजन चलता रहेगा आइरन हील (यदि अपने न पढ़ा हो तो जरूर पढ़ें जैक लंदन का उपन्यास आइरन हील) घूमता रहेगा।

चोरी चोरी - चुपके चुपके - गजनी



बौलीवुड की प्रेरणा - चोरी से (प्रेरित व्यक्ति प्रेरणा के स्रोत के बारे में बताता है पर चोर नहीं)
पसंद अपनी अपनी है भाई बिलकुल गजनी

15/03/2011

प्रकृति का जयनाद


अरे अमरता के चमकीले पुतलो तेरे ये जयनाद काँप रहे हैं आज प्रतिध्वनि बन कर मानो दीन विषाद। प्रकृति रही दुर्जेय, पराजित हम सब थे भूले मद में, भोले थे, हाँ तिरते केवल सब विलासिता के नद में। वे सब डूबे, डूबा उनका विभव, बन गया पारावार उमड़ रहा था देव-सुखों पर दुख-जलधि का नाद अपार।"


महाकवि जयशंकर प्रसाद की अमर कृति “कामायनी” की यही पंक्तियाँ याद आयी जब मैंने जापान के तट बांधों पर प्रलय सिंधु का प्रचंड प्रवाह देखा। यह प्रवाह केवल लहरों का प्रवाह ही नहीं था बल्कि इसमें मनुष्य के अनंत दुष्कार्यों के प्रति घृणा की भावना भी निहित थी।सुनामी से बचने के लिए तटीय शहरों के समुद्री किनारों पर जो तटबंध बनाए गए थे उन्हें हमने उद्दाम लहरों के दुर्दमनीय प्रवाह में बहते देखा, शहरों की सड़कों को खाइयों में बदलते देखा। इतने क्रोध में थीं ये लहरें की जहाजों को शहरों के बीच खड़ा कर दिया और कारों को मकानों के ऊपर चढ़ा दिया, गगनचुम्बी इमारतें अब धराशाही हो चुकी थीं और सब ओर बस प्रलय का तांडव था। लगता था जैसे यह प्रकृति का जयघोष है।