19/12/2011

अदम गोंडवी का जाना

साल 2011 न जाने क्यूँ जाते जाते कुछ ऐसे लोगों को ले जा रहा है कि लगता है बहुत अकेले हो जाएंगे आने वाले साल में। पहले बचपन के अंकल पै (टिंकल वाले - मेरी उम्र के नौजवान अभी भी शायद चकमक, डूब डूब और कालिया को नहीं भूले होंगे) फिर भोपेन हजारिका, जगजीत सिंह, देवानन्द और अब जमीनी शायर अदम। वक्त की पहचान जब साथ छोड़ने लगे तो समझना चाहिए कि अब वक्त बदलने का है। वक्त के बदलने का एहसास तो पहले भी था फिज़ाओं में जब अदीबों ने विचारधाराओं के अंत की घोषणा कर दी थी और जमीनी बात करने वाले को पूजीवादी गलियों (कम्युनिस्ट एक गाली है पूजीवादी दयारों में) से नवाजा जाने लगा था। ऐसे ही एक बेअदब जमीनी कवि थे अदम। दुष्यंत कुमार की परंपरा को आगे बढ़ाते हुये अदम्य जिजीविषा के धनी रामनाथ सिंह ने लोगों की असल बात कहने का जोखम उठाया था। उनके कुछ अशआर देखिये।

काजू भुने प्लेट में विस्की गिलास में
उतरा है रामराज विधायक निवास में .

पक्के समाजवादी हैं तस्कर हों या डकैत
इतना असर है खादी के उजले लिबास में.

आजादी का वो जश्न मनायें तो किस तरह
जो आ गए फुटपाथ पर घर की तलाश में.

पैसे से आप चाहें तो सरकार गिरा दें
ससद बदल गयी है यहाँ की नखास में.

जनता के पास एक ही चारा है बगावत
यह बात कह रहा हूँ मैं होशो-हवास में.

कहने की जरूरत नहीं है कि यह एक विडम्बना है जो ऐसी रचनाएँ अभी तक समीचीन बनी हुयी हैं। व्यवस्था निरंतर जस की तस है और जनता त्रस्त है। क्या यह हमारे लिए या प्रेमचंद के लिए शर्म की बात नहीं है की होरी आज भी न केवल ज़िंदा है बल्कि उसके हालात पहले से भी गए बीते हैं। हम प्रगति और विकास की बात करते हैं लेकिन इस विकास का जमा हासिल आखिर क्या है? ज़रा गौर से देखिये कि अदम की दृष्टि वह देखती है जो आसानी से दिखता नहीं। कितना व्यंग्य और व्यथा है।

· इस व्‍यवस्‍था ने नई पीढ़ी को आख़िर क्‍या दिया
सेक्‍स की रंगीनियाँ या गोलियाँ सल्‍फ़ास की

· जो उलझ कर रह गई फाइलों के जाल में
गाँव तक वो रोशनी आयेगी कितने साल में

· आप कहते हैं सरापा गुलमुहर है ज़िन्दगी
हम ग़रीबों की नज़र में इक क़हर है ज़िन्दगी

· ख़ुद को ज़ख्मी कर रहे हैं ग़ैर के धोखे में लोग
इस शहर को रोशनी के बाँकपन तक ले चलो.

और शहरों के इस उबाऊ अंधेर से घबरा कर ही शायद उनका यह शेर मुकम्मल हुआ होगा।

· ग़ज़ल को ले चलो अब गाँव के दिलकश नज़ारों में
मुसल्‍सल फ़न का दम घुटता है इन अदबी इदारों में

· न इनमें वो कशिश होगी, न बू होगी, न रानाई
खिलेंगे फूल बेशक लॉन की लम्‍बी क़तारों में

· अदीबों! ठोस धरती की सतह पर लौट भी आओ
मुलम्‍मे के सिवा क्‍या है फ़लक़ के चाँद-तारों में

और बेशक आपको बुरा लगे आखिर हम मध्यमवर्गीय लोगों के संस्कार तो हैं ही सामंतवादी -  लेकिन फिर भी

· वो जिसके हाथ में छाले हैं पैरों में बिवाई है
उसी के दम से रौनक आपके बंगले में आई है

· इधर एक दिन की आमदनी का औसत है चवन्‍नी का
उधर लाखों में गांधी जी के चेलों की कमाई है

पूंजीवाद का ढोल बज रहा है। आइरन हील शाश्वत चक्र की भांति मंथर गति से घूम रहा है और 2011 तेजी से 1984 की अवस्था में पहुँच रहा है (यहाँ में ऑस्कर वाइल्ड के प्रसिद्ध उपन्यास 1984 की बात कर रहा हूँ)। जमीनी बात करने वाले हाशिये पर हैं। भारत सुपर शक्ति बन गया है। अच्छी बात है। प्रोपेगैण्डा सही जा रहा है। भारत धनवान है। काले धन की सूची बताती है। भारत में संभावनाएं हैं यह करोड़ों की संपत्ति वाले चपरासियों और क्लर्कों से साबित हो रहा है। आंदोलन हो रहे हैं और सरकार कटघरे में है। मनरेगा और खासुबि भी चल रहे हैं लेकिन फिर भी सोचता हूँ की अब जमीनी लोगों की बात कौन कहेगा। इस डर्टी पिकचर के युग में, मुन्नी, शीला, राजा, कलमाड़ी के दौर में भला अब कौन मेरा ध्यान जब तब सच्चाईयों की जमीन तक मोड़ेगा? शायद तुमने सोचा होगा -

यहाँ दरख्तों के साए में धूप लगती है
चलो यहाँ से चले और उम्र भर के लिए

(दुष्यंत कुमार)

05/12/2011

ज़िंदगी से इश्क़ का फसाना - देव आनंद

देव आनंद अब नहीं है लेकिन लगता है जैसे इस बात से खास फर्क नहीं पड़ता की वे सशरीर यहाँ हैं या नहीं। कुछ लोगों की शख्सियत उनसे भी बड़ी हो जाती है। देव आनंद बेशक अपने ज़िंदादिल अंदाज़ और ज़िंदगी की ललक के प्रतिमान बन कर हमारे बीच हमेशा रहेंगे और उनकी फिल्में, गाने तो हैं ही – सदाबहार। अभी कुछ दिन पहले ही उनका साक्षात्कार देखा था। बेबाक, खरी और भड़कीली बातें सभी को लुभातीं थी।  88 वर्ष की उम्र में भी देवानन्द की ज़िंदादिली में कोई कमी नहीं थी। वे सदाबहार थे ।  कोई शख्स सदाबहार कैसे हो सकता है। सदाबहार रहने के लिए आपको खुद को समय समय पर बदलना पड़ता है जैसे एक सदाबहार वृक्ष अपने पत्तों को निरंतर बदलता रहता है। बदलना एक कठिन काम है। लोग हमेशा बदलाव को ना पसंद करते हैं। लेकिन आगे बढ़ने के लिए बदलना जरूरी है। आगे बढ़ना भी जरूरी है,  एक दरिया की तरह,  ना कि एक पोखर की भांति, ठहरा हुआ ।  पोखर का पानी सड़ जाता है पर दरिया निर्मल रहता है,  क्यूंकी उसमें निरंतर नया जल आपूरित होता रहता है। इसी से दरिया प्रवाहमान बनाता है और उसमें  अपना रास्ता खुद बनाने कि ताकत भी इसी प्रवाह से आती है -
हम भी दरिया हैं, हमें अपना हुनर मालूम है
जिधर भी चल पड़ेंगे उधर, रास्ता हो जाएगा
शायद देव साहब की यही नवीनता  उनके सदाबहार होने के पीछे की ताकत थी।  जब उनसे एक साक्षात्कार में पूछा गया की आप की सर्वश्रेष्ठ फिल्म कौन सी है तो उनका जवाब था अभी जो फिलम में बना रहा हूँ वही मुझे सर्वश्रेष्ठ लगती है हालांकि लोग कहते हैं की गाइड थी। वर्तमान में जीना ही भविष्य के लिए ऊर्जा देता है। बेशक गाइड उनकी बेहतरीन फिल्म थी लेकिन अगर कोई कलाकार यह मान ले कि वह अपना सर्वोत्तम दे चुका है तो बेहतरी की गुंजाइश नहीं रहती। देव आनंद ने यही नहीं किया। अपनी पहली हिट फिल्म के बाद ही जो कंपनी उन्होने बनाई उसका नाम ही उनके इस दर्शन को अभिव्यक्त करता है – नवकेतन। नवीनता के इस पुजारी ने निरंतर खुद को नए साँचे में ढाला। अभिनेता के बाद प्रोड्यूसर और फिर निदेशक व पटकथा लेखक। एक समय रोमांटिक हीरो की छवि वाले इस कलाकार के सह कलाकार राज कपूर जब  पिता का रोल करने लगे थे और दिलीप कुमार कि फिल्में पिटने लगीं थीं,  देवानन्द ने हरे रामा हरे कृष्णा और तेरे मेरे सपने जैसी दो बिलकुल भिन्न स्वभाव कि लेकिन सुपर हिट  फिल्में  दे कर जैसे घोषित कर दिया हो कि उनका समय अभी गया नहीं है। इसके बाद तो बनारसी बाबू, छुपा रुस्तम, अमीर गरीब, हीरा पन्ना  जैसी सफल फिल्मों की श्रंखला ने उन्हें पुनः स्थापित कर दिया।
और इतना ही नहीं परिवर्तन और नवीनता का यह प्रतीक अभिनेता अपनी सामाजिक उत्तरदायित्व को भी नहीं भूला और जहां 70 के उत्तरार्ध में इन्दिरा जी की इमरजेंसी के खिलाफ अच्छे अच्छों कि बोलती बंद हो गयी देवानन्द ने एक राजनीतिक पार्टी "नेशनल पार्टी ऑफ इंडिया" बना कर 77 के चुनावों में इन्दिरा जी का विरोध भी किया था।

88 वर्ष का यह पुराना शख्स निरंतर नवीनता कि खोज में लगा रहा। चाहे वह फिल्में हों, फिल्में बनाने का तरीका हो, हीरोइने हों या असल जिंदगी में उनकी प्रेमिकाएँ हों। सुरैया, कामिनी कौशल और ज़ीनत अमान के साथ उनके रोमांस के किस्से भी चले और यह सभी असफल प्रेम कहानियों कि परिणति को प्राप्त हुये। इन पर सोचते हुये उन्हें कहते सुना कि हार असल में ग्रोथ है। असफलता नए दरवाजे खोलती है और हर बार जब में हारा तो मुझे नया मुकाम मिला। ऐसे ही फलसफे का बयान है उनकी आत्मकथा "रोमांसिंग विथ लाइफ" जिसमें अनेक किस्से रोचक भी हैं। आज उनके जाने से जो स्थान रिक्त हुआ है वह शायद ही भर पाये। मन तो नहीं हुआ उनकी मौत पर दुखी होने का पर फिर भी

शाम से आँख में नमी सी है,
आज फिर आपकी कमी सी है ।

 तो आइए अब से कुछ दिनों तक हम उनकी तरह ही इस ज़िंदगी का जश्न मनाएँ और इसके उन लम्हों को भरपूर जिएँ जो कि बस आज ही हैं - क्या पता कल हों न हों।
अंत में एक खूबसूरत गीत उन्हीं की फिल्म से।
ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे।

30/11/2011

जय सोनिया मैया की !

क्या बात है !! हमारी सरकार बड़ी ही बेमुरव्वत है। वह तो सोनियाँ गाँधी जी ना होतीं तो मनमोहन सिंह तो सिंह की तरह हम सबको खा गए होते। बड़े  सख्त हैं जी हमारे प्रधानमंत्री।   सोनियाँ जी की दया है जो हमें मनरेगा मिला, उन्हीं की दया से सरकार रसोई गैस के दाम नहीं बढ़ा रही। पैट्रोल के दामों को भी उन्हीं की वजह से कम किया जा सका।  जब जब इस देश पर कलमाड़ी और राजा जैसे राक्षसों का साया आता है तो सिंह की दहाड़ ही नहीं निकलती। सन्नाटे को तोड़ने का काम तो मम्मी जी या बाबा जी (रामदेव नहीं बाबासूट वाले बाबा - राहुल बाबा ) ही करते हैं। सोनियाँ जी ने ही हमें सूचना का अधिकार दिलवाया और वही हम सब देशवासियों को एक निराली पहचान भी दिलवा रहीं है - युनीक आई डी कार्ड। सोनिया जी दानवीर हैं। वे कर्ण, हर्ष और हरिश्चंद्र जैसे मिथकों को साकार करतीं है। भारत देश के प्रधानमंत्री की कुर्सी का त्याग कोई छोटा कृत्य तो नहीं है।
वे भ्रष्टाचार पर अध्ययन करती रहीं हैं । हाल ही में उनकी रिसर्च से पता चला है की दरअसल भ्रष्टाचार प्लेग नामक बीमारी की तरह होता है। इसकी घोषणा उन्होंने युवा कांग्रेस सम्मेलन में की। उन्होंने इसे उखाड़ फैंकने की वैसी ही प्रतिबद्धता जाहिर की जैसी उनकी सासू माँ ने गरीबी को ले कर की थी। और देखिये आज देश के 58% सांसद करोड़पति हैं और सांसद चूंकि जनता के प्रतिनिधि होते है तो वे करोडपतियों के ही प्रतिनिधि तो हुये ना?  सोनियाँ जी की रिसर्च के अनुसार  जैसे प्लेग के कीटाणु चूहे के शरीर में रहते हुये भी चूहे को नुकसान नहीं पहुंचाते लेकिन उसके संपर्क में आने वाले मनुष्य को भयंकर कष्ट देते हैं ऐसे ही मंत्रियों, अधिकारियों और कर्मचारियों में बसने वाले भ्रष्टाचार के कीटाणु उन्हें कोई नुकसान नहीं पहुँचाते लेकिन उनके संपर्क में आने वाली जनता को बहुत दुख देते हैं। इसका इलाज वे खोज रहीं हैं। वैसे यह भी सही है की दोषी तो प्लेग का कीटाणु होता है न की चूहा। उसी तरह दोष तो भ्रष्टाचार का है न की मंत्री या अफसर का। सजा भ्रष्टाचार को दो भ्रष्टाचारी को नहीं। इसीलिए वे और राहुल बाबा हमेशा भ्रष्टाचार को कटघरे में खड़ा करने का कोई मौका नहीं छोड़ते और प्लेग कोई कानून बना कर तो ठीक होगा नहीं। रोग की सही जानकारी होना जरूरी है और इसी लिए सर्वज्ञानी सोनिया मैया का कहना है की भ्रष्टाचार के लिए सूचना का अधिकार ठीक है। इसी से तो पता लगता है की हाँ कोई नेता या अफसर भ्रष्टाचार के कीटाणु से पीड़ित है। यह डाइग्नोसिस है और कहते हैं न की रोग अगर पकड़ में आ जाए तो ठीक हो जाता है तो सूचना का अधिकार यही करता है। अब भला लोकपाल की यहाँ क्या जरूरत?  यह भी कोई अच्छी बात है की पीड़ित को और पीड़ित किया जाए। टीम अन्ना तो असल में परपीड़ा में आनंद लेती है। जब यह पता चल गया है की किसी मंत्री में   भ्रष्टाचार नामक रोग के कीटाणु हैं  तो हमें उसके कीटाणु नष्ट करने का इलाज खोजना होगा और हम पिछले 60 वर्षों से यही शोध तो कर रहे हैं और इसीलिए तो इतने सालों से लोकपाल बिल लटका रखा है। यूपीए की मैया सोनिया जी ने  तो अपनी सुविधाजनक कानून निर्मात्री मिनी विधायिका अर्थात राष्ट्रीय विकास परिषद में अन्ना जी से पहले लोकपाल बिल पर चर्चा की थी और जो सरकारी जोकपाल बिल था वह दरअसल इसी अध्ययन पर आधारित था वह तो बुरा हो अन्ना जी का की मुद्दा वे ले उड़े। सोनियाँ जी का तो  हमें और अन्ना जी को शुक्रगुजार होना चाहिए की उन्हों ने जनलोकपाल आंदोलन में जो भूमिका विदेश जा कर निभाई है वह अतुलनीय है। आंदोलन को यहाँ तक पहुंचाने का श्रेय भी उन्हीं को है। भला अन्ना जी तिहाड़ में बैठ कर क्या कर लेते। यह तो सोनिया अरे रे रे रे राहुल बाबा का भला हो जो उन्होने अन्ना को तिहाड़ से छुड़वा दिया। बड़े लोग ऐसे ही होते हैं। जब चाहें किसी को बंद करा दें जब चाहें छोड़ दें। असल में असली प्लेग तो अन्ना जी हैं और हमें उनसे निपटने के तरीके खोजने चाहिए। भ्रष्टाचार तो एक शरमीले किस्म का प्लेग है। अंदर ही अंदर सक्रिय रहता है लेकिन अन्ना प्लेग तो बड़ी तेज़ी से फैलता है। इस प्रकार भ्रष्टाचार के मूल स्वरूप पर प्रकाश डाल कर उन्होंने देश पर एहसान किया है।
और अब सोनियाँ जी ने देश के 85% प्रतिशत किसानों पर जो एहसान किया है वह तो आहहा नारायण के पालनकर्ता के स्वरूप के  समान ही है। सोचिए वाल मार्ट आयेगा। आसमान से उतरे दूत की तरह। वह किसानों के लिए सड़कें, कोल्ड स्टोरेज, परिवहन के साधन उपलब्ध कराएगा। फिर उनसे अधिक दामों पर सब्जियाँ, फल, दूध वगैरह खरीदेगा। अपने स्टोर में वह बेरोजगारों को अच्छी तनख्वाह पर नौकरी देगा और देश की जनता को पहले से कम दाम पर यह सब चीज़ें बेचेगा। ऐसा एहसान तो ईसा मसीह ने भी नहीं किया होगा। जो काम पिछले 60 वर्षों में हर तरह की सरकारें नहीं कर पाई वह एफ़डीआई के गलीचे पर सवार वालमार्ट कर देगा। तो क्यूँ ना हम इस बार चुनाव में वालमार्ट को ही चुन लें?  नहीं। वालमार्ट तो सिर्फ एक जरिया है असल किरपा तो मैया की है ना! अरे एहसान फरामोश भूल गए उन सभी एहसानों को जो ऊपर गिनाए हैं। तुम्हें इसी लिए सोनियाँ मैया को ही चुनना होगा। नेहरू, इन्दिरा और  राजीव  जैसे बलिदानी और त्यागी परिवार के अलावा भला दुनियाँ में भारत की जनता के लिए विकल्प ही कहाँ हैं।

21/11/2011

माउण्टबेटन और मायावती


क्या समानता है माउंटबेटन और मायावती में ? दरअसल मायावती या फिर अधिक सटीक रहेगा की भारत की गटर राजनीति उस काम में सफल हो जाएगी जिसमें माउण्टबेटन असफल रहे थे। 1947 में माउण्टबेटन ने एक ऐसी योजना बनाई थी जिसे प्लान बाल्कन के नाम से जाना जाता है।बाल्कन प्रदेश यूरोप का ऐसा क्षेत्र है जिसमें भाषाई, सांस्कृतिक आधार पर बनते हुये  छोटे छोटे देश हैं जो आपस में लड़ते रहते थे। दोनों महायुद्धों की जड़ें इसी बाल्कन प्रदेश में थीं और इसे यूरोप का नासूर कहा जाता था। आज भी यह क्षेत्र यूरोप का सबसे अशांत क्षेत्र है। इसमें बोस्निया, सर्बिया, क्रोएशिया, हर्जगवेना, मेसीडोनिया आदि देश शामिल हैं। 


 इस योजना के अनुसार भारत को भारत ना मानते हुये कई रियासतों का एक झुंड माना गया था और अंग्रेजों ने उन सभी रियासतों को स्वतंत्र होने का अधिकार दिया था। उस समय भारत में ऐसी 600 से अधिक रियासतें थीं। अगर यह योजना सफल हो जाती तो आज यह क्षेत्र 600 छोटे छोटे देशों का एक ऐसा झुंड होता जो भाषा, संसाधनों, और अन्य मसलों पर झगड़ता  रहता और एशिया का नासूर बन जाता। पर नेहरू की माउण्टबेटन से दोस्ती के कारण यह प्रयास सफल ना हो सका और आखिर में भारत के दो टुकड़े किए गए। भारत और पाकिस्तान। सभी रियासतों को इन्हीं दो में शामिल होने का अवसर दिया गया। वह आज़ादी के जमाने की राजनीति थी जिसमें नेहरू और पटेल ने भारत को  जोड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी। और एक यह राजनीती है जो ठीक अंग्रेजों की तर्ज़ पर भारत के समाज में मौजूद हर दरार को ढूंढती है और फिर उसे चौड़ा करके खाई बनाने में कोई कसर बाकी नहीं रखती। मायावती द्वारा उत्तर प्रदेश के चार टुकड़े करने का प्रयास इसी घटिया और रद्दी राजनीति का फल है। हिन्दू, मुसलमान तो अब पुरानी बात हैं अब तो नयी दरारें खोजी जा चुकीं हैं क्षेत्रवाद, भाषा,  जाति, उपजाति, वर्ग, वंश आदि। यद्यपि संविधान इस प्रवृत्ति को देश द्रोह मानता है पर यहाँ संविधान मानता कौन है?  छोटे प्रदेश अगर विकास की गारंटी हैं तो मेघालय, असम, नागालैंड, झारखंड, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़ अविकसित क्यूँ हैं और महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश, कर्नाटक जैसे बड़े प्रदेश अधिक विकसित क्यूँ हैं? विकास आकार पर नहीं सही नीतियों, दृढ़ इच्छा शक्ति, मेहनत और लगन पर आधारित होता है। 90 के दशक में भाजपा को स्पष्ट बहुमत मिला था जिसे मंदिर के चक्कर में नष्ट कर दिया गया। यदि भाजपा ने प्रदेश के विकास पर ध्यान दिया होता तो आज यह दुर्दशा न होती। मायावती को भी ऐसा ही बहुमत मिला था और लोकतन्त्र विशेषज्ञ स्पष्ट बहुमत के फायदे गिनाते नहीं थकते थे पर वे भूल गए थे की स्पष्ट बहुमत तब अच्छा होता है जब नेतृत्व कुछ करना चाहे नहीं तो कमजोर विपक्ष और जोड़ तोड़ के चलते यह भ्रष्टाचार का सबसे बढ़िया अवसर होता है।  और उत्तर प्रदेश का दुर्भाग्य यही रहा है कि इसे कोई नेता नहीं मिला जो इसका भला सोचे। अब तो जनता को ही सोचना है कि मुद्दे राजनैतिक दल नहीं जनता तय करे। क्यूँ न चुनावों के समय एक मांगपत्र जनता प्रस्तुत करे और उसे हो वोट करे जो इसका समर्थन करे। जाग जाइए वरना माउण्टबेटन (उन्हें तब मनबांटन भी कहा जाता था ) के देसी अवतार कहीं अधिक खतरनाक हैं। 

15/11/2011

किंगफिशर का अच्छा समय है यह

आपने सही पढ़ा। यही है गुड टाइम किंगफिशर का। भारत की अग्रणी विमानन कंपनी अचानक घाटे में चली जाए। अपनी प्रतिद्वंदी से सम्झौता कर ले (जेट और किंग फिशर ) तो आश्चर्य होना लाज़मी है लेकिन ज़रा गौर से देखिये चालाकी समझ में आ जाएगी। जेट और किंगफिशर भारत की अग्रणी विमानन कंपनियाँ है। नरेश गोयल और माल्या सस्ती उड़ानों के विरोधी रहे हैं। दोनों ही भारतीय विमानन क्षेत्र में विदेशी निवेश चाहते हैं। जेट ने सहारा को गड़प लिया तो किंग ने डेक्कन को। इस तरह अब सरकारी इंडियन को छोड़ दें तो जेट और किंग फिशर ही हैं। फिर दोनों साथ आगाए। ग्राउंड स्टाफ, और कोड व रूट शेयर भी कर लिए File:Kingisher a320 on runway of hyderabad intl airport.jpgऔर इस प्रकार अपनी लागत भी कम की और भारतीय बाज़ार पर एकछत्र अधिकार भी हो गया। बेशक इसमें अभी तक सरकार या रेगुलेटर को एमआरटीपी के उल्लंघन के संकेत नहीं मिले हैं। दोनों के साथ आने से सस्ती विमानन कंपनियों को झटका लगा है और दाम तय करने में यह गिरोह मुख्य भूमिका में है। सरकार नीतियाँ बनती है जनता के हिट के लिए और प्राइवेट कंपनियाँ उन  नीतियों को बदलवातीं हैं अपने हितों के लिए। भारत में डेक्कन  एयरलाइन्स के आरंभ से एक नए युग की शुरुआत हुयी थी। आप सस्ते में हवाई सफर का सकते थे। सस्ती ऐरलाइन्स ने भारत ,में हवाई उड़ानों को विलासता के घेरे से निकाल कर जरूरत बना दिया है। यह सही है की बेहतर ढांचा  और संपर्क सुविधाएं ना होने से हवाई यातायात अभी सफल नहीं हो पा रहा है लेकिन इस तथ्य के लिए किसी रिसर्च की ज़रूरत नहीं है की सस्ती सेवाओं से ही भारत में यात्रियों की संख्या बढ़ी है। सरकार ने इसी के मद्देनजर एक  नियम बनाया है की हर निजी कंपनी को अपनी उड़ानों का कुछ प्रतिशत दू दराज़ के गैर लोकप्रिय रस्तों पर भी चलना होगा।  जेट और किंग इसका भी विरोध करते रहे हैं। इसके अलावा वे यह भी चाहते हैं की उन्हें अंतर्राष्ट्रीय उड़ानें भी करने दी जाएँ। इस प्रकार जेट और किंग असल में  भारतीय बाज़ार पर कब्जा चाहती हैं और सस्ती उड़ानों को बाद करके अपना वर्चस्व स्थापित करना चाहतीं हैं। हाल ही में उड़ानें बंद करने की चाल भी असल में दबाव की नीति है। वे सरकार से मनमाने फैसले करवाना चाहते हैं। सरकार को चाहिए की वह इसकी ब्लैकमेलिंग का शिकार ना हो। सरकार को इस मसले में हस्तक्षेप की जरूरत नहीं आखिर यह माल्या साहब का बिजनेस हैं। घबराइए नहीं यह किंगफिशर के लिए अच्छे समय की शुरुआत है। और अगर आप भी ऐसी मक्कारी का शिकार हुये हैं तो बाथे रहिए हाथ पर हाथ धरे। अमेरिका होता तो विमानन कंपनी को इतनी उड़ाने रद्द करने से पहले दास बार सोचना पड़ता।

19/08/2011

अन्ना का आंदोलन


आज अभूतपूर्व दिन है। अन्ना हज़ारे के नेतृत्व में हजारों लोग वंदेमातरम के नारे लगते हुये तिहाड़ जेल से मायापुरी चौराहे तक गए। इनके हाथों में बैनर तो थे लेकिन उस से ज्यादा तादाद में तिरंगे थे। लबों पर गलियाँ नहीं देशभक्ति के तराने थे, मुट्ठियाँ तनीं थीं लेकिन संकल्प से। आज से पहले वन्देमातरम विवादों का केंद्र था, आज से पहले देशभक्ति के तराने रस्मी हो चले थे और आज से पहले लोग धर्म, भाषा, प्रांत, जाति, वंश, वर्ग को भुला कर एक ही जगह इकट्ठे होते थे - क्रिकेट का स्टेडियम। आज से पहले लोग गांधी जी को मजबूरी का नाम बताते थे, स्कूलों में शिक्षक निबंध लिखवाते थे क्या गांधी जी 21वी सदी में प्रासंगिक हैं। आज से पहले हम निराश और हताश थे जब हमने देखा संसद में हमारे प्रतिनिधि हमारी भलाई के विषय में प्रश्न पूछने के बजाय कॉर्पोरेट हितों के लिए प्रश्न पूछते हैं और इसके एवज़ में पैसे लेते हैं, जब हमने जाना और देखा कि कैसे जरूरी मुद्दों पर संसद के अंदर मतदान को करोड़ों रुपये के काले धन से सांसदों को खरीदा गया, जब हमने देखा कि कैसे सभी राजनीतिक पार्टियां सिर्फ और सिर्फ पैसा बनाने के लिए ही बनीं हैं, जब हमने देखा कि देश को शर्मसार करते हुये कैसे कलमाड़ी और उसके गिरोह ने खुले आम लूट की, जब हमने देखा कैसे एक नाम का राजा देश के पैसे को दांव पर लगा कर सचमुच का राजा बन गया। और हमारा दिल हर बार टूटा था जब सरकार और हमारे तथाकथित प्रधानमंत्री जी हर मौके पर उन्हीं लोगों के साथ खड़े नज़र आए जो हमारे विरोध में थे। लेकिन आज कुछ बादल गया था। आज आशा की लहरें ज़ोर पकड़ रहीं थीं। आज हमने देख कि लोग खुद ब खुद अन्ना के समर्थन में जुड़ रहे थे और देशभक्ति के तराने गा रहे थे, तिरंगे फहरा रहे थे। ये लोग किसी प्री-पेड रैली का हिस्सा नहीं थे। इन्हें गाड़ियों में ढो कर नहीं लाया गया था। यह वोट बैंक नहीं थे। ये लोग आज़ाद देश के इतिहास में दूसरी बार इतनी बड़ी संख्या में एकत्रित हुये और दुनियाँ ने भी देखा और सराहा कि चार दिनों से हजारों लोग पूर्ण शांति से आंदोलन में शामिल है। अन्ना के मतवालों ने अचानक गांधी को प्रासंगिक बना दिया और तथाकथित गांधी परिवार को अप्रासंगिक। वर्षों से बिसर चुके रघुपति राघव राजा राम कि गूंज फिर सुनाई दी। देश के लिए जज़्बा फिर दिखाई दिया। अन्ना का आंदोलन सरकार को याद दिला गया कि इतिहास खुद को इसलिए दुहराता है क्यूंकी लोग इससे शिक्षा नहीं लेते। कपिल सिब्बल, कमलनाथ और चिदम्बरम ने हरवर्ड, स्टीफेंसन और ऑक्सफोर्ड में तो पढे हैं लेकिन जनता को पड़ना यहाँ नहीं सिखाया जाता। इसे सीखने के लिए तो गांधी जी ग्रामीण भारत की ओर गए थे तो अन्न स्वयं वहीं से आते हैं। कपिल सिब्बल चुनाव तो जीत सकते हैं पर जनता का दिल तो अन्ना ने ही जीता है। सरकार ने ठीक वही रणनीतिअपनाई जो अक्सर दमनकारी सारकरें अपनातीं है तो अन्ना ने भी गांधी जी के सबसे खतरनाक औज़ार को अपनाया - सविनय अवज्ञा। यह एक ऐसा हथियार है जो दमनकारी को हाशिये पर पहुंचा देता है। सरकार ने यदि अन्ना को पहले ही रामलीला मैदान दे दिया होता तो शायद बात इतनी ना बढ़ती लेकिन सरकार के दमनकारी कदम ने निश्चित ही अन्ना के आंदोलन का दायरा बढ़ा दिया और यह देश व्यापी हो गया।
यद्यपि अभी भी इस आंदोलन के स्वरूप और पहुँच व सरोकारों पर बहस हो सकती है कि यह आंदोलन क्या केवल शहरी माध्यम वर्ग का आंदोलन है,या फिर  इसे जनांदोलन कहने कि बजाय मात्र भद्र समाज (सिविल सोसायटी) का आंदोलन कहा जाए। आपत्तियाँ कुछ और भी हैं जैसे कि यह आंदोलन मात्र उच्च जाति आंदोलन है और दलित वर्ग इसमें अपना हिस्सा नहीं देखता और बड़ा प्रश्न मुस्लिम वर्ग की अनुपस्थिती का भी है लेकिन फिर भी हम यह कह सकते हैं कि अपनी समस्त सीमाओं में यह आंदोलन निश्चित ही ऐसी घटना है जिससे भारत और भारतीयता मजबूत होगी और सांप्रदायिक ताक़तें कमजोर होंगी और जातिवाद पर आघात होगा। मिससे एक फायदा मुझे और भी दिख रहा है और वह यह कि यह भारतीय राजनीति के स्वरूप और दिशा पर गहरा असर डालेगा। जनता को जागरूकता की जिस घुट्टी और ट्रेनिंग की जरूरत थी वह इस आंदोलन ने उसे दी है। बेशक यह आंदोलन हो सकता है कुछ दिनों में ठंडा पड़ जाए लेकिंग जो आग दिलों भड़क चुकी है वह इतनी जल्दी बुझने वाली नहीं और यदि सरकार ने जल्दी ही ठोस कदम नहीं उठाए तो जनता जो अभी तक जुलूस कि शक्ल में थी अब दावानल बन कर लील जाएगी।
एक अन्य अहम प्रश्न इस आंदोलन के मुद्दे को ले कर भी है अर्थात जन लोकपाल। बेशक जन लोकपाल आज हमारी प्रशासनिक व्यवस्था के लिए अत्यंत आवश्यक हैऔर एक प्रभावी लोकपाल व्यवस्था में पारदर्शिता के अभाव को दूर कर सकेगा परंतु आवश्यकता इस बात कि भी है कि हम ऐसी व्यवस्था बना सकें कि लोकपाल एक सुपर पवार ना बन जाए।आप प्रधान मंत्री को लोकपाल के डायरे में लाएँ या न लाएँ पर संविधान में एक उपबंध तो यह भी होना चाहिए कि यदि प्रधानमंत्री या उनका कार्यालय अपने उत्तर दायित्व सही तरह से ना निभा पाये तो जवाबदेही सुनिश्चित की जा सके। बेशक न्यायपालिका को आप बाहर रखिए पर यह एक विडम्बना ही है कि अन्ना के आंदोलन के बीच आज़ादी के बाद दूसरी बार एक न्यायाधीश को महाभियोग के द्वारा हटाया गया। इसलिए इस बात की भी आवश्यकता है कि न्यायपालिका के भ्रष्टाचार से निपटने के लिए एक प्रभावी न्यायिक आयोग का बिल भी साथ ही साथ लाया जाए। लोकपाल को सांसदों और नौकरशाहों के विरुद्ध अधिक प्रभावशाली होना ही पड़ेगा। यह ऐसे प्रश्न हैं जिंका हल ऐसे आंदोलनों से संभव नहीं है। सरकार के पास मौका था जब वह अन्ना के सहयोगियों से बात कर रहे थे। उस मौके को अब गंवा दिया गया है लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि अब अन्ना आर पार कि लड़ाई लड़ रहे हैं। अन्ना को समझना होगा कि जनांदोलनों की एक सीमा होती है। कोई भी आंदोलन अनंत काल तक उतना ही स्फूर्त नहीं रह सकता जितना कि वह आरंभ में था। अतः अन्ना को इन्हीं 15 दिनों के अंदर ऐसा रास्ता निकालना होगा जो सरकार को भी मौका दे और जनता को भी। स्वयं गांधी जी ने भी यही रणनीति अपनाई थी संघर्ष-विराम-संघर्ष अन्यथा सरकार इस आंदोलन को भी टीवी आंदोलन प्रचारित कर पाने में सफल हो जाएगी और क्रांति फिर अधूरी रह जाएगी।
इस आंदोलन के बारे में यह भी कहा जा रहा है कि यह कंस्ट्रक्टिव कनसेनसस की उपज है अर्थात मीडिया द्वारा उत्पन्न किया गया आंदोलन। हो सकता है कि इसमें सत्यता हो। हम सभी फेसबुक, ट्विटर और खबरिया चैनलों से ही ऊर्जा ले रहे हैं लेकिन यह भी सही है कि हर आंदोलन को विकसित होने में किसी न किसी मेडिया की जरूरत होती ही है। गांधी जी ने प्रिंट का प्रयोग किया था तो आज टीवी का हो रहा है। दूसरी बात यह है कि हर आंदोलन फसबुक पर ऐसे नहीं फैलता जैसे यह फ़ेल रहा है। इतना प्रचार फकेबुक पर पाने को आपको लाखों पैसे देने होंगे लेकिन यह लोक शक्ति ही है जो ऑनलाइन आंदोलन को ज़िंदा रहे है।
मेरा मानना हैं कि  इस आंदोलन की संभावनाओं को उभारिए न कि उसे खारिज कीजिये क्यूंकी अगर ऐसा होगा तो यह देश के लिए ही बुरा होगा।

16/08/2011

अन्ना का आंदोलन, सरकारी दमन और संविधान

अन्ना का आंदोलन, सरकारी दमन और संविधान
मैं 1975 में पैदा हुआ था और मैंने आज़ादी की लड़ाई को नहीं देखा पर इतिहास में पढ़ा था की कैसे गांधी जी के अहिंसक आंदोलनों ने अंग्रेजों को हर बार और गहरी मुसीबत में दाल दिया था। उस दौरान हमें ऐसे जुमले सुनाई देते थे “यह अधनंगा बुड्ढा” या फिर “सिरफिरा फकीर” या फिर “पागल आदमी”। ब्रिटिश सरकार के कारनामे भी भयानक थे। नेताओं को गिरफ्तार किया गया, आवाज़ दबाई गई। यह सब मैंने केवल पढ़ा ही था। आश्वस्त था की आज़ादी के बाद अब कभी ऐसे ज़ुल्म देखने को नहीं मिलेंगे और किसी की भी शांतिपूर्वक कही गयी बात को दबाया नहीं जाएगा। हमारा संविधान हमें कुछ मौलिक अधिकार देता है और इसके भाग 3 के पैरा नंबर 13(2) में यह साफ साफ कहा गया है कि -
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और ठीक इसके बाद खंड 19 मुझे अधिकार देता है स्वतन्त्रता का जिसमें बहुत से अधिकार शामिल हैं ।
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इन अधिकारों की रोशनी आज धुंधली पड़ गयी जब मैंने सरकार को, उसमें शामिल चुने हुये प्रतिनिधियों को ठीक वही भाषा बोलते सुना। मेंने सुना महाराष्ट्र के एक कद्दावर नेता को अन्ना को पागल कहते हुये, मैंने सुना कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं को अन्ना के आंदोलन को ढोंग, नाटक, राजनीति, अवसरवाद ठहराते हुये। मैंने देखा सरकार को दिल्ली में लोगों पर लठियाँ भँजते हुये, निहत्थे लोगों पर ताकत आजमाते हुये। आज 16 अगस्त 2011 को आज़ादी की 64वीं वर्षगांठ के ठीक एक दिन बाद मेंने सरकार को हमारे पवित्र संविधान की धज्जियां उड़ाते हुये देखा। सरकार ने अन्ना को गिरफ्तार किया पर उनका कसूर नहीं बताया। सरकार ने उन्हें शांतिपूर्वक आंदोलन करने की अनुमति नहीं दी। उन्हें उसी जेल में रखा जिसमें महा भ्रष्ट मगरमच्छ रखे गए हैं। मुझे अपने संविधान पर भरोसा है। इसी संविधान में हमारी सर्वोच्च न्यायपालिका को यह शक्ति दी गयी है की वह ऐसे मामलों पर बिना किसी याचिका का इंतज़ार किए स्वयं सक्रिय हो कर आवश्यक कदम उठा सकती है। सरकारों को जवाब देना होगा।

05/08/2011

बोल.................. ..........कि लब आज़ाद हैं तेरे


बोल एक फिल्म नहीं आवाज़ है। यह आवाज़  जहां से आई है वहाँ आवाज़ों को दबाने का रिवाज़ रहा है। यह राजनैतिक आवाज़ नहीं है -सामाजिक आवाज़ है। लाहौर की गलियों से निकाल कर हमारे दिल की गहराइयों में गूँजती यह आवाज़ हमें सोचने को मजबूर करती है । चाहे भारत हो या पाकिस्तान लड़की का जन्म दोज़ख की आग है। एक साथ कई प्रश्नों से रूबरू करती बोल धर्म की एकतरफा व्याख्या पर भी बहुत तीखा व्यंग्य है। फिल्म में हिंदुस्तान से आए एक हकीम साहब और उनके परिवार की कहानी है जो हकीम जी की लड़के की आरज़ू में सात बेटियों और एक ट्रांसजेंडर सैफुद्दीन सहित एक बड़ा कुनबा हो गया है। पर्दानशीन यह बेटियाँ घर में कैद हैं। स्कूल से दीवार सटी होते हुये भी स्कूल उनके लिए मीलों दूर है। हकीम साहब के दक़ियानूसी विचार, उच्च कुल की ऐंठ  और कम आमदनी के चलते परिवार अनेक मुसीबतों में घिरा है। दुनियाँ देखने की छटपटाहट और मुफ़लिसी का दोज़ख न केवल हकीम जी को बल्कि उनकी लड़कियों को भी बहुत से  अप्रिय फैसले लेने पर मजबूर करता है। हकीम जी की सबसे बड़ी लड़की जैनब ही फिल्म की केन्द्रीय पात्र है और कहानी उसी के नेरेशन के साथ आगे बढ़ती है। उसके जरिये मंसूर का कैमरा बेधड़क सच्चाइयाँ दिखाता रहता है। इस समाज में न हिजड़ों का कोई स्थान है और न ही बेटियों का। धर्म केवल औरतों के लिए है। हकीम साहब कर्ज़ के लिए तवायफ के साथ सो कर उतने नाराज़ और शर्मसार नहीं हैं और ना ही अपनी औलाद के कत्ल से बल्कि वे ज्यादा नाराज़ है कि उनकी एक बेटी शिया लड़के से शादी कर रही है। मुस्लिमों में आबादी नियंत्रण को ले कर फैली दक़ियानूसी सोच पर नश्तर चलाती यह फिल्म धीरे से वह कह देती है जिसे कहने की हिम्मत बहुतों में नहीं होती। फिल्म का अंत होते होते निदेशक न जाने कितनी समस्याओं को बखूबी उठा चुका होता है। फिल्म शिक्षा की आवश्यक्ता और उदार सोच की अहमियत भी बताती चलती है। किसी फिल्म के बहाने ही सही हमारे देश के दोनों समुदायों के के लोग अगर अपने कठमुल्लेपन पर कुछ शर्म महसूस करें तो फिल्म निर्देशक का  प्रयास सफल हो जाएगा।

09/06/2011

सत्ता और शक्ति

सत्ता भ्रष्ट करती है और पूर्ण सत्ता पूर्णतः भ्रष्ट करती है। राजनीति के एक गुरू का यह कथन 5 जून की रात मेरे सामने साक्षात खड़ा था जब भारत की लोकतान्त्रिक रूप से चुनी सरकार ने भारत के लाखों लोगों के भ्रष्टाचार के विरुद्ध शांतिपूर्ण अनशन को बर्बरता से कुचलने का प्रयास किया। कांग्रेस को पिछले आम चुनावों में सफलता क्या मिली वह अपना असली काम भूल कर न केवल जनता को लूटने में लग गई बल्कि उसे यह भी गुमान हो चला है की उसका अब कोई विकल्प नहीं है और जनता की मजबूरी है कांग्रेस को चुनना। कहते हैं इतिहास अपने को दुहराता है लेकिन यह उन्हीं के लिए सही है जो इतिहास से सबक नहीं लेते और शायद कांग्रेस ने यह सबक नहीं लिया है की जनता के आंदोलनों में शाश्वत लगने वाली सत्ताएँ भी तिनकों की तरह उड़ गईं। कांग्रेस द्वारा दमन कार्यवाही इसी गुरूर का नतीजा है।
इसमें वही बू है जो उपनिवेशवादी ब्रिटिश सत्ता की कार्यवाही में होता था। जलियाँवाला कांड की अनुगूँज यहाँ सुनाई देती है और शायद इस बार कांग्रेस सत्ता में आती है तो वोह दिन दूर नहीं लगता जब देश के पास एक और जलियाँवाला कांड होगा। इस बार तो शायद कोई गांधी भी नहीं होगा हमारे पास। एक ऐसे देश ने जिसने अपनी आज़ादी और संविधान को अहिंसा, अनशन और सत्याग्रह के रास्ते पाया था और संविधान ने भी इस रास्ते को सही मानते हुये इस प्रकार के प्रदर्शन की अनुमति दी है, सरकार की कार्यवाही ने संविधान के मूल ढाँचे पर ही कुठराघात किया है। उस पर प्रधानमंत्री का यह कहना की इस कार्यवाही का कोई विकल्प नहीं था। यदि किसी सरकार के पास अपने ही नागरिकों से आँसू गैस, लाठीबाजी दमन के जरिये निपटने के अलावा कोई विकल्प नहीं रह जाता तो हमें समझ लेना चाहिए की सरकार की मंशा खतरनाक है और वह एक लोकतान्त्रिक व्यवस्था के लायक नहीं है क्यूंकी लोकतन्त्र में हमेशा शांतिपूर्ण विकल्प मौजूद रहते हैं और सरकार का काम उन्हीं विकल्पों को खोजना है न की रामलीला मैदान को थिएन अन मन चौक बनाने की योजनाएँ तैयार करना। जो हुआ वह संवैधानिक और नैतिक दृष्टि से नाजायज था। संविधान हमें भारत का नागरिक होने के नाते यह मौलिक अधिकार देता है की हम अपने असंतोष को शांतिपूर्ण तरीके से सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित कर सकते हैं। लेकिन सरकार ने लोगों के इसी मौलिक अधिकार पर आघात तो किया ही है साथ ही भारतीय लोकतंत्र की अंतर्राष्ट्रीय साख पर भी कलंक लगाया हैं।

बाबा का आंदोलन चाहे जो हो पर अंततः वह भ्रष्टाचार के विरुद्ध ही था, और सरकार इसे अपने विरुद्ध मान बैठी। इससे यही सिद्ध होता है की सरकार और भ्रष्टाचार एक ही हैं। भ्रष्टाचार के विरुद्ध हर आंदोलन सरकार को अपने विरुद्ध लगता है मतलब साफ है की चोर की दाड़ी में तिनका। यह ठीक है की बाबा की मांगें सरकारी दृष्टि से अव्यवहारिक हैं और विदेशों में रखी संपत्ति को राष्ट्रिय घोषित करना और उसे वापस लाना एक लंबी प्रक्रिया से ही संभव है पर सरकार इस पर ठोस कार्यवाही शुरू कर के भ्रष्टाचार के विरुद्ध गंभीर होने का संदेश भेज सकती थी और सरकार ठीक यही करने में हर बार विफल रही फिर चाहे वह राष्ट्रमंडल खेल हों, 2जी घोटाला हो, अन्ना का अनशन हो या फिर बाबा का सत्याग्रह। हर बार सरकार की भ्रष्टाचार के विरुद्ध कदम उठाने में आनाकानी से जनता को यही संदेश गया है की दाल में बहुत कुछ काला है। शायद कपिल सिब्बल ब्रिग्रेड की सोच यही है की भारत में भ्रष्टाचार एक जीवन शैली बन चुका है और इस पर चलने वाले आंदोलन प्रभावहीन है लेकिन वे यह भूल जाते है की सत्य का एक विशिष्ट गुण है कि सत्य का पाखंड भी सत्य के करीब ले जाता है। लेकिन सिब्बल साहब शायद हिटलरी मुहावरे को पसंद करते हैं जो कहता है कि झूठ को सौ बार दुहराने पर वह सत्य प्रतीत होने लगता है। वे हर बार आरोपी का बचाव करते हैं, शगूफे छोड़ते हैं, मुद्दे से भटकने कि कोशिश करते हैं और प्रोपेगेंडा फैलाते हैं। पर सनद रहे की सत्य शाश्वत होता है और झूठ अल्पजीवी और सत्य यही है की सरकार की विश्वसनीयता घटी है।

24/03/2011

लीबिया पर लिबलिबापन : महाशक्तियों का हलकापन

फ्रांस ने लीबिया पर हमला कर दिया है। मीडिया और प्रचार साधनों के एकतरफा प्रचार से हम सभी को ऐसा लग सकता है की यह सबसे अच्छा उपाय है बेलगाम गद्दाफ़ी को नाथने का। बेशक यह एक लोकप्रिय और तुरंत फायदा पहुँचने वाला उपाय तो है लेकिन इसके अपने खतरे भी हैं। इतिहास पर यदि नज़र डालें तो विश्व के बड़े युद्ध ऐसे ही छोटे झगड़ों से शुरू हुये थे। अगर हम मानव इतिहास के सबसे भयानक युद्धों पर दृष्टिपात करें तो लगभग सभी मुख्य युद्धों के मूल कारण आर्थिक ही थे यद्यपि स्कूली किताबों में हमेशा इनके राजनीतिक पक्षों को ज्यादा महत्व दिया जाता है। पहले विश्व यद्ध का कारण विशुद्ध रूप से आर्थिक थे। ब्रिटेन, फ्रांस, रूस, जर्मनी और अमेरिकी अपने अपने आर्थिक हितों की सुरक्षा के लिए दो तरफा या तीन तरफा संधियाँ कर रहे थे और नए विकसित राष्ट्र जैसे जर्मनी, अमेरिका और रूस उपनिवेशों की होड़ में लगे थे। इसी सब के बीच अपने व्यापारिक मार्गों को बचाने के लिए योरोप के बीमार क्षेत्र यानि बालकन क्षेत्रों की जातीय, राजनीतिक और आर्थिक समस्याओं को अपने हितों के लिए प्रयोग करने की नीतियाँ पूरे विश्व को भारी पड़ीं। इस क्षेत्र में ब्रिटेन, रूस और फ्रांस के हितों ने इस क्षेत्र को युद्धों का आखाडा बना दिया और यहाँ की जनता के राष्ट्रवाद को अनदेखा किया जो अंततः भारी पड़ा और यूरोप के ताकतवर देश औस्ट्रिया के राजकुमार की हत्या के बाद घटनाएँ हाथ से निकाल गयीं और महाशक्तियाँ तुच्छता दिखाते हुये एकदूसरे से भिड़ गए। इस युद्ध की अगर सामाजिक आर्थिक पृष्ट भूमि देखें तो यह साफ पता चलता है की पूरा विश्व इस समय औपनिवेशिक अन्याय के शोषण से त्रस्त था। यूरोप का बलकन क्षेत्र तो गरीबी, बेरोजगारी और निरंतर युद्धों से ज़ार ज़ार हो चुका था और अंततः जब युद्ध खतम हुया तो वियना संधि में जो कुछ हुआ वह महाशक्तियों के लालच, स्वार्थी दृष्टिकोण का अच्छा उदाहरण था। अपने देशों की आर्थिक समस्याओं का हल इन लोगों ने युद्ध में खोजा। युद्ध आर्थिक मंदी को एक झटके में खत्म कर देते हैं। पूंजीवादी व्यवस्था मैं मंदी एक दुष्चक्र की भांति होती है। चीजों के दाम तेज़ी से बढ़ते हैं और मुद्रा की कीमत खत्म होने लगती है। ऐसे मैं मांग खतम हो जाती है और उत्पादन, व्यापार ठप्प हो जाता है। लोग बचत करने लगते हैं और बाज़ार में पूँजी का चक्र रुक जाता है। यह चक्र पुनः आसानी से नहीं शुरू नहीं हो पता है। इसे फिर से चलाने में युद्ध खास भूमिका निभाते हैं । आप नीचे बने एक चित्र से इसे अच्छी तरह समझेंगे।


इसी प्रकार दूसरे विश्व युद्ध के मुख्य कारण के रूप में मंदी ही थी। पूरा यूरोप पहले महायुद्ध के बाद अचानक मांग में आयी गिरावट और उत्पादन की कमी से त्रस्त था और जब हिटलर ने जर्मनी को इस मंदी से उबारने की कोशिश की तो उसके तौर तरीके अतिवादी थे। अमरीकी और ब्रिटिश सरकारों ने अपने आर्थिक हितों के कारण हिटलर के सभी अमानवीय कार्यों को अनदेखा किया और परिणाम स्वरूप हिटलर एक टनशाह के रूप में उभरा। हिटलर को रोकने और अपने स्वार्थों को पूरा करने के लिए ही ब्रिटेन और अन्य राष्ट्रों ने जर्मनी के खिलाफ युद्ध घोषित किया। इतिहास गवाह है की आज जो समृद्धि अमेरिका की दिखाई देती है उसका कारण याएह युद्ध ही हैं। अमरीका ने इन युद्धों में यूरोप के लिए बैंकर का काम किया और इन राष्ट्रों के पुनर्निर्माण के लिए ज़बरदस्त पैसा न केवल यूरोपीय सरकारों को दिया बल्कि अमेरिकी कंपनियों ने यूरोप में सभी प्रकार के उत्पादों की सप्लाई भी की। कहने की ज़रूरत नहीं है की इसने अमेरिकी समृद्धि के द्वार खोल दिये और जब युद्ध खत्म हुआ तब तक अमेरिका एक महा शक्ति बन चुका था। दूसरी ओर यूरोप में युद्ध को खतम करने असली श्रेय रूस को है जिसने इस युद्ध में सबसे ज्यादा हानी उठाई। पश्चिमी देशों ने हिटलर को रूस के विरुद्ध खड़ा किया था लेकिन वह भस्मासुर की भाँति विकसित हुआ। युद्ध के खात्मे के बाद सुनहरे आर्थिक दिन खत्म होने को थे। अमेरिका की शक्ति को रूस से लगातार चुनौती मिल रही थी और मंदी के पुनः छा जाने का खतरा था। ऐसे में युद्ध के बाद एक और युद्ध शुरू हुआ जिसे लोग शीत युद्ध के नाम से जानते हैं। मेरा मानना है की युद्ध असल में कभी खत्म ही नहीं हुआ था। शीत युद्ध दूसरे महायुद्ध का ही एक और रूप था। शीतयुद्ध ने पूरी दुनियाँ को दोनों महाशक्तियों की स्पर्धा का अखाड़ा बना दिया।

1946-1954 First Indochina War (also known as the French Indochina War)
1947 – USA in Greek Civil War
1948 – Israel War of Independence (also known as the Arab-Israeli War) till now (active participation of USA, France and UK)
1950-1953 Korean War (Active role of USA)
1954-1962 French-Algerian War
1955-1972 First Sudanese Civil War
1956 Suez Crisis (France/UK/USA)
1959 Cuban Revolution
1959-1973 Vietnam War
1979-1989 Soviet-Afghan War (USSR/USA)
1980-1988 Iran-Iraq War (USA/USSR)
1990-1991 Gulf War (USA)
1991-1995 Third Balkan War (NATO/USA)
2003 – Invasion of Iraq
2004 – War on terror – Afghanistan and Iraq
2004 Ivorian War (France)
2004 – Somalia war
1991 – till now Chechen war

ऊपर की लिस्ट से आपको अंदाज़ा हो गया होगा की युद्ध कभी रुका नहीं है बस इसका स्वरोपोप और स्थान बदलता रहा है। नीचे दिये चित्र में आप यह भी देखिये की आजकल विश्व में कहाँ कहाँ युद्ध चल रहा है।

इस चित्र के नीले रंग वाले स्थान युद्धरत क्षेत्र हैं। गौर कीजिये यूएसए निरापद है लेकिन विश्व के लगभग हर युद्ध में उसका सीधा या अप्रत्यक्ष हाथ है। युद्ध पूंजीवाद का इंजन है यह मेरी प्रस्थापना है। तो ज़रा सांसें थम कर बैठिए और देखिये की कोरिया, ईरान, सीरिया, लीबिया, सूडान, तंजानिया, चेचन्या, मेक्सिको, कश्मीर का एक एक कर नंबर आता जाएगा। आज सबसे महत्व का मुद्दा तेल है, कल पानी होगा (इस पर रिसर्च शुरू हो गए हैं की विश्व में कैसे साफ पानी की किल्लत होती जा रही है और ये रिसर्च संस्थाएं हम जैसे देशों को सुझाव दे रहीं हैं की साफ पानी पर टैक्स लगाने और उसे बेचने की जरूरत है। इसके बाद बारी आएगी अनाज की। पिछले वर्षों में हम अनाज की कमी के शगूफे और औसके प्रभाव में बड़ी कीमतों को आज भी झेल रहे हैं। ऐसे ही नए मुद्दे खड़े होते रहेंगे और युद्ध होते रहेंगे। निरीह मरते रहेंगे और मुट्ठीभर लोग इससे पैसे कमाते रहेंगे। इंजन चलता रहेगा आइरन हील (यदि अपने न पढ़ा हो तो जरूर पढ़ें जैक लंदन का उपन्यास आइरन हील) घूमता रहेगा।

चोरी चोरी - चुपके चुपके - गजनी



बौलीवुड की प्रेरणा - चोरी से (प्रेरित व्यक्ति प्रेरणा के स्रोत के बारे में बताता है पर चोर नहीं)
पसंद अपनी अपनी है भाई बिलकुल गजनी

15/03/2011

प्रकृति का जयनाद


अरे अमरता के चमकीले पुतलो तेरे ये जयनाद काँप रहे हैं आज प्रतिध्वनि बन कर मानो दीन विषाद। प्रकृति रही दुर्जेय, पराजित हम सब थे भूले मद में, भोले थे, हाँ तिरते केवल सब विलासिता के नद में। वे सब डूबे, डूबा उनका विभव, बन गया पारावार उमड़ रहा था देव-सुखों पर दुख-जलधि का नाद अपार।"


महाकवि जयशंकर प्रसाद की अमर कृति “कामायनी” की यही पंक्तियाँ याद आयी जब मैंने जापान के तट बांधों पर प्रलय सिंधु का प्रचंड प्रवाह देखा। यह प्रवाह केवल लहरों का प्रवाह ही नहीं था बल्कि इसमें मनुष्य के अनंत दुष्कार्यों के प्रति घृणा की भावना भी निहित थी।सुनामी से बचने के लिए तटीय शहरों के समुद्री किनारों पर जो तटबंध बनाए गए थे उन्हें हमने उद्दाम लहरों के दुर्दमनीय प्रवाह में बहते देखा, शहरों की सड़कों को खाइयों में बदलते देखा। इतने क्रोध में थीं ये लहरें की जहाजों को शहरों के बीच खड़ा कर दिया और कारों को मकानों के ऊपर चढ़ा दिया, गगनचुम्बी इमारतें अब धराशाही हो चुकी थीं और सब ओर बस प्रलय का तांडव था। लगता था जैसे यह प्रकृति का जयघोष है।

21/02/2011

टीपू के रोकेट और अमेरिकी राष्ट्रगान – ऊंची उड़ान

टीपू के रोकेट और अमेरिकी राष्ट्रगान ऊंची उड़ान
1780 ईस्वी में ब्रिटिश फौजें मैसूर के हैदरअली और टीपू सुल्तान की फौज से लड़ रहीं थीं। अंग्रेजों की धूर्तता यहाँ काम नहीं आई थी। भीषण युद्ध के बीचों बीच अचानक एक साथ धमाके हुये और ब्रिटिश सैनिक हतप्रभ ह गए। उन पर जलते हुये पत्थरों से हमला हुया था। अंगारों की आसमान से बारिश हो रही थी। यह दूसरा युद्ध था मैसूर से। इन जलते अंगारों ने अङ्ग्रेज़ी हथियार डिपो को उड़ा दिया। खबर तुरंत अंग्रेजों के एक अफसर विलियम कोंग्रीव तक पहुंचाई गई। उसने इन उड़ते तीरों को ध्यान से देखा और फौरन पहचान गया। यह बारूद से भरे लोहे के तीर थे जिन्हें एक प्रक्षेपण आधार (लौंचिंग पैड) से छोड़ा जा रहा था। उस युद्ध में मैसूर की जीत हुयी और अंग्रेज़ चिंतित हो गए थे अगर यहाँ हार मिली तो सब खतम हो जाएगा। कोंग्रीव इन रॉकेटों को अपने साथ ले गया और इन में कुच्छ फेरबदल कर अधिक दूरी तक मार करने वाले और ज़्यादा सटीक रॉकेट बनाए जिन्हें तोपखाने के साथ मारक हथियार के रूपमें इस्तेमाल किया जा सकता था। कोंग्रीव के रॉकेट उपयोगी सिद्द हुये और जल्दी ही इन्हें अपनी उपयोगिता दिखने का अवसर भी मिल गया। ब्रिटेन एक नए राष्ट्र से युद्दरत था। यह राष्ट्र असल में उसी के व्यापारियों, नागरिकों और अन्य यूरोपीय लोगों ने नयी दुनियाँ अर्थात उत्तरी अमेरिका महाद्वीप पर बसाया था। इन रोकेटों का फ्रांस की 1789 की क्रांति में और आयरलैंड की क्रांति में भी प्रयोग किया गया था और अब अंग्रेजों ने अमेरिकी विद्रोहियों के खिलाफ इस मारक हथियार का प्रयोग 1812 के युद्ध में किया गया। इन्हीं रोकेटों की बौछारों से प्रेरित हैं अमेरिकी राष्ट्रगान तराच्छादित पताका (Star spangled Banner ) की ये पंक्तियाँ “And the rockets’ red glare, the Bombs bursting in the air” और निश्चित ही चीनियों के बारूद व टीपू के तोपखाना विशेषज्ञों की मेधा से बने ये रॉकेट आज की अति उन्नत मिसाइलों के पड़बाबा हैं और हमें गर्व होना चाहिए की इनकी जड़ें भारत में हैं। यह संयोग नहीं है की भारत का आतिशबाज़ी केंद्र आज शिवकाशी में है जो तमिलनाडू में स्थित है जहां कभी मैसूर का राज्य था।

13/02/2011

(सोनिया) गांधी जी के तीन बंदर

थॉमस की चार्जशीट - जानकारी नहीं थी
राजा का घोटाला - अनदेखा किया
कलमाड़ी की कलाबाजी - कुछ नहीं कहा

10/02/2011

पाकिस्तान में आत्मघाती हमला - 21 की मौत

पाकिस्तान की आत्मघाती प्रवृत्तियाँ ही इस आत्मघात की जिम्मेदार हैं। पाकिस्तान खुद तो अशांत है ही अपने क्षेत्र को भी अशांत करता रहा है। एक देश के रूप में पाकिस्तान पूरी तरह से व्यर्थ रहा है। पाकिस्तान के लोगों को भी अपने मिस्री भाइयों से प्रेरणा ले कर एक भीषण जनांदोलन खड़ा कर देना चाहिए जम्हूरियत के पक्ष में और तानाशाही के विरुद्ध। आतंकवाद से अमेरिकी लड़ाई  उतनी महत्वपूर्ण नहीं है जितनी गरीबी, भुखमरी और बेकारी से लड़ाई। अमेरिका तो अपनी लड़ाई फिर भी लड़ ही लेगा पर पाकिस्तान को यह लड़ाई खुद ही लड़नी होगी।  पाकिस्तान की आवाम को अब अपनी आवाज़ बुलंद करनी चाहिए जम्हूरियत, अमन और तरक्क्क़ी के लिए। एक अमनपसंद पाकिस्तान भारत का बेहतरीन पड़ोसी हो सकता है।

02/02/2011

दिल तो बच्चा है जी - अंत ज़रा कच्चा है जी

दिल तो बच्चा है जी देखने गया था। मधुर भंडारकर की है इसलिए भी उत्सुकता थी। देखी। पर भंडारकर गच्चा खा गए। फिल्म इर्द गिर्द घूमती है महानगर में तीन अलग अलग लोगों कि ज़िंदगियों के आस पास। तीनों का ज़िंदगी को ले कर अपना दर्शन है। अभय वन नाईट स्टेंड में विश्वास रखने वाला पुरुष वेश्या है। परजीवी है। इसी से उसकी रोज़ी रोटी चलती है। दूसरी ओर अधेड़ उम्र का बैंक मैनेजर है जिसका तलाक हो चुका है और तलाक होते ही वह अपनी नई सेक्रेटरी जून पर फिदा हो जाता है। और जून भी नई पीढ़ी कि उस बिरादरी से है जिसका हर संदर्भ अमेरिका या यूरोप से शुरू होता है और वहीं खतम भी होता है, जिसमें मेक अप और ब्रेक अप रोजाना की बात है। एक तीसरा आयाम है मिलिंद का जो प्रेम को उसी नज़रिये से देखता है जिससे हम और आप और हमारा बॉलीवुड देखता आया है। वह पड़ा है गुनगुन के चक्कर में जो उसे यूज़ करती है। अब कहानी को कौमेडी बनाने पर जो ध्यान दिया जाना चाहिए था नहीं गया है और महानगर कि नंगी संस्कृति और अकेलेपन को जिस शिद्दत से दिखाया जा सकता था नहीं दिखाया जा सका है नतीजतन यह एक ऐसी फिल्म बन जाती है जिसमें बक़ौल फिल्म की एक पात्र " हुमर भी नहीं है और सेंस भी नहीं " पूरी फिल्म में दर्शक को पता होता है कि आगे क्या होगा और जहां कौमेडी की गई है वह भी इतनी बार दोहराई गई है कि अब उसमें से हंसी निकाल पाना वैसा ही है जैसे निचुड़े नींबू सी रस निकालने कि कोशिश। खैर फिल्म में एक कहानी है और यदि आप बहुत ऊंची अपेक्षाओं के साथ नहीं जाते है तो फिल्म देखी जा सकती है। मधुर खुद अपने जाल में फंस गए हैं। फिल्म के अंत से ठीक पहले अंत हो जाता है लेकिन मधुर हिम्मत नहीं कर पाये है इस अंत को अंत बना रहने देने को। अजय देवगन की माशूका की शादी उसके मेक अप ब्रेक अप बॉय फ्रेंड से हो जाती है तो अभय जो कि इस समय एक ऊबी हुयी औरत का रखैल बना हुआ है उसी की बेटी से दिल लगा लेता है। लेकिन यहाँ उसे सेर को सवा सेर मिल जाता है और उसे मक्खी की तरह निकाल कर फेक दिया जाता है। उधर गुनगुन का दीवाना मिलिंद गुनगुन को 200000 रुपये दे कर हेल्प करता है बदले में प्रेम की जगह एक गुलदस्ता और पत्र पा कर टूट जाता है।  फिल्म यहीं खतम होती तो सार्थक लगती। पर हाये रे हिन्दी फिल्मों का हैप्पी एंडिंग फंडा। मधुर को व्यंग और हास्य दोनों में तालमेल बैठने की जरूरत है। में इस फिल्म को 2.5 स्टार्स दे रहा हूँ।

एक देशद्रोही की दुविधा

एक देशद्रोही की दुविधा
मैं भारत का नागरिक हूँ और मुझे अन्य सभी की भांति अपने देश से प्यार और गर्व होना चाहिए पर अभी एक दिन एक बहस के दौरान जबकि मैं ट्रेन में सफर कर रहा था मुझे साथी यात्रियों की आलोचना झेलनी पड़ी। मुझे देश द्रोही कह दिया गया तो में आवक रह गया। मेरा कसूर सिर्फ इतना था की कॉमनवेल्थ खेलों के उदघाटन समारोह के बाद भी में इनकी आलोचना करने की गुस्ताखी कर रहा था और मेरे साथी यात्रियों का कहना था की अब हम सबको आलोचना भुला कर खेलों का समर्थन करना चाहिए। मैं भारत में रहता हूँ और भारत के हित में सोचता हूँ पर जब ओबामा आते हैं और हमें हवाई वादे करके तगड़े सौदे करले जाते हैं तो मुझे गर्व भारत पर नहीं ओबामा की देशभक्ति और उनकी शक्ति पर होता है। सर्कोज़ी आते हैं तो देते कुछ नहीं हैं बल्कि देने के बदले ऐसी शर्तें लगा देते हैं जिससे उनकी जिम्मेदारियाँ कम हो जाएंगी (नाभकीय उत्तरदायित्व ) और मुझे यहाँ भी भारत पर नहीं फ्रांस पर गर्व होता है और भरोसा है की वे हमसे अपने हित में यह कानून बनवा ही लेंगे, फिर जियाबाओ आते है और जैसा की चीन के साथ अक्सर होता है वे कुछ नहीं कहते और हम अटकलें लगते हैं  पर वे आते हैं और चुप चाप हमें चीन पर निर्भर बनाने का अपना अजेंडा पक्का करके चले जाते हैं  फिर अरुणाचल में भी नत्थी वीज़ा जारी करके तमाचा भी मारते हैं। मुझे पूरा भरोसा है की हमारे लोक सभा में बैठे प्रतिनिधि निश्चित ही जियाबाओ और चीनी जनता का ध्यान रखेंगे और इस कृत्य में हमारी नौकरशाही, न्यायपालिका उनका पूरा साथ देगी। मुझे गर्व होता है चीन पर। मुझे तो पाकिस्तान पर भी गर्व होता है। एक हम हैं की अपनी सम्पदा, बाज़ार, और व्यापार जैसी सही चीजों के बल पर सौदे बाज़ी नहीं कर पाते और एक वो हैं जो आतंकवाद जैसी घटिया चीज़ को भी भुना लेते हैं। मेरे देश में अरुंधति हैं जिनसे पाकिस्तान और चीन के नागरिकों को बहुत आशाएँ हैं और भारत का खाँटी नागरिक होने के कारण मुझे पता है के वे बहुत संवेदनशील लेखिका हैं (यह अलग बात है की छोटी चीजों का देवता लिखने के बाद उन्हें लिखते नहीं देखा हाँ छपती जरूर हैं और खबरों में बनी रहती हैं) और वे इसी संवेदनशीलता के चलते निश्चित ही उनकी अपेक्षाओं को पूरा करेंगी। क्या हुआ जो वे छोटी चीजों के बारे में लिखती हैं, उनकी सोच छोटी बिल्कुल नहीं है। भला वे भारत में ऐसे ही थोड़े ही रह रहीं हैं। यह सुविधा और किस देश में मिलेगी कि कोई अपने खाने की थाली में ही छेद करे और कोई कुछ ना कहे। इसी देश में एसे बिनायक सेन भी हैं जो देशद्रोहियों के लिए काम करते हैं और तथाकथित बुद्धिजीवियों के बीच लोकप्रिय हैं।
इसी देश में हैं सोनिया जी जो अक्सर चुप रहती हैं और इसी में अपनी भलाई समझती हैं। चुप्पी को हथियार बना कर वे आज देश की सबसे ताकतवर नेता हैं यह और बात है की इस देश की जनता जो वर्षों से चुप्प है, सबसे निरीह है। चुप्पी का यह गुण मेरे देश के एक और कर्णधार राहुल गांधी में नहीं है। वे जो मन में आता है बोल देते है – किसी से कुछ भी और किसी को कुछ भी। वे जानते हैं की भीषण मीडिया के इस दौर में वे जो बोलेंगे वही खबर बन जाएगी। वे कहते हैं की देश में सबसे बड़ा खतरा हिन्दू आतंकवाद से है। वे यह बात अमेरिकी राजदूत से कहते हैं। जब वे बच्चे थे तो उनकी दादी को सिक्ख आतंकवादियों ने मार डाला था और किशोर अवस्था में उनके पिता को तमिल आतंकवादियों ने। उन्हें परिस्थितियों ने यही सिखाया है की आतंकवाद का बाकायदा धर्म होता है और उसे उसी तरह बाँट कर देखना चाहिए। दादी की हत्या के बाद सिक्खों का कत्ले आम हुआ, पता नहीं वह कौन सा आतंकवाद था शायद सोचा नहीं उन्होंने शायद कांग्रेसी आतंकवाद। भारत एक अरब लोगों का देश है, यहाँ की अर्थव्यवस्था दुनियाँ की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से है, विशाल संसाधन हैं, अनेक समस्याएँ है। राहुल गांधी जी तो अपने आलीशान आवास से कभी निकले ही नहीं (यहाँ तक की वीज़ा पर दस्तखत के लिए भी नहीं – पता नहीं वे उन गरीबों की झोंपड़ियों में कैसे चले जाते हैं) चाँदी के अनगिनत चमचों के साथ पैदा हुये राहुल बाबा अब प्रधानमंत्री बनने वाले हैं पता नहीं वे क्या करेंगे। मुझे तो घबराहट होती है पर मुझे गर्व होता हैं अमेरिका पर कि वहाँ ओबामा चुने जाते हैं। हमारे यहाँ तो देश के सर्वोच्च पद पर भी लोग विरासत से आते हैं। जब मुख्य परिवार राज नहीं कर रहा हो तो इस गद्दी को अनेक बैरम खान सहेजते हैं । इस कुर्सी पर अक्सर वे लोग आ बैठते हैं जो जनता से जुड़े ही नहीं हैं, वे चुने नहीं जाते। नेहरू जी और शास्त्री जी को छोड़ दें तो इन्दिरा गांधी, राजीव गांधी, सोनिया गांधी (वे सुपर प्रधान मंत्री हैं – पता नहीं जब उप प्रधान मंत्री हो सकता हैं तो सुपर प्रधान मंत्री होने में क्या बुराई हैं? आखिर हैं तो दोनों ही होमोलोगस- एक ही स्रोत से उत्पन्न – राजनीतिक मजबूरी) मनमोहन सिंह( वे लोक सभा से नहीं चुने गए हैं, राज्य सभा का सदस्य उन्हें बनवाया गया हैं – संवैधानिक मजबूरी के कारण) और अब राहुल जी तय हैं। यह भाई भतीजावाद और वंशवाद आज चारो तरफ है। क्या राजनीति और क्या बौलीवुड। नेताओं की कुर्सी नेता बच्चों के लिए, अफसर की कुर्सी अफसर बच्चों के लिए, जज की कुर्सी के आसपास ऊपर नीचे रिश्तेदार, बंबई में स्टार के बच्चों के लिए स्टार की कुर्सी। और देशों में राजनीतिज्ञ जनता के बल पर चुन कर आते हैं, यहाँ का नेता जनता पर बल प्रयोग करके आता है। सारे गुंडों, हत्यारों, बलत्कारियों को अपने मुख्य कार्य के अलावा यहाँ एक वैकल्पिक करियर भी उपलब्ध है जो उन्हें ना केवल शक्ति, धन और सत्ता देता है बल्कि उनके अपराधों पर पर्दा डाल कर उन्हें भयमुक्त करता है। आज अगर किसी स्कौर्पियो, सफारी, एनडेवर आदि पर विधायक,लिखा हुआ देखते हैं लोग तो सुकून के स्थान पर उनका खून सूख जाता है। लाल बत्ती, काले शीशे, हुंकारता हुआ हूटर किसी राक्षस से कम नहीं लगता। भला किसकी हिम्मत होगे इन्हें अपना प्रतिनिधि कहने की। किस पर गर्व करूँ एसे नेताओं पर, उनकी गाड़ियों पर, उनके हूटरों पर?  
मुझे नहीं पता हमारे आजादी के नेताओं ने देश के लिए क्या सपने देखे थे (बल्कि अब तो लगता है उनके सपने असल में खुद तक ही सीमित थे) लेकिन आज तो यह देश स्वप्नहीन हो कर केवल दूसरे देशों के सपने साकार कर रहा है। मेरे देश के होनहार कभी हिम्मत नहीं करते अपने सपने देखने की, वे नहीं देखते सपने ऐसी भारतीय कंपनियों के जो दुनियाँ में फैली हों, वे नहीं देखते सपने ऐसे आविष्कारों के जो दुनियाँ को हिला दें वे बस देखते हैं की बिल गेट्स, लैरी पेज के सपनों में कैसे शामिल हुआ जाय। भारतीय आईआईटी इंजीनियर माइक्रोसॉफ्ट, गूगल में नौकरी कर के संतुष्ट है, भारतीय डॉक्टर अमेरिका, ब्रिटेन में पैसे कमा रहा है। हम सब दूसरों के सपनों को साकार कर रहे हैं। हम सो रहे हैं और वे हमें सपने दिखा कर लूट रहे हैं। उनकी पत्रिकाएँ कहती हैं की भारत दुनिया की सबसे बड़ी अर्थ व्यवस्था है लेकिन असल में वे इसे दुनिया के सबसे बड़े बाज़ार के रूप में देखना पसंद करते हैं। वे हमें दना दान मिस यूनिवर्स, मिस वर्ल्ड के खिताब बांटते हैं, वे हमें स्लमडॉग कहते हैं ( फिल्म में दरअसल भारत की ही कहानी है जिसे स्लमडॉग के टाइटल से नवाजा गया है) और हम गर्वित हो कर जय हो को राष्ट्रिय गीत बना बैठे हैं, पिछले 15 अगस्त को कई स्कूलों और कार्यक्रमों में यह गीत सारे देशभक्ति गीतों को दबा गया। आखिर देश भक्ति का एक लफ्ज भी इसमें नहीं है में कैसे गर्व करूँ इस उपलब्धि पर।
कहा जाता हैं कि यहाँ जन्म लेने को देवता भी तरसते हैं – शायद यहाँ जन्म लेने की होड़ के कारण ही एक अरब हो गए हैं हम और देवता तो बस तरस कर ही रह गए, शायद कहीं और जन्म ले लिया तभी यह देश आज देवताओं से मरहूम है और अनेक अवसरवादी राक्षसों से भरा है। यहाँ जन्म लेने को शायद अब इसलिए तरसा जाता है कि ऐसी खुले आम लूट भला और किस देश में संभव है। तभी शायद किसी ने कहा है मेरे देश कि धरती सोना उगले, उगले हीरे मोती राजा, कलमाड़ी, तेलगी आदी को देख कर कवि की यह पंक्ति सत्य लगती है। यह धरती यह सब उगलती है और ये सरकारी आँखों के तारे उसे ठिकाने लगाते रहते है। निश्चित ही यह भूमि स्वर्ग से सुंदर है पर शायद राजा, अंबानी, टाटा, रडिया, कलमाड़ी, सोनिया, मीरा यादव, थॉमस जैसे लोगों के लिए ही।
मेरे देश में कुछ और लोग भी हैं। जैसे करकरे, विजयराघवन, सत्येंद्र दुबे, आदि जिन्हें हम शहीद कहते हैं।मुझे गर्व होता है फ्रांस, रूस और अमेरिका पर की वहाँ वीर बहादुरों को लोग याद करते हैं। उनके लिए मूजियम हैं और उनकी जीवनियाँ स्कूल की किताबों में हैं पर हमारा भारत- यहाँ न मूजियम हैं, ना उन्हें याद करने की फुर्सत है। है तो बस उनके नाम पर घोटाले दर घोटाले – कभी ताबूत घोटाला, कभी शहीद पेंशन घोटाला और कभी आदर्श घोटाला। जैसे मूजियम के स्थान पर शहीदों को घोटालों के जरिये ही याद किया जाएगा
भारत का एक संविधान है, कानून हैं, कानून के रखवाले हैं लेकिन प्रति दिन बेशर्मी से इसकी धज्जियां उड़ाई जाती हैं और रखवाले चुचाप बैठे रहते हैं। इस देश के कानून में इतनी शक्ति नहीं है की स्वयं अपनी रक्षा कर सके। देश की सर्वोच्च अदालत में भी यह ताकत नहीं है की अपराधियों को जनता की छाती पर मूंग लने से रोक सके। क्या सर्वोच्च अदालत के महान न्यायधीशों में इतनी बौद्धिक क्षमता नहीं है जो संविधान की ऐसी व्याख्या कर सके की राजनीति अपराधियों के सिर छुपाने की जगह न बने। यहाँ अदालतों में 25 वर्षों में तलाक के मामले निपटाए जाते हैं तो भूमि के विवाद अनंत काल तक घसीटते हैं। न्याय पिछले 400 वर्षों से आम आदमी से कई प्रकाश वर्ष दूर बना हुआ है। जहांगीरी घंटे के दिन आखिर कब लौटेंगे।
            में भारत का रहने वाला हूँ और भारत की ही बात सुनाता हूँ पर अतीत की नहीं वर्तमान की। यहाँ लोग शादियों में भयानक खर्चा करते हैं फिर उसी से डर कर लड़कियों को मारते भी हैं। यहाँ लोग बहुओं को जलाते हैं, यहाँ लोग सतियों को जिंदा आग के हवाले करते हैं,विधवाओं को शोषित करते हैं यहाँ लोग आदमी को सड़क पर मरता छोड़ देते हैं पर एक गाय के नाम पर सैकड़ों को मार डालते हैं, यह भारत है जहां बजबजाते शहर हैं, गंदे गाँव हैं, भीषण गरीबी है, भुखमरी है, लेकिन यह भारत है जहां एक साल मैं करीब 500000 करोड़ के घोटाले होते हैं (तेलगी, कौमनवेल्थ, 2जी, प्रोविडेंट फंड, व अन्य ) यह भारत है। कृषि प्रधान देश । यहाँ अजीब कृषि होती है। किसान फसल उगाता है। कृषि मंत्री सट्टेबाजों, जमाखोरों की मदद करते हुये बयान देते हैं की अब दूध के दाम बदेंगे, सब्जियों के दाम बढ़ेंगे या प्याज़ के दाम बढ़ेंगे। जमाखोर गोदामों में जमा कर लेता है। सरकार भी उपज को  खरीद कर सड़ने के लिए छोड़ देती है। किसान को सही दाम नहीं मिलते, भूखे को अनाज नहीं मिलता पर इसी सड़े अनाज से दारू बन कर उस किसान और उस भूखे को बेची जाती है। वह इसे पी कर धुत्त हो जाता है, गरीबी और भुखमरी भूल जाता है उसे यह दुनिया हसीन लगती है। सरकार सही लगती है, देशभक्ति उमड़ पड़ती है। घोटाले भूल कर वह फिर दुनियादारी में मस्त हो जाता है। टीवी देखता। न्यूज़ सुनता है जिसमें सास बहू की साजिश होती हैं, इंडिया का ज़ायका होता है, साँपों के चमत्कार होते हैं शीला की जवानी होती है, अपराध की दुनिया होती है और इतनी सारी चीख़ों में खबर कहीं गुम हो जाती है । पर मैं क्या करूँ। मुझे पीने की आदत नहीं इसलिए मुझे भारत पर अब गर्व नहीं होता।